Monday, July 27, 2015

सुखन

हमारे एक मित्र (बड़े भाई) होते हैं ______ उर्फ़ उस्ताद। बहुत ही खतरनाक आदमी हैं। खतरनाक इसलिये क्योंकि दिल से पाक-साफ़ हैं। अब आप सोच रहे होंगे की पाक-साफ़ आदमी खतरनाक कैसे हो सकता है? अरे भाई जब नवाज़ शरीफ, शरीफ हो सकता है तो हमारे उस्ताद भी खतरनाक हो सकते हैं। आगे का वाकया पढ़के खुद ही समझ लीजिये।

तो हुआ यूँ की कल उनसे एक शेर हो गया। हो गया तक तो ठीक, मगर वो शेर फेसबुक की अदालत में पेश हो गया। दुर्भाग्य से वो गरीब शेर, लाइक और कमेंट्स के फेसबुकिया अनुदान से वंचित रह गया। हमारे उस्ताद ने मान लिया की शेर ठीक नहीं हुआ इसलिये उसे सज़ा-ए-मौत सुना दी। अब शेर है मियां, कोई याकूब मेमन तो है नहीं की फांसी दे दो। हमने अपील दायर की; हुज़ूर शेरों की औकात को फेसबुक के लाइक्स और कमेंट से नहीं तौला जाता। उन्होंने प्रश्न किया, फिर कैसे तौला जाता है?

इस प्रश्न के उत्तर में एक ख्याल, व्याकरण से बहुत दूर मगर अन्तःकरण के पास, आपकी अदालत में पेश है...

बहर रदीफ़ काफिये से ही, मत समझो शेर हुआ
भीग जाये मन तुम्हारा, तब समझो शेर हुआ

गोर-ए-दिल में दफ़्न कई, अफ़साने तो हैं लेकिन
ज़ख्म कोई जब बह निकले, तब समझो शेर हुआ
(गोर = कब्र)

कहने को बज़्म में उनकी, हर कोई ही शायर है
लफ़्ज़ों में जब दर्द उतरे, तब समझो शेर हुआ

बात पुरानी हो जाती है, इस पल की उस पल में
वक़्त दोहराये लफ़्ज़ों को, तब समझो शेर हुआ

अशआरों के तीर नहीं, पल भर को तड़पाते है
इसी दम गर जाँ निकले जब, तब समझो शेर हुआ
अशआर = शेर

आह वाह की बैसाखी पे, दूर कितना जायेगी
बात फलक तक जा पहुंचे जब, तब समझो शेर हुआ

जज़्ब हैं एहसास कई 'सेठ' की इस खामोशी में
ज़ुबाने-कलम जब आ निकलें, तब समझो शेर हुआ

© - प्रशांत सेठ

Saturday, July 11, 2015

गुरु भजन

जन्म जन्मों से भटकते हुये मानव मन को त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाले और शीतलता प्रदान करने वाले गुरु चरणों में समर्पित ...

गुरुवर मेरे व्याकुल मन को, शीतलता अब पाने दो
पावन चरणों से तुम्हारे, आज मिलन हो जाने दो

ज्ञान ज्योति पाकर भी मैं, समझ सका ना उसका सार
व्याप्त था जीवन में मेरे, गहन अज्ञान और अंधकार
भक्ति के विस्मृत मेघों को, मन पटल पर अब छाने दो
गुरुवर ...

कामनाओं का गगन असीम, मैं उड़ता था पंख पसार
खूब किया मैंने अपनी, इच्छाओं के नभ का विस्तार
स्वप्न के पीछे उड़ता पंछी, साँझ ढले घर आने दो
गुरुवर ...

अश्रु भरे इन नयनों से ,बरस रहा है प्रेम अपार
भाव ह्रदय को पिघला कर, मथ रहा है बारम्बार
आज अविरल इन आँखों से, भावों को बह जाने दो
गुरूवर मेरे व्याकुल मन को शीतलता अब पाने दो

चरण अनुरागी
प्रशांत सेठ

Friday, July 10, 2015

आजकल कम लिखता हूँ

आज कुछ यूँ ही... बेमक़सद सा

आँख से आंसू चुराकर "नम" लिखता हूँ
आग दिल में खुद लगाकर "बम" लिखता हूँ

जाहिल हूँ यकीनन मैं सुखन के फन में
मैं मैं मैं की दुनिया में "हम" लिखता हूँ

रफ्तारों के इस दौर में, अजब शख्स हूँ
ना जाने क्या सोचकर "थम" लिखता हूँ

ज़माना ढूंढता है दौलत में खुशियाँ
अपनी ये फितरत इसको "गम" लिखता हूँ

रिश्ते प्यार वफ़ा ईमां और इंसानियत
अब पुराने एहसासों को कम लिखता हूँ

और एक शेर व्यापम घोटाले से व्यथित होकर...

बात अच्छे दिनों की जब जब होती है
एक लफ्ज़ में तब फिर मैं "व्यापम" लिखता हूँ

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, July 1, 2015

माँ मुझे आसमान छूना है

बहुत दिन पहले देखा था इस प्यारी सी तस्वीर को। इसमें एक कविता छुपी सी दिखी तो तुरंत ज़हन में save कर लिया था। आज फिर आँखों के सामने ये तस्वीर आई तो मुस्कुराये बिना नहीं रह सका।

बचपन से लेकर अब तक की जीवन यात्रा आँखों में तैर गई। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उपजते मनोभावों को व्यक्त करने की कोशिश में एक हलकी फुलकी रचना, अलग अंदाज़ में और बहुत ही सरल शब्दों में...

माँ मुझे आसमान छूना है

मुझे बढ़ना रात चौगुना
और बढ़ना दिन दूना है
शैशव मेरा रोया था
माँ, मुझे आसमान छूना है

मन भाग रहा मोटर सा
तन मगर अभी लूना है
बचपन मेरा कहता था
माँ, मुझे आसमान छूना है

कंधे तक अब आ गया हूँ
मगर ये तो सिर्फ नमूना है
लड़कपन मेरा ज़िद पर था
मुझे तो आसमान छूना है

कद तुमसे ऊंचा हुआ पर
बिना तुम्हारे सब सूना है
जवानी तड़प कर बोली थी
माँ की गोद में फिर सोना है

बचपन गाँव सा भोला था
अब जीवन मुम्बई-पूना है
उम्र थक कर कहने लगी है
मुझको फिर बालक होना है

...अब नहीं आसमान छूना है

© - प्रशांत सेठ