बदलता कुछ नहीं है, बदलना पड़ता है। कैलेंडर का पन्ना भी पलटाना पड़ता है तब कहीं वर्ष बदलता है।
फिर ये वक़्त कैसे बदलेगा?
सकारात्मक दृष्टिकोण से बीते वक़्त को पलटा दीजिये। आने वाले कल का स्वागत कीजिये नई ऊर्जा से।
कितनी भी मुश्किलें हों उनका सामना कीजिये शिव जी के त्रिशूल से। शिव जी का त्रिशूल इच्छा, क्रिया और ज्ञान रुपी त्रिशक्तियों का प्रतीक माना जाता है। मात्र इच्छा करने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उसके लिये श्रम भी करना होता है। मात्र श्रम से भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उस लक्ष्य से सम्बंधित ज्ञान भी अर्जित करना पड़ता है।
मगर सबसे ज़रूरी बात। लक्ष्य के मूल में धर्म होना चाहिये, अधर्म नहीं। धर्म यानी सबके कल्याण की भावना से किया गया कोई भी कर्म। फिर पराजय का प्रश्न ही नहीं उठता। आइये इसी विश्वास के साथ स्वागत करें वर्ष 2015 का ....
बाधाओं के पर्वत हों, पथ में बिछे हों शूल भी
हर क्षण एक संग्राम सही, परिस्थितियां प्रतिकूल भी ।
उस पथिक की जय ही जय है, जिसका शस्त्र त्रिशूल हो
धर्म लक्ष्य का मूल हो और जीवन का उसूल भी ।।
© - प्रशांत सेठ
