Tuesday, January 16, 2018

अपने अपने चश्मे

मन पर पहले से रंग चढ़े हैं
तब हमने ये अर्थ गढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की राह में
जहाँ खड़े थे वहीँ खड़े हैं

समग्र नहीं है दृष्टि ही जब
रहस्य खोले क्या सृष्टि भी तब
समझ की सीमित इस परिधि में
कैसे हो ज्ञान वृष्टि भी अब
महासमुद्र में तैर रहे ज्यों
मिट्टी के एक खाली घड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...

शब्दजाल में उलझे मन को
निहित अर्थ स्वीकार नहीं है
अपनी अपनी है परिभाषा
सत्य से सरोकार नहीं है
हरे भगवा रंग में रंगकर
ग्रंथ तुमने और हमने पढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की....

तृण जितना आकार लिये हैं
पर्वत सा अहंकार किये हैं
हम अपने अस्तित्व को ऊँचा
गौण सारा संसार किये हैं
उसपर बुद्धि के द्वार पर
हठ के ये द्वारपाल अड़े हैं
सत्य अन्वेषण की....

समय काल परिस्थिति में ढलकर
थम जाते हैं कदम दो चलकर
जिज्ञासा के खरगोश भी जब
चल नहीं पाते लगन के बल पर
वही पहुँचे हैं सत्य तक जिनके
धैर्य के कछुये लक्ष्य से बड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...

© - प्रशांत सेठ