"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये"
किसी ग़ज़ल के इस शेर से बिलकुल उलट ये ना जाने कौन सा धर्म है जिसने इतने मासूम बच्चों को मौत की नींद सुला दिया ....
हरगिज़ ये दिलेरी का कोई काम नहीं है
दहशत किसी भी मज़हब का पैग़ाम नहीं है ।
तुम जानो तुम्हारा ख़ुदा तुम्हारी इबादत
पर हमको तो यकीं है ये इस्लाम नहीं है ।।
क्या इतनी क़ुरबानी पर्याप्त है आतंकवाद के खिलाफ संपूर्ण विश्व को एकजुट करने के लिये? क्या यह वहशियाना कृत्य काफी है उन नासमझों को जगाने के लिये, जिन्होंने स्वयं इस नफरत के जिन्न को पाल कर बड़ा किया है? या फिर अभी इंतज़ार है खुद की बारी का?
धर्मान्धता किसी भी धर्म के लिए बुरी है क्योंकि ये मौलिक और नवीन चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है। यह अतिक्रमण करती है व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर।
धर्मान्ध वही हो सकता है जिसने दूसरे किसी धर्म को समझना तो दूर, अपने ही धर्म को ठीक से नहीं समझा। देश और दुनिया पर हुकूमत की चाहत लिये, हथियारों से लैस, ये लोग किसी धर्म के अनुयायी नहीं होते। ये अनुयायी होते हैं केवल स्वार्थ के, अहंकार के और सत्ता की भूख के।
इतिहास उठा के देख लीजिये; धर्मान्धता का जिन्न अंत में उसको ही खा जाता है जो इसका पालन करता है। इस मज़हबी जुनून को अपने दिल में जगह देने से पहले सोचिये की कहीं हम अपने ही हाथों अपना घर तो नहीं उजाड़ रहे; क्योंकि इस संकीर्ण सोच का भुगतान निश्चित रूप से हमारी संतानों को करना पड़ेगा ...
मिरे आँगन में अभी तो खिली थी
ज़िन्दगी चार कदम भी ना चली थी ।
लो मिट गई इस जुनूँ-ए-नफरत पर
ये नफरत इसी गोद में पली थी ।।
याद रखिये, इस नफरत को और अपनी संतान को एक ही गोद में, एक साथ नहीं पाला जा सकता....
कत्लो-गारत की वहशियाना नज़ीरों से
मासूम हाथ में ज़िहादी शमशीरों से ।
मुमकिन नहीं किसी सूरत, खिलना चमन में
फूल अमन के, दहशत की तदबीरों से ।।
© - प्रशांत सेठ
नज़ीर = उदाहरण, शमशीर = तलवार, तदबीर = योजना
No comments:
Post a Comment