Saturday, August 15, 2015

एक बेताल की व्यथा

कल रात सारा देश जब एक दूसरे को शुभकामनायें देने में व्यस्त था, मैं अपनी तलाश पर निकल चुका था। अंत में मेरी तलाश तो पूरी हो गई मगर मैं भाषण और जलसों से चूक गया। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं नहीं दूंगा; बल्कि एक कथा सुनाऊंगा, विक्रम बेताल की...

आखिर फुटपाथ पर सोता हुआ मिल गया
उसकी दुर्दशा देखी तो मैं हिल गया
पास जाकर देखा सांस चल रही थी
फिर भी आँखों में एक उम्मीद पल रही थी

मैंने कहा बाबा उठो, रात भर ढूँढ़ ढूँढ़ कर परेशान हो चुका हूँ
तुम निष्ठा की तरह गायब हो, मैं हिंदुस्तान हो चुका हूँ
क्या आज के दिन भी तुम्हें इस तरह से सोना चाहिये?
वहाँ लाल किले पर भाषण होना है, जल्दी आइये

वो बोला, शायद फिर से पंद्रह अगस्त आ रहा है
इसलिये इतनी व्यग्रता से मुझे ढूँढ़ा जा रहा है
चलो चलता हूँ, आज के भाषण में तो मुझे होना होगा
कल भले ही मेरी किस्मत में फुटपाथ का कोना होगा

लेकिन एक शर्त है, मैं तेरी पीठ पर चढूँगा
अपने पैरों से एक कदम भी नहीं चलूँगा
बेताल की तरह मुझे कांधों पर ढोना तेरी मजबूरी है
मैं राष्ट्रवाद हूँ, इसलिए तुझे विक्रमादित्य होना ज़रूरी है

रास्ते भर मैं अपनी कथा सुनाऊंगा
अड़सठ बरस की व्यथा बताऊंगा
और अपने कुछ प्रश्नों का जवाब मांगूंगा
आज़ादी के बाद का पूरा हिसाब मांगूंगा

सिर्फ भाषण और जुलूस में नहीं सम्मान चाहिए
मुझे हर हालत में समस्या का समाधान बताइये
सच तू बोल नहीं सकेगा, झूठ मैं सुन नहीं पाऊंगा
और उत्तर ना दिया तो किसी पेड़ से लटक जाऊंगा

अब सुन, आज़ादी के पहले मेरी बड़ी शान थी
आज फुटपाथ पर हूँ, तब ज़िन्दगी आलिशान थी
मुझसे अंग्रेजी हुकूमत भी थरथराती थी
बच्चे बच्चे में मेरी छवि नज़र आती थीं

मैं था तब सत्याग्रहियों की टोली में
स्वाभिमान की खद्दर वाली झोली में
मैं था विलायती कपड़ों की होली में
मैं था आज़ाद की अंतिम गोली में

गर्मी में, बरसात में या सर्दी में
मैं रहता था सुभाष की वर्दी में
मैं था उन जेलों में अंडमान की
भविष्य जहाँ लेता था आहुति वर्तमान की

वो बूढा जब आधी धोती में अड़ा रहता था
तब हिंदुस्तान सर उठाकर खड़ा रहता था
गूंजते थे धरती गगन स्वाधीनता के नारों से
मैं मरा नहीं कभी गोरों के अत्याचारों से

आज मैं मर रहा हूँ दस लाख के सूट में
कोयले की खदानों में, व्यापम की लूट में
मेरा जीवन संसद की तरह ठप्प है
मेरा अस्तित्व छप्पन इंच छाती जैसी गप्प है

मैं पूछता हूँ उनसे भी जो विपक्ष में बैठे हैं
किस बात का गुरूर है, किस बात पे ऐंठे हैं?
ये संसद जागीर नहीं है तुम्हारे बाप की
ये देश क्यों ढोता है गठरी किसी के पाप की?

अंत में, मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम वर्तमान हो
और उनसे भी जो भविष्य का हिंदुस्तान हो
तुम भी तो रिश्वत और घूसखोरी के आदि हो
तुम राष्ट्र की शक्ति नहीं, महज़ सवा सौ करोड़ की आबादी हो

बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह के देश में
तुम उलझे हो मंदिर मस्जिद के क्लेश में
स्वार्थ कबसे मज़हब का मर्म हो गया?
बोलो, राष्ट्र से ऊँचा कबसे धर्म हो गया?

मैंने कहा हे राष्ट्रवाद, माना के आपके प्रश्न सटीक हैं
लेकिन आप फुटपाथ पर ही भले हैं, ठीक हैं
इसके आगे मेरा स्वर गले में अटक चुका था
और राष्ट्रवाद? वो तो कबका पेड़ पर लटक चुका था

© - प्रशांत सेठ