Wednesday, December 31, 2014

स्वागतम 2015

बदलता कुछ नहीं है, बदलना पड़ता है। कैलेंडर का पन्ना भी पलटाना पड़ता है तब कहीं वर्ष बदलता है।

फिर ये वक़्त कैसे बदलेगा?

सकारात्मक दृष्टिकोण से बीते वक़्त को पलटा दीजिये। आने वाले कल का स्वागत कीजिये नई ऊर्जा से।

कितनी भी मुश्किलें हों उनका सामना कीजिये शिव जी के त्रिशूल से। शिव जी का त्रिशूल इच्छा, क्रिया और ज्ञान रुपी त्रिशक्तियों का प्रतीक माना जाता है। मात्र इच्छा करने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उसके लिये श्रम भी करना होता है। मात्र श्रम से भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उस लक्ष्य से सम्बंधित ज्ञान भी अर्जित करना पड़ता है।

मगर सबसे ज़रूरी बात। लक्ष्य के मूल में धर्म होना चाहिये, अधर्म नहीं। धर्म यानी सबके कल्याण की भावना से किया गया कोई भी कर्म। फिर पराजय का प्रश्न ही नहीं उठता। आइये इसी विश्वास के साथ स्वागत करें वर्ष 2015 का ....

बाधाओं के पर्वत हों, पथ में बिछे हों शूल भी
हर क्षण एक संग्राम सही, परिस्थितियां प्रतिकूल भी ।
उस पथिक की जय ही जय है, जिसका शस्त्र त्रिशूल हो
धर्म लक्ष्य का मूल हो और जीवन का उसूल भी ।।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, December 17, 2014

दहशत का खुदा कोई नहीं ...

"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये"

किसी ग़ज़ल के इस शेर से बिलकुल उलट ये ना जाने कौन सा धर्म है जिसने इतने मासूम बच्चों को मौत की नींद सुला दिया ....

हरगिज़ ये दिलेरी का कोई काम नहीं है
दहशत किसी भी मज़हब का पैग़ाम नहीं है ।
तुम जानो तुम्हारा ख़ुदा तुम्हारी इबादत
पर हमको तो यकीं है ये इस्लाम नहीं है ।।

क्या इतनी क़ुरबानी पर्याप्त है आतंकवाद के खिलाफ संपूर्ण विश्व को एकजुट करने के लिये? क्या यह वहशियाना कृत्य काफी है उन नासमझों को जगाने के लिये, जिन्होंने स्वयं इस नफरत के जिन्न को पाल कर बड़ा किया है? या फिर अभी इंतज़ार है खुद की बारी का?

धर्मान्धता किसी भी धर्म के लिए बुरी है क्योंकि ये मौलिक और नवीन चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है। यह अतिक्रमण करती है व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर।

धर्मान्ध वही हो सकता है जिसने दूसरे किसी धर्म को समझना तो दूर, अपने ही धर्म को ठीक से नहीं समझा। देश और दुनिया पर हुकूमत की चाहत लिये, हथियारों से लैस, ये लोग किसी धर्म के अनुयायी नहीं होते। ये अनुयायी होते हैं केवल स्वार्थ के, अहंकार के और सत्ता की भूख के।

इतिहास उठा के देख लीजिये; धर्मान्धता का जिन्न अंत में उसको ही खा जाता है जो इसका पालन करता है। इस मज़हबी जुनून को अपने दिल में जगह देने से पहले सोचिये की कहीं हम अपने ही हाथों अपना घर तो नहीं उजाड़ रहे; क्योंकि इस संकीर्ण सोच का भुगतान निश्चित रूप से हमारी संतानों को करना पड़ेगा ...

मिरे आँगन में अभी तो खिली थी
ज़िन्दगी चार कदम भी ना चली थी ।
लो मिट गई इस जुनूँ-ए-नफरत पर
ये नफरत इसी गोद में पली थी ।।

याद रखिये, इस नफरत को और अपनी संतान को एक ही गोद में, एक साथ नहीं पाला जा सकता....

कत्लो-गारत की वहशियाना नज़ीरों से
मासूम हाथ में ज़िहादी शमशीरों से ।
मुमकिन नहीं किसी सूरत, खिलना चमन में
फूल अमन के, दहशत की तदबीरों से ।।

© - प्रशांत सेठ

नज़ीर = उदाहरण, शमशीर = तलवार, तदबीर = योजना

Tuesday, December 9, 2014

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:

फिर व्यवस्था की अस्मत लुट गई। फिर बलात्कार हुआ समाज का, मेरा भी और आपका भी।

शील नारी का भंग नहीं होता। नारी तो स्वयं मान है समाज का। अपमान होता है समाज का। हम भी उस ही समाज का हिस्सा हैं इसलिए मर्यादा जो भंग हुई वो हमारी थी। ये हमारी और आपकी इज़्ज़त है जिस पर बुरी नज़र डाली जाती है। ऐसी घटनायें क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि अब हम अपने सम्मान की रक्षा करने में असमर्थ हो गये हैं?

सिर्फ क़ानून और व्यवस्था को दुरुस्त करने से क्या होगा? नज़रिया भी दुरुस्त करना होगा। इस बात को महसूस करना होगा कि समाज में प्रत्येक स्त्री हमारी अपनी इज़्ज़त की तरह है। ऐसी घटनाओं में जब तक हम अपना अपमान नहीं देखेंगे तब तक स्थितियाँ नहीं बदलने वाली।

अपने आस पास नज़र डालिये और देखिये कहीं ना कहीं कोई आपकी इज़्ज़त पर बुरी नज़र डाल रहा है। नज़रअंदाज़ करना इस कृत्य में शामिल होने के समान है। इसलिए नज़रअंदाज़ मत कीजिये, तमाशा मत देखिये। आज ही प्रतिकार कीजिये,  इससे पहले की देर हो जाये...

किसी का घर जला, हाथ सेक लिये
या हमदर्दी के चंद लफ्ज़ फेक लिये
लो निभा दिया हमने फ़र्ज़ यूँ अपना
आ गये सड़क पे मोमबत्ती एक लिये

चीखे कुछ चिल्लाये तस्वीर भी उतरी
घर को लौट गये सीरत नेक लिये

कल दफन होंगे फिर ये भी राख में
हैं अखबार आज जलते लेख लिये

बोली तंज़ कर हवायें यूँ हमसे
इस आग ने तेरे भी घर देख लिये

© - प्रशांत सेठ

सीरत = चरित्र, तंज़ = व्यंग

Friday, December 5, 2014

अब कोई गुलशन ना उजड़े

अभी कुछ दिन पहले एक शख्स का बयान आया कि 57 साल से मंदिर मस्जिद का मुकदमा लड़ने का पश्चाताप है उन्हें। मुकदमा वो लड़े, हिंदुओं की नाराज़गी को सहन किया, मगर मंत्री दूसरे लोग बन गये। यानि की ये सारी लड़ाई थी, भावनाओं को भड़का के, वर्ग विशेष के नेतृत्व की। मंत्री ना बन पाने का दुःख है। मंदिर मस्जिद के बनने टूटने की बात नहीं है। किसी की आस्था से खिलवाड़ की फ़िक्र नही है। फ़िक्र है तो सत्ता का ख्वाब टूटने की।

हमारी आपकी आस्था इन जैसे लोगों के लिए मात्र एक सीढ़ी है सत्ता तक पहुँचने की। जी हाँ ! हमारे अन्धविश्वास की मिटटी पर ही पलते हैं ये बबूल के पेड़। फिर चाहे इनका नाम कोई ....राम हो या कोई ....खान/ओबैसी। ये कोई मठाधीश हों या इमाम। कल कोई शौर्य दिवस मनायेगा तो कोई काला दिवस। मगर वो लोग कौन सा दिवस मनायें,  जिनका मानना है की

"ज़र्रे ज़र्रे में खुदा का नूर है" या "कण कण में परब्रह्म परमात्मा है"

कमान-ए-मज़हब से नफ़रत का तीर छूटा जब
कोई मस्जिद टूटी या के मन्दिर टूटा तब ।
अक़ीदत के लिबास में सियासी भेड़ियों का
अधूरा इल्म है, चेहरा ज़हीनी झूठा सब ।।

(अक़ीदत = आस्था, इल्म = ज्ञान, ज़हीन = विद्वान)

मज़हब और सियासत के विनाशकारी गठजोड़ का परिणाम सीरिया और इराक में दिख रहा है। नफरत के इस सैलाब से हिंदुस्तान को बचाना है तो वक़्त आ गया है की हमारी आस्थाओं से खेलने वाले सियासी चेहरे और अधकचरे ज्ञान के अतिसार से पीड़ित छद्म धर्मगुरुओं को पहचान कर बेनकाब कर दिया जाये। इनके आध्यात्मिक अज्ञान की यही पहचान है कि धर्म की आड़ में ये नफरत फैलाते हैं या आपकी भौतिक लालसाओं को प्रलोभन देकर ठगते हैं।

इनको मिटाने के लिये ज़रूरी है मिटाना, अपने अंदर छुपी धर्मान्धता और अन्धविश्वास को, क्योंकि ...

मज़हब का सियासत से जब जब हुआ है संगम
दरख्ते अमन नफरत से सींचा गया उस मौसम ।
खड़ी हुई बंटवारे की दीवार जिसके सीने पे
रोता रहा सदियों तक फिर घर का वो आँगन ।।

© - प्रशांत सेठ

( दरख्ते अमन = सौहाद्र का वृक्ष)

Friday, October 31, 2014

मर्ज़-ए-दौलत

भूख !!!

ये भी कोई मर्ज़ है भला? ये कोई समस्या नहीं है, क्योंकि ये चुन चुन कर सिर्फ गरीबों को मारती है। महामारी तो उसको कहते हैं जो साउंड प्रूफ दीवारों को पार करके, हमारे वातानुकूलित कमरों तक पहुँच जाये। क्योंकि जीवन तो हम चंद दौलतमंद लोगों का ही मूल्यवान है, जो इस दुनिया के खुदा बन बैठे हैं। शेष तो प्रकृति की नैसर्गिक क्रिया है।

वास्तव में बीमार कौन है? वो जिसकी देह टूट रही है या वो जिसकी आत्मा ही नहीं है? सोचिये....

वो चीख नहीं सकते जो भूख से हारे हुये हैं
हम सुन नहीं सकते पत्थर के सारे हुये हैं
दीन-ओ-ईमान से महरूम हम दुनिया के खुदा
क्या करें के मर्ज़-ए-दौलत के मारे हुये हैं

© - प्रशांत सेठ

महरूम = वंचित

Thursday, October 23, 2014

शुभ दीपोत्सव

दीपों का त्यौहार, वो भी इस घोर अँधेरी काली रात में। शायद यही सन्देश है एक दीप का कि जब अँधेरे घने हों तो आशा का दीप जलाये रखें, और यदि जीवन में प्रकाश है तो परोपकार की परम्परा बनाये रखें।

इसी भावना के साथ आप सभी इष्ट मित्रों, स्नेहीजनों को शुभकामनायें.....

शुभ दीपोत्सव 

लड़ते लड़ते एक दीप से अंधकार कुछ यूँ बोला
कैसे लड़ोगे तुम मझसे, जलोगे कब तक बन शोला?

श्वांसों का तेल है जब तक, जलती संवेदना की बाती
कर्त्तव्य पथ पर उजियारा मैं, करता रहूँगा सुन साथी

बुझते बुझते दे जाऊँगा, पीढ़ियों को भी ये पाती
घोर अमावस में ही दीप से, मिलने लक्ष्मी है आती

सुख शांति समृद्धि भी, गीत उसी के है गाती
जो लड़ता है तिमिर से, निर्द्वन्द दीपक की भांति

निस्वार्थ कर्म की सुगंध जब, चहुँ ओर छा जाती
बल बुद्धि यश कीर्ति तब, चलकर आती है ख्याति

स्वयं जलकर औरों की शुभ, करता है जो दीवाली
दीप बनकर जलने वाला, बन जाता है अविनाशी

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, October 22, 2014

भू-कम्पन


जब बेटे ही छाती पे मूंग दलने लगे 
लो ज़मीं के तेवर भी अब बदलने लगे
माँ अपने घर में जबसे हुई बेगानी है
नींव छत दरो दीवार सब हिलने लगे

जननी का तिरस्कार मनुष्य के पतन की पहली निशानी है और धरणी (धरती) का तिरस्कार संपूर्ण मानवता के पतन का द्योतक।

संपूर्ण मानवता को अपनी गोद में लेकर पालने वाली वसुंधरा आज फिर मनुष्य के कृत्यों से काँप गयी। बूढी हो चली है शायद। अब और बोझ नहीं उठा सकती हमारे लालच का। इतना सामर्थ्य प्रकृति ने हर माँ को दिया है की वो अपनी संतान की उदरपूर्ति कर सके। परन्तु लालच का पेट? वो तो परमात्मा भी नहीं भर सकता।


खनिज माफिया धरती का सीना चीर रहे हैं तो भू माफिया पहाड़ काट रहे हैं। जंगल माफिया की वृक्षों पर गिद्ध दृष्टि है तो उद्योगों का नदियों से बैर। परिणाम भूस्खलन और भूकम्प।

आज (22-10-2014) जबलपुर में भूकंप के प्रत्यक्ष अनुभव से उपजी ये पंक्तियाँ...

पर्वत पेड़ नदी अरु जंगल
वसुंधरा के ये आभूषण
इनसे वंचित कर धरती को
मत फैलाओ तुम प्रदूषण?

हो तुम जिसकी गोद में खेले

आज उसी का करते शोषण
माँ अगर बंजर रह जाये तो
सोचो कैसे होगा पोषण?

धीर अब तक धरा धरणी ने

ना जाने चुक जाये किस क्षण
और समूची मानवता का
काल ना कर जाये भक्षण

समय रहते त्याग सको तो

लोभ अपना त्यागो तत्क्षण
ऋण अदा कर दो मिटटी का
वृक्षों का पुन: कर दो रोपण

© - प्रशांत सेठ





Monday, October 20, 2014

एकलव्य

बहुत आसान है ऊंचा उठना, बस थोडा सा गिर जाइये। यही सच है इस युग में सफलता का। जो जितने बड़े दिखते हैं अक्सर बहुत छोटे लोग होते हैं (अपवादों को छोड़कर)।

सच तो ये है की आज के दौर में एक अर्जुन के पीछे कई एकलव्य बलिदान होते हैं। ना जाने कितनी प्रतिभाओं का शोषण करके, अपनी ऊंची पहुँच का लाभ आज भी कई अर्जुन उठाते रहते हैं। मध्य प्रदेश का पी.एम.टी परीक्षा घोटाला हो या एशियाड में मुक्केबाज़ सरिता देवी का प्रकरण, अंगूठे तो आज भी कट रहे हैं। लाखों रुपयों का डोनेशन लेकर डॉक्टर और इंजिनियर गढ़ने वाले ये गुरु अगर द्रोण नहीं तो और क्या हैं? ऐसे में मन में एक प्रश्न उठता है। क्या भौतिक सफलतायें केवल छल और फरेब से ही अर्जित की जा सकती हैं?

लेकिन अपने स्वार्थ के लिये चरित्र और सिद्धांत बेचने वाले, मासूमों और कमजोरों का शोषण करके सफलता अर्जित करने वाले ये लोग नहीं जानते की इन्होंने क्या खोया है। वास्तव में ये अपना जीवन और आत्मा ही खो देते हैं। गुरु द्रोण की भांति अंत में प्रतिष्ठा और परिवार भी गँवा देते हैं।

"अस्थायी लाभ के लिए किया गया स्थायी नुकसान"। यही परिभाषा है झूठ, फरेब और छल की।

ये भी सच है की सच्चाई का, नैतिकता का रास्ता दुर्गम होता है। अंगूठा भी उसका ही कटता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं। इसलिये सच हमेशा परीक्षा देता हुआ प्रतीत होता है और झूठ अन्दर से खोखला होते हुये भी बाहर से बुलंद दिखता है। लेकिन केवल उनको जो अंतर्दृष्टि से हीन है।

ये पंक्तियाँ समर्पित हैं इसी कड़वे सच को ...

लिबास-ए-झूठ रेशम का, सच को ओढ़े कफ़न देखा
ऊंची हवेलियों के नीचे झोपड़ियों को दफ़न देखा
हमने देखा कटा हुआ अंगूठा एकलव्य का
और दुनिया ने बारहा अर्जुन का फन देखा

© - प्रशांत सेठ

बारहा = हमेशा

Sunday, October 12, 2014

दाम्पत्य

जीवन एक यात्रा है और इसे कई मोड़ से गुज़रना पड़ता है। यह सफ़र अकेले करना पड़े तो इंसान टूट सकता है। और वहीँ अगर कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला कोई साथी हो तो मुश्किलें भी खूबसूरत लगने लगती हैं। लेकिन किसी का साथ चाहिये तो कुछ शर्तें भी निभानी पड़ती हैं।

परिवार वह शक्ति है जो प्रेरित करती है श्रम करने के लिये। और इसका बीज है दाम्पत्य। सफल दाम्पत्य वही है जहाँ परिवार स्वयं प्रेरणा बन जाता है। और ऐसा परिवार बनता है परस्पर प्रेम और विश्वास से, और थोड़े से त्याग से।

करवाचौथ के अवसर पर ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस खूबसूरत रिश्ते को जिसका नाम है दाम्पत्य ....

हरी भरी रहे दरख़्त पर पत्ती पत्ती एहसास की
रिश्तों पर एक छतरी हो यूँ परस्पर प्रेम विश्वास की
एक लम्बा सफ़र है जीवन, तन्हा क्यूँकर काटें हम
मिल जुलकर सह लेंगे सारी बारिशें आकाश की

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 21, 2014

इतवार

छुट्टी का दिन किसे अच्छा नहीं लगता। घर में परिवार के साथ फुर्सत का एक दिन नयी ऊर्जा दे जाता है। इस इतवार का इंतज़ार हफ्ते भर रहता है।

हम और आप सौभाग्यशाली हैं क्योंकि ये इंतज़ार सबको नहीं रहता। एक पिता जिसके अरमान जेब की गुंजाईश के सामने दम तोड़ते हों, उसे बिलकुल नहीं रहता। एक गरीब बाप जिसे आज भी रोटी का इंतज़ाम करना हो, उसे भी नहीं रहता। ऐसे भी लोग हैं जो बच्चों से मुंह चुराकर सुबह से निकल जाते होंगे। या फिर बहला देते होंगे मासूम ख्वाहिशों को नये नये बहानों से। या फिर बचपन का गला घोंट देते होंगे एक थप्पड़ से और गाल को सहलाता हुआ बचपन अचानक समझदार हो जाता होगा।

देखिये इतवार का एक रूप ये भी है...

आज फिर दिन है सब्र की आज़माइश का
आज फिर दिन है बच्चों की फरमाइश का
गम-ए-मुफलिस आ गया फिर इतवार की सूरत
आज फिर चेहरा उतरा है मेरी गुंजाइश का

© - प्रशांत सेठ

मुफलिस = गरीब
गुंजाइश = हैसियत

Friday, September 19, 2014

बंधन

जीवन में स्वछंदता को रोकने के लिये ही शायद समाज का, रिश्तों का जन्म हुआ है। मन की अनंत इच्छाओं के वेग में कई बार ये बंधन बोझ लगने लगते हैं। परन्तु इनका महत्व वही जानता है, जिसने इन्हें खो दिया है।

डोर अर्थात बंधन। यानी अनुशासन, मर्यादा, परस्पर प्रेम, सम्मान, विश्वास, आदि आदि। पतंग की भांति जीवन मूल्यों की डोर से बंधकर जीने वाले, कभी दिशाहीन होकर नहीं भटकते।

और जो स्वछन्द होकर भटकना चाहते हैं उनके लिये....

राब्ता डोर से रख, लीजिये मज़ा ऊंचाई का
ख़ाक मज़ा है तर्क-ए-ताल्लुक की रुसवाई का
चीथड़े जिस्म-ओ-जज़्बात के कर देगा ज़माना
पूछियेगा अंजाम कभी पतंग से बेवफाई का

© - प्रशांत सेठ

राब्ता = रिश्ता
तर्क-ए-ताल्लुक = सम्बन्ध टूटना
रुसवाई = बदनामी


Tuesday, August 26, 2014

आ अब लौट चलें...

अच्छे दिनों की तलाश में ना कितने ख्वाब, रोज़ गाँव से निकलते हैं शहर की तरफ। कच्ची उम्र का भोला और नादान युवक जब शहर पहुँचता है तो ये दुनिया सबसे पहले छुड़ा लेती है उसकी मासूमियत। फिर शुरू होता है झूठी कामयाबियों का वो सफ़र, जिसमे इंसानियत के एहसास धीरे धीरे दम तोड़ते जाते हैं।

लेकिन कहीं ना कहीं आत्मा कचोटती है। जिंदगी की असलियत से रूबरू होकर आँखों पर से रंगीन पर्दा हटता है। दुनिया भर का नाम, शोहरत, रुतबा और दौलत भी वो सुकून नहीं दे पाती जो अपनी मिटटी अपने लोगों में मिलता है। इस रफ़तार भरी जिंदगी में दौड़ते दौड़ते घायल जज्बातों के रिसते घावों को, कभी ना कभी ठहर कर धोना ही पड़ता है।

अपनी जड़ों से कोई कब तक भाग सकता है। आसमानों को छूने की चाह में जड़ों से दूर हो चुके दरख़्त को, मामूली हवायें भी गिरा जाती हैं। ज़रूरी है कि इंसान ऊंचाई पाने के साथ साथ गहराई से भी अछूता न रहे। और ना भूले अपनी ज़मीन को और ज़मीन से जुड़े लोगों को।

अपनी जड़ों की और लौटते इन एहसासों को शब्दों में बांधने की एक कोशिश...

आ अब लौट चलें...

सर की ज़द से बाहर चले दिल की ठांव हो लिये
बाद मुद्दत के शहर से निकले वापस गाँव हो लिये

अरमानों को पंख लगे थे कभी सुनहरे ख्वाबों के
सच से रूबरू यूँ हुये कि फिर से पाँव पाँव हो लिये

कामयाबी के मौसम में शोहरतों की बारिश थी
रिश्ते भी कागज़ की जैसे बरसाती नांव हो लिए

बचपन के वो गीत थे जितने कोयल जैसी तानो में
इस जद्दोज़हद में जिंदगी की कांव कांव हो लिये

हक़ीक़तों की कड़ी धूप में जज्बातों की खैर कहाँ
हम अपने एहसास थाम कर छाँव छाँव हो लिये

©- प्रशांत सेठ

ज़द=दायरा

कैसे समझूं प्रेम की भाषा

विगत जन्माष्टमी पर मैं कुछ ढूँढ रहा था। मैं ढूँढ रहा था वो कारण जो मनुष्य और परमात्मा के बीच दूरी उत्पन्न करता है। इस चिंतन ने एक रचना को जन्म दिया ...

जीवन में है शेष कदाचित
अभिलाषा निज सम्मान की
भटक रहा हूँ जगत में लेकर
आशा मिथ्या पहचान की
मैं क्या समझूं प्रेम की भाषा
मुरलीधर घनश्याम की

मन बसी स्वार्थ की नगरी
सत्ता जिसमें अभिमान की
हूँ आकंठ नदिया में डूबा
माया मोह और अज्ञान की
मैं क्या...

शोर बहुत हुआ इच्छाओं का
भीड़ लोभ मद और काम की
दौड़ा रही नित स्वप्नों के पीछे
भूख दिन रात सुबह शाम की
मैं क्या ....

लालसाओं में लिप्त ह्रदय ज्यों
रण भूमि जीवन संग्राम की
गुंजित कैसे फिर कानों में होगी
ध्वनि मधुर मुरली के तान की
मैं क्या ...

© - प्रशांत सेठ

Monday, August 25, 2014

मैं इन्कलाब हूँ !!!

जनकवि स्व. विपिन मणि  जी की 12वीं पुण्यतिथि पर कोटा (राजस्थान) में उनकी स्मृति में आयोजित कवि सम्मलेन में सम्मिलित हुए। काव्य रस की अदभुत धारा बहाने के लिये इस कार्यक्रम के आयोजक प्रिय मित्र डॉ. उदय मणि, कपिल मणि और लोकेन्द्र मणि को हार्दिक बधाई।
संसार में कुछ एक ही ऐसे किरदार होते हैं जो खुद के लिये नहीं जिया करते। इसलिये उनका जीवन देह की सीमाओं से परे जाकर मृत्यु के लिये भी चुनौती बन जाता है। मृत्यु का अधिकार केवल देह पर हो सकता है, विचारों पर नहीं।

श्रद्धेय बाबूजी स्व. विपिन मणि जी को श्रद्धांजलि...

अपनी औलाद पर कब अपना असर नहीं होता
सच की ज़मीन पर कभी झूठ का शज़र नहीं होता
लो देख लो मेरा अक्स अब मेरे बच्चों में
एक जागता ख्वाब हूँ मैं, जो कभी नहीं सोता
...
और ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस अदभुत प्रेम और अपनेपन को जो मणि परिवार के हृदय में बसता है

तिजारत का हुनर मेरा, शायद मुझसे रूठ गया
बरसों से मुनाफे का सिलसिला यूँ टूट गया
दिल के कारोबार में अबकि घाटे की आमद हुई
जिस्म फकत ले आया हूँ, मैं वहीँ छूट गया

© - प्रशांत सेठ

Thursday, August 14, 2014

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

हर माँ खूबसूरत लगती है यदि उसकी संतान काबिल हो। इस लिहाज़ से ये तस्वीर भी खूबसूरत है क्योंकि इससे एक बेहद खूबसूरत ख्याल ने जन्म लिया और बात कुछ यूँ निकली के...

मुल्क की इबादत फ़र्ज़ है इंसान का

मिटा नहीं सकता कोई फिर नक्श हिंदुस्तान का
ज़र्रे ज़र्रे में दिख रहा है यूँ जब अक्स हिंदुस्तान का
अपने ज़मीर-ओ-ईमान से ही मुल्क की शान है
गर इतनी बात समझ ले हर शख्स हिंदुस्तान का

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 4, 2014

दोस्ती एक खूबसूरत एहसास होती है !!!

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सच्ची दोस्ती वक़्त की, लम्हों की मोहताज नहीं होती। दिन और रात नहीं देखती, सिर्फ दोस्त की ज़रूरत को देखती है।

मुस्कराहट भरे अनगिनत पलों के बीच में तकरार के कुछ लम्हे ना हों, तो उस दोस्ती को अधूरा समझना चाहिये। ऐसी दोस्ती जो किसी इम्तिहान से ना गुजरी हो, उसकी कसमें नहीं खायी जातीं। दुनिया के किसी भी रिश्ते को आजमाकर देख लीजिये, जिंदगी की ढलानों में अगर कोई साथ होता है तो सिर्फ दोस्ती....

किसी दुआ की तरह ही इखलास होती है
जब कुछ नहीं होता तब यही पास होती है
खून के, मतलब के, हर रिश्ते से ऊपर दोस्ती
उघड़े हालात में आखरी लिबास होती है

© - प्रशांत सेठ

इखलास=पवित्र

Friday, August 1, 2014

एक थे विषधर भाई

नागपंचमी स्पेशल पंच...

मियां सांप को दूध नहीं पिलाओगे?? बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोलकर देखा तो खड़े थे विषधर भाई
डर की वजह से अपनी घिग्गी बंध आयी
हमने हौले से पूछा आज हमारी याद कैसे आयी??
कोई ना कोई बात इसमें होगी ज़रूर
वरना आप कहाँ आते हैं, आप तो बुलवाते हैं हुज़ूर

वो अन्दर आये बैठे, फुफकारते हुये फन पटका
हमने किसी अनहोनी की आशंका से थूक गटका
बोले विद्वान् होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
वैसे तो हम तुम्हारा खून पीकर काम चलाते हैं
आज व्रत की मजबूरी है हम शाकाहार अपनाते हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमारा गला भर आया आवाज़ थरथरा गयी
गुस्से के साथ साथ थोड़ी हिम्मत आ गयी
हमने कहा हुज़ूर आप तो अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप हैं के साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है वो डायन महंगाई
जो चट कर गयी है हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे भी अब पानी पीकर काम चलाते हैं
इसलिये आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है अब नहीं चलने देंगे किसीकी दबंगाई
अब की मनाएंगे आज़ादी जैसी पहले कभी नहीं मनायी

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम सांप हो ये बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बंटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था उसको हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनावों के मौसम में जिनको हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
और वोट को समझ रहे थे दूध मलाई
अब तक होता था सत्कार आज दुत्कार है पायी
क्योंकि हमको भी पैंसठ बरस के बाद अकल आयी

© - प्रशांत सेठ

Sunday, July 27, 2014

भूख

बहुत दिनों से इन्टरनेट पर वायरल हो चुकी, इस तस्वीर को देख रहा हूँ।

अब ये मासूम फिर कभी भोजन नहीं मांगेगा। इसने इतनी शिद्दत से भोजन की चाह की होगी के कुदरत ने इसे खुद ही भोजन बना दिया....गिद्ध का।

इंसानियत भले ही अपने फ़र्ज़ से चूक जाये मगर कुदरत अपना काम कर रही है। ये तस्वीर उस आधी दुनिया के स्वार्थ की कहानी कह रही है जो समृद्ध तो है मगर उस समृद्धि की कीमत चुका रही है, बाकी की आधी दुनिया। ऐसे में एक सवाल ज़ेहन में उठता है .... क्या जो समृद्ध हैं, वही गिद्ध हैं?

हम और आप उसी समृद्ध दुनिया का हिस्सा हैं इसलिए देखिये भूख से दम तोड़ती एक जिंदगी को गिद्ध की नज़र से, और महसूस कीजिये इन पंक्तियों में छुपे दर्द को...

रस्म-ए-क़ज़ा का ये खौफ़नाक सा मंज़र देख लो
एहसास से खाली दिल-ए-आदम बंजर देख लो
ये जो मरता है यहाँ फकत बच्चा नहीं है मासूम
इंसानियत के जिस्म में खुदगर्जी का खंजर देख लो

© - प्रशांत सेठ

कज़ा=मौत
दिल-ए-आदम=आदमी का दिल
खुदगर्जी=स्वार्थ

Thursday, July 24, 2014

कच्चे मकान पक्के लोग

किसी शायर ने क्या खूब लिखा है...

"बादलों के दरमियाँ कुछ ऐसी साज़िश हुई
मेरा घर मिट्टी का था, मेरे ही घर बारिश हुई"

दुनिया का दस्तूर है, गमगीनों को और सताने का। मगर फलक भी इसी राह पर चलता है, ये ताज्जुब की बात है। दरअसल कच्चे मकानों में लोगों के रिश्ते और हौसले दोनों पक्के होते हैं। खुद्दारी से जीने की जुर्रत करते हैं। शायद इसलिये....

पक्के मकानों पर यूँ गिरना फ़िज़ूल है
बिजलियों का अलग अपना ही उसूल है
हौसले बड़े होते हैं मिट्टी के घरों में, और
ये ज़ुर्रतों पर कुदरती इक महसूल है

© - प्रशांत सेठ

महसूल=कर (टैक्स)

और पक्के मकानों में कच्चे रिश्तों के लिये कुछ यूँ ...

गुरूर की कुरसी का सिर्फ पाया बड़ा है
रिश्ते और एहसास नहीं, सरमाया बड़ा है
अना अपनी औकात से ऊंची हुई है यूँ
यहाँ कद से ज्यादा सबका साया बड़ा है

© - प्रशांत सेठ

सरमाया=पूँजी, दौलत
अना=अहं

Tuesday, July 22, 2014

एक सफ़र जिंदगी

है जब तलक यहाँ बसर जिंदगी
तू मेरी मैं तेरा हमसफ़र जिंदगी

चिराग हो ज्यूँ आँधियों से मुखातिब
जलेगी कब तक क्या खबर जिंदगी

एक सांस ली एक छोड़ दी जैसे
कभी बाहर कभी अन्दर जिंदगी

पत्थरों पर बहते दरिया सी आज
है कल का ये कोई समंदर जिंदगी

वीराने में खिले किसी गुल के मानिंद
तन्हाईयों का जैसे एक घर जिंदगी

समाती नहीं इसमें ख्वाहिशें सारी
हक़ीक़तों की छोटी चादर जिंदगी

धूप, छाँव, कभी बारिश का मौसम
है बहुत खूबसूरत मगर जिंदगी

© - प्रशांत सेठ

Thursday, July 3, 2014

बरसो रे मेघा

उम्मीद का सहरा बाँध कर जब कोई किसान हल जोतता है, बीज बोता है, तब वह एक पल के लिये भी यह नहीं सोचता की बादल बेवफा हो जायेंगे। एक अटूट विश्वास लिये जब उसका पसीना खेत में गिरता है और धोंकनी की तरह चल रही उसकी साँसों में शहनाई का स्वर उभरता है, तब माँ के रूप में धरती खुश होकर लहलहाती फसल सी दुल्हन पाने का आशीर्वाद देती है। मगर क्या कीजिये, मंडप के नीचे तो पिता के रूप में बादल का आशीर्वाद भी ज़रूरी है ना। ऐसे में पिता ही नदारद हो जाये तो क्या कीजिये?

इस बरस ये बादल फिर आवारगी पर उतारू हैं। ना जाने कितने धरतीपुत्रों के प्राणों पर बन आयेगी। महंगाई गरीबी के सर पर नाचेगी और क़र्ज़ में डूबी हुई जिंदगियां, इंसानियत के गिरे हुये स्तर को नापेंगी
इश्वर से यही प्रार्थना कीजिये के बारिश बरसे और झूम के बरसे ...

आँखों से बरसे पानी, बरसे ना अब्र से
दर्द जीत ना जाये कहीं उसके सब्र से
सूखी रहे फसल, न बेवफा हों बारिशें
सींचे न कोई दहकाँ, मर कर फिर कब्र से

© - प्रशांत सेठ

अब्र=बादल, दहकाँ=किसान

Sunday, June 29, 2014

आ माँ घर चलें

आज माँ (बहुत प्रिय मित्र की माँ, अपनी माँ) बीमार है। बहुत बीमार, जीवन मृत्यु के बीच। ऐसे में एक प्रार्थना ने जन्म लिया और ये सभी बुजुर्गों के लिये इश्वर से विनती बन गयी।

मुझे पूरा विश्वास है ये पुकार पहुंचेगी उस परम सत्ता तक और माँ घर वापस आएगी... आप लोग भी दुआ कीजिये।

धूप का सफ़र मेरा, बुजुर्गों की छाँव रखना
आँगन के दरख्तों को, मेरे साहिब बचाये रखना

लहरों से मुकाबिल हूँ, तजुर्बों की नाव रखना
दस्त-ए-दुआ उनकी, मालिक तू बनाये रखना

पत्थरों के शहर में कोई, मिट्टी का गाँव रखना
एहसास के घरोंदों को, मेरे दिल में बसाये रखना

ख्वाबों के पंख हों बेशक, हवाओं पर पांव रखना
रिश्ता शज़र से मौला, परिंदों का बनाये रखना

इतनी मेहरबानी, मुझपर हवाओ रखना
शमा-ए-जीस्त उनकी, हरदम जलाये रखना

जिंदगी लगे, लग जाये, कैसा भी दांव रखना
माँ बाप का साया, सर पर बनाये रखना

© - प्रशांत सेठ

दस्त-ए-दुआ=दुआ का हाथ, शज़र=पेड़, शमा-ए-जीस्त=जीवन ज्योति

Friday, June 27, 2014

माँ झूठी है

इश्वर किसी माँ को ये दो चीज़ें एक साथ ना दे। या तो औलाद ना दे या गरीबी ले ले।

फूटपाथ पर एक भूख से बेहाल मासूम को बहलाते हुए जब उस माँ को देखा तो अन्दर तक हिल गया। एक ख्याल उभरा और फिर एक क़ता हो गया...

ना जाने पाप था उसके झूठ में, या पुण्य दिलासों में !
मासूम भूख को बहलाती, बेबस माँ की आहों में !!
सच से मचलते बचपन को, फिर एक झूठ ने सुला दिया !
मैं सोचता रहा और वो बढ़ गयी, लिये जिंदगी बाहों में !!

और इसी बात पर मासूम बचपन का जवाब देखिये...

झूठे दिलासों से जब वो बहलाती है
खाली बर्तन में चमचा हिलाती है
खाने के पहले माँ लोरी सुनाती है
तब मैं भी सो जाता हूँ,
वर्ना भूखे पेट किसे नींद आती है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, June 4, 2014

भगीरथ


समय की लहरें ले जायेंगी
अक्षर अक्षर जो है तट पर
निराशा को रेत पर लिखना
आशा लिखना पत्थर पर

जीवन है अभी शेष बहुत
चल पथिक साहस रथ पर
सुगमता ढूँढ़ रहा जग सारा
तू चल केवल दुर्गम पथ पर

ढूँढ़ कहीं वो निश्चित होगा
कोई भगीरथ तेरे अन्दर
उतर आयेगी धरती पर गंगा
संकल्प दृढ रख, स्वप्न सच कर

चुनौतियों से मत घबराना
प्रलोभनों से चलना बचकर
अवरोधों से निखर आयेगी
प्रतिभा जो सोती है छुपकर

क्षणिक सफलता बहकाये तो
कह देना तुम उससे हंसकर
संकल्प अभी कहाँ पूर्ण हुआ है
समर शेष है, उत्सव मत कर

सच पूछो तो यही लक्ष्य है
सतत चलना मिथ्या से हटकर
बोध होने को क्षण ही बहुत है
सत्य स्वयं आता है चलकर

© - प्रशांत सेठ

Monday, June 2, 2014

बस इतनी है जीवन की रीत

एक बहुत ही प्रिय मित्र को समर्पित यह कविता, उन सभी लोगों के लिए प्रेरक है, जो जीवन में नैराश्य भाव से ग्रसित होकर हार मान लेते हैं....

जीवन के हरित उपवन में
प्रकृति के विभिन्न रंगों के बीच
रिश्तों की प्यासी धरती को
प्रेम की पावन गंगा से सींच
गरजते मेघों से सुर लेकर
गा रे ह्रदय कोई शाश्वत गीत

श्वांसों की आती जाती पुरवाई
कहे ऋतुओं को बाहों में भींच
नैनों में नये स्वप्न उभरे हैं
मन गया है स्वयं पर रीझ
चीर धरती की छाती फिर
अंकुरित हुआ आशा का बीज

बांह पसारे नील गगन भी
राह तक रहा जैसे मनमीत
मन वीणा के तारों ने भी
छेड़ दिया मधुर मिलन संगीत
बढ़ चला एक नन्हा पौधा
आकाश पथ पर अकेला निर्भीक

वृक्ष बनकर खड़ा होगा कल
और याद करेगा अपना अतीत
यही संदेश देगा वो जग को
दही मथा तब मिला नवनीत
सुख में दुःख में हर मौसम में
निभाते रहना जीवन से प्रीत

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 26, 2014

अविस्मरणीय छुट्टियाँ

स्वार्थ, मतलब, कारण से तो अनगिनत रिश्ते बनते हैं मगर कुछ रिश्ते अकारण बनते हैं। इन रिश्तों में इसलिये जान होती है क्योंकि ये हर कारण से मुक्त और अनजान होते हैं। इसको ही मित्रता कहते हैं।

बहुत दिन बाद इतना हँसे और इतना जिये। अपनों के साथ दो दिन की छुट्टी में समझ लीजिये वक़्त को लूट लिया। जितना कुछ वो दे सकता था उससे अधिक ले लिया। अब सब अपने अपने शहर और अपने अपने काम पर लौट गये मगर सुखद स्मृतियाँ शेष हैं और सदैव ऊर्जा देती रहेंगी

दूरियाँ मजबूरियाँ दिल कुछ भी गाता रहे
याद के पंख लगाकर मन का पंछी आता रहे
कैद कर लो इन लम्हों को एहसास के पिंजरे में
ताउम्र ये परिंदा पंख ही फड़फड़ाता रहे

© - प्रशांत सेठ

Sunday, May 18, 2014

दो टूक

आम आदमी पार्टी को चार सांसदों की बधाई। कुछ अन्य दलों के समर्थक जो इसे बहुत कम बता कर व्यंग कस रहे हैं वो शायद इससे ज़्यादा की उम्मीद लगाये बैठे थे. इस उम्मीद के लिए उनको धन्यवाद दिया जाना चाहिए। देश की जनता ने केजरीवाल जी की ईमानदारी पर विश्वास तो किया है मगर साथ ही अपरिपक्व भी माना है. और ये सही भी है. मोदी जी ने इस चुनाव में अपनी परिपक्वता और प्रबंधन के सामने बड़े बड़े दिग्गजों को बौना साबित कर दिया।

आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों में कोई खामी ना होने के बावजूद उनको अपने ही संगठन में विरोध भी सहना पड़ा. कारण ये की संगठन में प्रमुख ज़िम्मेदारियाँ संभाले हुये कार्यकर्ता स्वयं के लिए उम्मीद लगाये बैठे थे. जो राजनीति को बदलने की बात अरविन्द केजरीवाल करते हैं उसका ज़रा भी अंश जिले और प्रदेश स्तर के अधिकांश कार्यकर्ताओं में नहीं दिखता। स्वार्थ की वजह से स्वयं से अधिक योग्य लोगों को स्वीकार करने की क्षमता ख़त्म हो जाती है. संगठन को खड़ा करने और समाज को जागरूक करने की बजाय आज भी यदि पहले प्राथमिकता चुनावी राजनीति को दी गयी तो यह परिणाम बार बार आएंगे। सत्ता केंद्रित राजनीति मुद्दों से भटकाव का कारण बनती है.

सचमुच व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए, संगठन की ज़िम्मेदारियों से सत्ता लोलुप और अपरिपक्व व्यक्तियों को हटाने का साहस करना पड़ेगा। साथ ही प्रत्येक प्रदेश में हिवरे बाजार जैसे ग्राम विकास कार्यक्रमों को करके दिखाना पड़ेगा। सिर्फ पोपट राव पवार (सरपंच हिवरे बाज़ार) की CD दिखाने से काम नहीं चलेगा। धैर्य और मेहनत का काम है मगर जल्दी क्या है? जल्दी वो करता है जो अपने लिये पेड़ लगा रहा हो. जो भविष्य का निर्माण कर रहा हो उसमे स्वार्थ और अधीरता नहीं होती।

उपरोक्त सुझाव विगत दो वर्षों से दिये जा रहा हूँ मगर भ्रम के रास्ते पर अक्सर चिंतन छूट जाता है. शोर भी बहुत पाल लिया है आस पास, इसलिए शायद सुन नहीं पा रहे है. कीचड को साफ़ करने के लिए कीचड में उतरना पड़ता है. ज़रूर उतरिये, मगर मन को कीचड मुक्त करने के और संगठन का कीचड साफ़ करने के बाद. आज भी पुन: सुझाव यही सोचकर दिया है की शायद अब चिंतन का दौर शुरू हो चुका होगा।

वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन की उम्मीद अन्य किसी राजनीतिक दल से नहीं रखी जा सकती। क्या "आप" से रखी सकती है?

उजालों के इंतज़ार में, बहुत अँधेरे देखे हैं,
सारी रात का जागा हूँ, अब सवेरे देखे हैं !
आज फिर उगा है सूरज, एक नई उम्मीदों का,
आज फिर आँखों ने मेरी, ख्वाब सुनहरे देखे हैं !!

© - प्रशांत सेठ

Friday, May 16, 2014

रुक जाना नहीं....

यह सफ़र ना हार पर ख़त्म होता है, ना ही जीत पर ख़त्म होता है। जीवन संघर्ष के दौरान मिलने वाले अनुभवों का नाम है। प्रयास करने के आनंद का नाम है "जीवन"। हार मिले तो पुन: प्रयास, जीत मिले तो और बड़े लक्ष्य के लिये प्रस्थान। जीवन सतत चलने का नाम है। हार से लेकर जीत तक के अनुभव जिसने संजोये नहीं, उसने जीवन को जाना ही नहीं।

जिंदगी हार नहीं, जिंदगी जीत नहीं,
जिंदगी मिलती है इसके बीच कहीं !!

- प्रशांत सेठ

Friday, May 9, 2014

जिंदगी आ रहा हूँ मैं...

पिछले कुछ दिनों से सफ़र में हूँ। कुछ सीखने और जिंदगी को समझने के लिये सफ़र में रहना ज़रूरी है। लोगों से मिलने मिलाने में जिंदगी निकल जाती है और जिंदगी बिना मिले ही निकल जाती है। इसलिये इस बार का सफ़र जिंदगी से मिलने के लिए। इस दौरान लिखी गयी कुछ पंक्तियाँ....

ज़िन्दगी एहसास का सफ़र, तुम मीलों चले,
और हमसे नहीं मिले, तो फिर क्या मिले !
हम समंदर के मानिंद हैं, मुद्दतों से प्यासे,
तुम दरिया की तरह कभी, लग जाओ गले !!
....

बेकरारियों को बरकरार रहने दो
कुछ अधूरा सा ये प्यार रहने दो
ख़त्म ना हो जाये कहीं मोहब्बत का सफर
वस्ल छोडो, मंजिलें दुश्वार रहने दो
....

ये ना पूछो क्यों, कैसे, कब किधर हैं,
बहता हुआ दरिया हम, इंतज़ार में समंदर है !
मुसाफिर का मज़हब कहो, या हालात की मजबूरी
ठहरे तो गुनाह है, चलना ही मुक़द्दर है !!

© - प्रशांत सेठ

Sunday, April 27, 2014

बलिदान

44 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर मुकुंद वरदराजन आज शोपियां (कश्मीर) में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। आपकी शहादत को हज़ार बार नमन

भारत की तुम सच्ची संतान
हे वीर तुम्हें सहस्त्र प्रणाम
जिस माँ के लाल हो तुम
ऋणी है उसका हिंदुस्तान

देख रहा हूँ सजल नेत्र से
मन पटल पर अमर बलिदान
चिरनिद्रा में जाने के पहले
अंतिम तुम्हारा वह संग्राम

देह तुम्हारी टूट रही है
अधरों पर किन्तु है मुस्कान
और माटी से कहा तुमने
आज न्योछावर तुझ पर प्राण

हौले से पूछ रही धरती है
छोड़ चले तुम क्यों मैदान
युद्ध जी कर जीते जाते हैं
इस सत्य से क्या तुम हो अंजान

हंसकर तुमने कहा उससे है
मेरी किस्मत बड़ी बलवान
माँ की गोद में जन्म लिया है
गोद से ही करूँगा प्रयाण

फिर धरती ने चूमा तुमको
और बाहों में लिया है थाम
सेज बन गयी गोद उसकी
चादर बन गया आसमान

एक बूँद निकल आँखों से
कर गयी अंतिम प्रणाम
और तुमने मूँद ली आँखें
अब देह हो चली निष्प्राण

कर्त्तव्य की बलिवेदी पर
कर दिया जीवन बलिदान
उस राष्ट्र का क्या कोई अनिष्ट करेगा
जहाँ तुम जैसे हों वीर जवान

© - प्रशांत सेठ

Friday, April 25, 2014

दोस्ती

दोस्ती एक बेशकीमती एहसास है। जो पास है उसे खोना नहीं और कोई हाथ बढ़ाये तो छोड़ना नहीं।

मेरी दोस्ती के तलबगार, तुम हो ये मैंने माना
कहो तो खुलकर आज, अपने भी एहसास रख दूं !
तकदीर में बची हुई, वो हर सांस रख दूं,
आ तेरे हाथों में, जो कुछ है पास रख दूं !!

©-प्रशांत सेठ

कल के लिए ज़िंदा रहें

कल के लिए कुछ तो यहाँ ईमान ज़िंदा रहे,
दिल में रिश्ते और वफ़ा का नाम ज़िंदा रहे !
मोहब्बत, यकीन, रहम, इबादत रहे किरदार में,
हर शख्स में ज़रा ज़रा सा इंसान ज़िंदा रहे !!

गुम ना पाये तजुर्बों की भीड़ में बचपन,
मासूमियत हर चेहरे पर यूँ ताबिन्दा रहे !!

ज़िंदा रहे और ज़िंदगी मुस्कुराये लबों पर,
गम जो टकराये कभी तो वो भी शर्मिंदा रहे !!

उड़े, मगर लौट आये मन, शाम ढलने तक,
रात घर में, अपनी ख्वाहिश का परिंदा रहे !!

लाशों के ढेर पर सब छूने चले आसमान,
कोई तो इस शहर में ज़मीन का बाशिंदा रहे !!

© - प्रशांत सेठ

ताबिन्दा = चमकता, बाशिंदा = रहने वाला

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Wednesday, April 23, 2014

जो मन देखा अपना...

मन चंचल होता है। कभी लोभ में, कभी भावुकता में, या अन्य भावनाओं के वशीभूत होकर, अनेक ऐसे प्रलोभन देता है कि बुद्धि और विवेक दोनों समर्पण कर देते है। मन की इच्छा पूरी करने के लिये, अनेक बार हम सत्य को भी नकार कर निर्णय लेते हैं। कालांतर में यही निर्णय दुःख का कारण बनते हैं।

अधिकार करना है तो अपने मन पर किया जाए। जीतने की चीज़ तो अपना मन है। जिसने खुद पर नियंत्रण कर लिया उसने संसार पर कर लिया।

एक मुक्तक

जो औरों पर की, तो बिखर जाओगे,
हुकूमत खुद पर कर लो, निखर जाओगे !
दुनिया से भागे तो ठिकाने और भी हैं,
खुद से भाग कर मगर किधर जाओगे !!

© - प्रशान्त सेठ

Saturday, April 19, 2014

अंदर बाहर एक ही मौसम

मन में सामाजिक आंदोलन रहे और राजनीति को शस्त्र की तरह प्रयोग करें। ऐसे ही साथियों से दिल मिलता है। उनको बहुत दूर रखता हूँ जिनके मन में राजनीति है और आंदोलन को शस्त्र बनाना चाहते हैं। स्वयं को स्थापित करने का उद्देश्य छोड़िये और मूल्यों को स्थापित करने की बात सोचिये। छोटी सी बात है मगर फर्क बड़ा पड़ जाता है।

एक मुक्तक...

तेरे अंदर जिस दिन सारा खुदगर्ज़ मौसम बदलेगा,
झूठ फरेब नफरत ज़ुल्म, ये सारा आलम बदलेगा !
अंदर बाहर का तुम अपने, एक ही मौसम कर चलो,
खुद का मन बदलेगा तो गुलशन गुलशन बदलेगा !!

© - प्रशांत सेठ

Monday, April 14, 2014

सुबह तक तो जलना होगा

भोर की पहली किरण से, सूरज सबसे पहले उस दीप को प्रणाम करता है जो रात भर जला है। सुबह होती है और रोज़ होती है, कल फिर होगी। भोर की प्रतीक्षा सो कर करने वालों के जीवन में अंधकार रोज आता है, मगर जिसने जलना सीख लिया, वह अंधकार मुक्त हो गया। इस अन्यायपूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था को ललकारने वाले हर सिपाही को समर्पित...

कुछ दूर तक तो चलना होगा
शौर्य को, त्याग को
सुबह तक तो जलना होगा
संघर्ष की आग को

आँधियों बरसातों में भी
खिलना होगा बाग को
गीत क्रांति का लिख चुका है
गढ़ना होगा राग को

हर तरफ जुल्म हो तब
उठना होगा समाज को
राष्ट्र के दामन पर है जो
मिटना होगा दाग को

दी जिसने है चुनौती
इस अंधियारी रात को
नतमस्तक है सूरज भी
छोटे से चिराग को

© - प्रशांत सेठ

Thursday, April 10, 2014

थप्पड़ों की राजनीति

हालाँकि हिंसा गलत है मगर केजरीवाल पहले ऐसे नेता हैं जो जनता की पहुँच के इतने अंदर हैं। और कुछ हो न हो आम लोगों का साहस तो जागा है। दुआ कीजिए की जनता इतनी समझदार और शिक्षित भी हो जाये कि अपने आक्रोश को शब्दों से और वोटों से व्यक्त करना सीख जाये।
बाकी छोड़ो इस थपड़ियाई की कुछ तो कीमत उस गरीब आदमी को मिली ही होगी। चलो किसी गरीब का भला यूँ ही सही।

अवाम-ए-हिंद इतनी औकात तक पहुँचे
नेताओं के गिरेबाँ तक हाथ तो पहुँचे
मेरे गालों पर तेरे हाथ के निशाँ सही
मुझ तक मेरे दोस्त, तेरे जज़बात तो पहुँचे

- प्रशांत सेठ

Monday, April 7, 2014

विचार यात्रा

समाज को श्रेष्ठ विचार और मार्ग देने वाले लोग भी अक्सर एक गलती कर जाते हैं। श्रेय लेने की होड़ में भूल जाते हैं कि विचार अनश्वर और नाम नश्वर होता है। दोनों की गति अलग है। किसी के नाम की गठरी का बोझ लेकर विचार बहुत दूर नहीं जा सकता। नाम तो एक दिन वैसे भी मिट जाना है।
स्वयं के मन की इच्छाओं को सामाजिक क्रांति से जोड़कर चलने वाले अनेक मित्र परेशान हैं कि लोग उनकी बात क्यों नही समझते। इसलिए नही समझते क्योंकि आप स्वयं को स्थापित करने के लिये संघर्ष करने लग जाते हैं। जबकि संघर्ष होना चाहिए सिद्धांतों को स्थापित करने के लिये।
हम सब विचारों के वाहक हैं, सृजक नहीं। विचार सृष्टि में पहले से ही विद्यमान हैं। तभी तो हृदय में आने वाले विचार कहीं न कहीं ग्रंथों में पूर्व लिखित मिल जाते हैं। विचार अपनी यात्रा पर है। एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क के माध्यम से पूर्णता की ओर। इसके प्रवाह को अपने साथ बाँधने की कोशिश में हम उसकी यात्रा में बाधा उत्पन्न करते हैं। विचार भी स्वतंत्र रहें और हम भी। बंधन दोनों की प्रगति के लिये बाधक है, ऐसा मेरा मानना है।

मन की अनंत इच्छाओं के बोझ से
थक जाओ कभी जब स्वार्थपूर्ण सोच से
जीवन की दौड़ में ढूँढ़ना नि:स्वार्थ उद्देश्य
लोग साथ चल देंगे उस ही मोड़ से

- प्रशांत सेठ

Tuesday, April 1, 2014

मूर्ख दिवस

आज हम सब का दिन है। दुनिया भले ही इसे मूर्ख दिवस कहे मगर मूर्ख बनना हर किसी के बस की बात नही है। इसके लिये भावुकता चाहिए और भावनाओं के लिये दिल। आप सबको मूर्ख दिवस की बधाई। गर्व से कहो, हम मूर्ख हैं।

मेरे जज़बात ही मुझसे सम्हाले नही जाते
कुछ पन्ने इस किताब के निकाले नही जाते
मेरे एतबार को फाँसा दिमाग वालों ने अक्सर
ज़िंदगी से आज भी मकड़ जाले नही जाते

- प्रशांत सेठ

Monday, March 31, 2014

ऐब या हुनर

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ प्रतिभा होती है। मगर कई बार इस विषय में वह स्वयं नही जानता, दूसरों की तो बात ही छोड़ दीजिए। लोगों की नज़र में जो बहुत खराब हैं, मैंने अक्सर उनके अंदर बहुत अच्छा इंसान भी देखा है। किसी का ह्रदय परिवर्तन वही कर सकता है जिसको ऐब नही हुनर देखने की आदत हो। हुनर देखने के लिये भीतर उतरना पड़ता है।

ठहरा है खारा है शोर बहुत करता है
मगर अपने सीने में मोती लिये फिरता है
जिसने देखा है समंदर को साहिल पर खड़े होकर
वो तो फकत उसके ऐब गिना करता है

- प्रशांत सेठ

Tuesday, March 25, 2014

रोते हुये को हंसाया जाये

बनके आंसू जिया इस तरह जाये
चलो किसी की आँख से यूँ गिरा जाये
किसी के हिस्से का रो लें हम कभी
हमारे हिस्से का कोई मुस्कुरा जाये

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Sunday, March 23, 2014

बौध्दिक चौर्य

मनुष्य का स्वभाव है अहं। ये वो मानव प्रवृति है जो सम्मान पाने या पहचान बनाने की आकांक्षा को जन्म देती है। आत्मविश्वास के अभाव में स्वयं की मौलिकता को न तलाश कर, कई लोग दूसरों की रचनाओं को अपना बताकर पढ़ने का क्षणिक सुख पा लेते हैं। परन्तु खो देते हैं सृजन के असीम आनंद को। ये पंक्तियाँ समर्पित हैं ऐसे ही मित्रों को

किसी कोख से निकला, किसी सीने से बच्चा लगा
शेर मेरा था लेकिन, तेरे मुँह से भी अच्छा लगा

- प्रशांत सेठ

Saturday, March 22, 2014

धर्मयुद्ध

स्वाभिमान नहीं स्वार्थ जगाया
कैसा तुमने पार्थ जगाया
इस सदी के धर्मयुद्ध में कृष्ण
धर्म पराजित ही कहलाया

मानवता की स्थापना के उस
लक्ष्य से दूर भटक ये आया
जूझ रहा है चक्रव्यूह से
जो था इसने स्वयं रचाया

भ्रष्टाचार के हस्तिनापुर ने
फिर उल्लास उत्सव मनाया
शस्त्र छोड़ खड़ा कुरुक्षेत्र में
अर्जुन पुन: भ्रमित घबराया

राजनीति की चौसर पर क्या
लोभ संवरण कर नहीं पाया?
या फिर उसके रथ से कृष्ण
तू ही स्वयं उतर है आया?

हम सैनिक ये प्रश्न लिये हैं
राष्ट्रधर्म नहीं किसने निभाया?
बलिदानो को तत्पर थे फिर
अहं क्यों और कैसे टकराया?

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Friday, March 21, 2014

क्योंकि तुम आम हो ख़ास नहीं


साहस की कमी हो जिसमे
हो धीरज का वास नहीं
खड़े रहना क्षण भर भी
उस मनुज के पास नहीं

जो वेदना थी कल तक
वेदना क्यों वो आज नहीं
परिवर्तन का नारा रह गया
परिवर्तन की आस नहीं

बे-मोल हो गया इस बाज़ार में
प्रण संकल्प विश्वास कहीं
स्वार्थ वेदी पर पड़ा हुआ है
स्वराज निष्प्राण नि-श्वास यहीं

बलिदानो की राह का सिपाही
सत्ता से रचाता रास नहीं
किन्तु आशा किरण कहती है
शायद तुम आम हो ख़ास नहीं

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ