मन पर पहले से रंग चढ़े हैं
तब हमने ये अर्थ गढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की राह में
जहाँ खड़े थे वहीँ खड़े हैं
समग्र नहीं है दृष्टि ही जब
रहस्य खोले क्या सृष्टि भी तब
समझ की सीमित इस परिधि में
कैसे हो ज्ञान वृष्टि भी अब
महासमुद्र में तैर रहे ज्यों
मिट्टी के एक खाली घड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...
शब्दजाल में उलझे मन को
निहित अर्थ स्वीकार नहीं है
अपनी अपनी है परिभाषा
सत्य से सरोकार नहीं है
हरे भगवा रंग में रंगकर
ग्रंथ तुमने और हमने पढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की....
तृण जितना आकार लिये हैं
पर्वत सा अहंकार किये हैं
हम अपने अस्तित्व को ऊँचा
गौण सारा संसार किये हैं
उसपर बुद्धि के द्वार पर
हठ के ये द्वारपाल अड़े हैं
सत्य अन्वेषण की....
समय काल परिस्थिति में ढलकर
थम जाते हैं कदम दो चलकर
जिज्ञासा के खरगोश भी जब
चल नहीं पाते लगन के बल पर
वही पहुँचे हैं सत्य तक जिनके
धैर्य के कछुये लक्ष्य से बड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...
© - प्रशांत सेठ