हमारे एक मित्र (बड़े भाई) होते हैं ______ उर्फ़ उस्ताद। बहुत ही खतरनाक आदमी हैं। खतरनाक इसलिये क्योंकि दिल से पाक-साफ़ हैं। अब आप सोच रहे होंगे की पाक-साफ़ आदमी खतरनाक कैसे हो सकता है? अरे भाई जब नवाज़ शरीफ, शरीफ हो सकता है तो हमारे उस्ताद भी खतरनाक हो सकते हैं। आगे का वाकया पढ़के खुद ही समझ लीजिये।
तो हुआ यूँ की कल उनसे एक शेर हो गया। हो गया तक तो ठीक, मगर वो शेर फेसबुक की अदालत में पेश हो गया। दुर्भाग्य से वो गरीब शेर, लाइक और कमेंट्स के फेसबुकिया अनुदान से वंचित रह गया। हमारे उस्ताद ने मान लिया की शेर ठीक नहीं हुआ इसलिये उसे सज़ा-ए-मौत सुना दी। अब शेर है मियां, कोई याकूब मेमन तो है नहीं की फांसी दे दो। हमने अपील दायर की; हुज़ूर शेरों की औकात को फेसबुक के लाइक्स और कमेंट से नहीं तौला जाता। उन्होंने प्रश्न किया, फिर कैसे तौला जाता है?
इस प्रश्न के उत्तर में एक ख्याल, व्याकरण से बहुत दूर मगर अन्तःकरण के पास, आपकी अदालत में पेश है...
बहर रदीफ़ काफिये से ही, मत समझो शेर हुआ
भीग जाये मन तुम्हारा, तब समझो शेर हुआ
गोर-ए-दिल में दफ़्न कई, अफ़साने तो हैं लेकिन
ज़ख्म कोई जब बह निकले, तब समझो शेर हुआ
(गोर = कब्र)
कहने को बज़्म में उनकी, हर कोई ही शायर है
लफ़्ज़ों में जब दर्द उतरे, तब समझो शेर हुआ
बात पुरानी हो जाती है, इस पल की उस पल में
वक़्त दोहराये लफ़्ज़ों को, तब समझो शेर हुआ
अशआरों के तीर नहीं, पल भर को तड़पाते है
इसी दम गर जाँ निकले जब, तब समझो शेर हुआ
अशआर = शेर
आह वाह की बैसाखी पे, दूर कितना जायेगी
बात फलक तक जा पहुंचे जब, तब समझो शेर हुआ
जज़्ब हैं एहसास कई 'सेठ' की इस खामोशी में
ज़ुबाने-कलम जब आ निकलें, तब समझो शेर हुआ
© - प्रशांत सेठ