Tuesday, March 31, 2020

उसकी चिट्ठी

सच है कि चिट्ठी आई है कुदरत की
बनके अवरोधक
जीवन की निर्बाध गति में
और मन के चौराहे पर, देखकर लाल बत्ती
ठहर गई हैं, सारी इच्छाएं

ये तो अच्छा है अभी खुली है
एक खिड़की उम्मीद की
जहाँ से आ रही हैं
हवाओं संग बारिश की बूंदें
और मिट्टी की सौंधी खुशबू 
इस खुशनुमा खबर के साथ
कि अभी बांझ नहीं हुई ये धरती

शायद बच्चे निकलेंगे, फिर से गलियों में
मोबाइल की कैद से होकर मुक्त
शायद सुबह घर से निकला करेंगी
अब सिर्फ ज़रूरतें
जो लौट आएंगी शाम ढलने के पहले
शायद हवस बैठ जाएगी सिमट कर 
किसी कोने में

शायद जीत जाएंगी सायकिलें
मोटरकारों से
और धुआं उगलती चिमनियों के काले बादल
छोड़ देंगे रास्ता, परिंदों का
शायद ऊगेंगे अब दरख़्त भी
कुल्हाड़ियों के भय से मुक्त

शायद लौट आएंगे बहुत से प्रवासी पंछी
अपने घोंसले में
शायद नहीं मिलेगा अब
किसी महानगर के फ्लैट में, इंतज़ार करता
एक बूढ़ी माँ का कंकाल

शायद हाथ मिलाएंगे
और गले भी लगेंगे दोस्त
शायद मस्जिदें सुनना सीख लेंगी घंटियां
और मंदिर सुना करेंगे अजान
शायद चल पड़ेगी दुनिया फिर से
मगर इस बार बदली हुई चाल से

© - प्रशांत सेठ

Thursday, March 26, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परम्पराएं - क्वारंटाइन बनाम सूतक - 3

सनातन वैदिक परम्पराएं जिन्हें हमने ढकोसला समझ कर त्याग दिया है, वे किसी धर्म का प्रतिपादन नहीं करती थीं; बल्कि प्रकृति के गूढ़ विज्ञान की गहरी समझ रखने वाली एक उन्नत जीवन शैली थी। कोरोना के कारण आज विश्व बहुत सी उन पद्धतियों को अपनाने को मजबूर हो रहा है, जिन्हें हज़ारों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने मानव सभ्यता के साथ प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखते हुए विकसित किया था; जैसे कि शवों का दाह, नमस्कार की मुद्रा में अभिवादन, इत्यादि। आज जिस क्वारंटाइन के लिए हम मजबूर हो रहे हैं, इसी को प्राचीन समय पर सूतक कहा जाता था। इसलिए आज का विषय यही है।

3 - क्वारंटाइन बनाम सूतक

आज देश में विगत 22 मार्च से 15 अप्रैल तक, हम सब अनिवार्य क्वारंटाइन में हैं। यानि प्रत्येक परिवार खुद में सीमित रहने को विवश है। कारण यह है कि भूलवश भी कोई संक्रमित परिवार किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ना आए, जिससे कि COVID19 को फैलने से रोका जा सके।

सनातन परम्पराओं में कुछ विशेष परिस्थितियों में सूतक की मान्यता थी। परिवार में किसी का निधन होने पर, बच्चे का जन्म होने पर, सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के दौरान, इत्यादि। ऐसी स्थितियों में नीम या हल्दी के पानी से स्नान की भी परम्परा होती थी। सामान्य तौर पर भी घर में हाथ-पाँव धोकर ही प्रवेश किया जाता था।

यह तो सभी जानते हैं कि किसी ना किसी रोग के बहाने ही देह से प्राणों का गमन होता है। इस कारण से भी और मृत देह को कुछ समय घर में रखने के कारण भी वातावरण में जीवाणुओं की उत्पत्ति हो जाती है। अतः कुछ दिन के लिए संबंधित परिवार के घर में प्रवेश निषेध रहता था और मिलने वाले लोग घर के बाहर ही बैठा करते थे। मृत व्यक्ति के उपयोग की सभी वस्तुएं त्याग दी जाती थीं। शोकग्रस्त परिवार से शुचिता के पालन की अपेक्षा करना उचित नहीं था, लिहाजा भोजन, इत्यादि भी अन्य घरों से आने का नियम था। जो लोग दाह संस्कार में सम्मिलित होते थे, वे भी बिना स्नान के किसी अन्य को स्पर्श नहीं करते थे और बाहर ही स्नान करके अपने घरों में प्रवेश करते थे।

इसी प्रकार घर में बच्चे का जन्म होने पर माँ एवं शिशु को महीने भर सूतक में यनि क्वारंटाइन में रखा जाता है। मेडिकल साइंस इस बात की पुष्टि करती है कि इस दौरान शिशु का रक्षा तंत्र (immune system) विकसित नहीं होता और माँ का रक्षा तंत्र भी कमजोर होता है। अतः अन्य लोगों के माध्यम से जीवाणुओं के संपर्क में आने का खतरा होने के कारण, दोनों को सूतक में रखा जाता था।

ग्रहण के दौरान सूर्य की किरणों से आँख के रेटिना की कोशिकाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को विज्ञान जान चुका है। स्पष्ट है कि अन्य कोशिकाओं पर भी कुछ ना कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता होगा। कोरोना एवं इसकी प्रजाति के अन्य वायरस धूप में कुछ देर रहने पर नष्ट हो जाते हैं ऐसा बताया जा रहा है। स्पष्ट है कि सूर्य की किरणों की इंटेंसिटी में कमी आना इन वायरस के लिए वरदान है। हम अंदाज लगा सकते हैं कि हमारी परम्पराओं में ग्रहण काल में सूतक की मान्यता क्यों रही होगी। इसके अलावा ऋतु परिवर्तन के समय भी वायरस संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है। वहीं चंद्रमा और जल तत्व के संबंध को विज्ञान भी मानता है। इसका प्रमाण समुद्र के ज्वार-भाटे में देखा जा सकता है। मानव शरीर में औसतन 60 और मष्तिष्क में 70 प्रतिशत जल होने की वजह से चंद्रमा का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। यह प्रभाव मनोवैज्ञानिक होता है। मन के उद्वेग का हार्मोनल असंतुलन और फिर शारीरिक स्वास्थ्य पर उसका दुष्प्रभाव तो सभी जानते हैं।

हमने अपनी आधुनिकता के अहंकार में, पूर्वजों के जिस ज्ञान को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया, आज उसी की शरण में वापस लौट रहे हैं। हम शिक्षित और विकसित जरूर हो गए; हमने मष्तिष्क में जानकारियों का असीम भंडार भी जमा कर लिया; परंतु वास्तविक ज्ञानी होने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता थी, उसको तकनीक के समक्ष समर्पित कर दिया। हमने प्रकृति को जिस हाल में पहुँचा दिया, उससे यही सिद्ध होता है कि हम विशिष्ट विधाओं के विद्वान तो कहे जा सकते हैं, परंतु ज्ञानी कदापि नहीं।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 25, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परम्पराएं - प्रशासनिक लक्ष्मण रेखा - 2

कोरोना रूपी आपदा से निपटने के लिए सम्पूर्ण भारत को 21 दिन के लिये lockdown कर दिया गया है। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि आपके परिवार का एक सदस्य होने के अधिकार से, मैं सबके घर के बाहर एक लक्ष्मण रेखा खींच रहा हूँ। अतः आज का विषय थोड़े हास परिहास के साथ ये है।

प्रशासनिक लक्ष्मण रेखा - 2

आगामी 21 दिन तक घर की दहरी के पार एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है। यह "लक्ष्मण रेखा" प्रशासनिक पाबंदी के लिए एक प्रतीकात्मक शब्द है। त्रेता युग में श्री राम स्वर्णमृग रूपी रहस्य की खोज में पंचवटी का प्रशासन लक्ष्मण जी को सौंप कर गए थे। तभी "लक्ष्मण बचाओ!" की आवाज़ सुनकर आकस्मिक आपदा से निपटने के लिए सीता जी ने लक्ष्मण को आदेश दिया। यहाँ गौर करने लायक एक बात और है कि सीता जी के इस आदेश ने श्रीराम जी के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें लक्ष्मण जी को कुटी के बाहर पहरा देने का निर्देश था। तब विवश होकर लक्ष्मण जी ने प्रशासनिक अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें कुटी से बाहर ना निकलने का निवेदन किया। संभवतः कुटी के बाहर नकारात्मक शक्तियों के षड़यंत्र का आभास होने पर ऐसा निर्णय लिया गया होगा।

सृष्टि की वास्तविक और स्थायी सत्ता तो ईश्वर के अधीन है, इसलिए समय समय पर बनने वाली सरकारों के मुखिया को हम लक्ष्मण मान सकते हैं। विशेषकर उन्हें, जो घर परिवार को त्याग कर जनता जनार्दन की सेवा में रत हैं। आज भी जब देश भर से आवाजें आनी शुरू हुईं "लक्ष्मण बचाओ!!"; तो जनता रूपी सीता ने अपने लक्ष्मण को कोरोना रूपी अदृश्य संकट से निपटने का आदेश दिया। तब अपने लक्ष्मण जी ने, सीता रूपी पवित्र और भोली जनता को लक्ष्मण रेखा ना लांघने का निर्देश दिया। क्योंकि बाहर कोरोना रूपी रावण आपका हरण करके लंका की अशोक वाटिका रूपी आइसोलेशन वार्ड में ले जाने को तत्पर बैठा है। जो लोग कोरोना से नहीं डरते, उन्हें भी फिलहाल पुलिस को रावण और जेल को अशोक वाटिका समझ कर घर बैठ जाना चाहिए। पुष्पक विमान की यात्रा दुःखदायी सिद्ध हो सकती है।

सार ये है कि किसी भी प्रकार के स्वर्ण मृग, यानी व्यवसाय अथवा धर्म के लोभ में भी घर से बाहर ना निकलें, क्योंकि कोरोना के द्वारा हरण होने की दशा में डॉक्टर रूपी जटायु, अपने प्राणों को संकट में डाल कर भी आपको बचाने में असमर्थ हो सकते हैं।

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परंपराएं - तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी संकट से यदि शिक्षा लेकर नहीं निकले तो संघर्ष व्यर्थ हो जाता है। परंतु शिक्षा क्या ली गई, ये अपने अपने अनुभव पर निर्भर करता है; और अनुभव अपनी अपनी दृष्टि और तर्क पर। कोरोना के रूप में आई इस आपदा ने हमें वापस उन परम्पराओं की ओर मोड़ दिया, जिन्हें हम ढकोसला कहकर तज दिए थे। परंतु आज उन्हीं कुछ परम्पराओं का वैज्ञानिक कारण समझ में आ रहा है। इसी से प्रेरित ये शृंखला प्रारंभ करने का विचार उत्पन्न हुआ। इस गूढ़ विषय पर पूरी तरह लिखने का मेरा सामर्थ्य और ज्ञान नहीं है, तथापि इस अपेक्षा से लिख रहा हूँ कि यह चिंतन श्रृंखला प्रारंभ हो और सभी लोग इस विषय पर अपने अपने अनुभव साझा करें।

तर्क के इस युग में वेद और उनमें निहित ज्ञान पर विश्वास क्यों व कैसे हो? इसी को ध्यान में रखते हुए आज पहला विषय ये चुना है।

1. तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी ज्ञान अथवा व्यक्ति को जीवन मे तभी स्वीकार किया जाता है जब उसमें आपकी श्रद्धा उत्पन्न हो। श्रद्धा तभी उत्पन्न होती है जब आपको विश्वास हो जाता है कि उक्त व्यक्ति मेरा हित ही चाहता है और उसका कोई निजी लाभ नहीं है। इसीलिए अपने माता-पिता में, पूर्वजों में और पूर्वजों द्वारा रचित वेदों में अश्रद्धा होने का कोई कारण नहीं है। तथापि आज के युग में जिज्ञासा, ये जरूर चाहती है कि इन वैदिक परम्पराओं के पीछे का विज्ञान भी ज्ञात हो तो स्वीकार्यता सरल और व्यापक हो जाएगी। कठिनाई ये है कि वेदों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं रचा। ये हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों के हज़ारों वर्षों के प्रयोग और अनुभव थे, जो निरंतर परिष्कृत होते गए। उक्त काल में सर्व स्वीकार्य और सिद्ध अनुभवों ने वेदों में स्थान पाया। लेकिन आज उनमें से एक भी हमारे तर्कों को शांत करने के लिए उपस्थित नहीं है। अतः तर्कपूर्ण बुद्धि में उत्पन्न अश्रद्धा के लिए मेरे पास एक ही जवाब है।

"तर्क अपनी स्वयं की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है, और श्रद्धा अपने से अधिक ज्ञानियों की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है।"

हमारे पूर्वजों ने हमारी पीढ़ियों से यही अपेक्षा की होगी के हम उनके ज्ञान को सीढ़ी बनाकर और आगे खोज करें। ना कि उनके अर्जित ज्ञान को नकार कर, पुनः शून्य से शुरू करके, सारे अनुभव खुद करें। सारे अनुभव स्वयं करने के लिए कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे। दूसरों के अनुभवों से सीख लेने वाले कम समय में अधिक ज्ञानार्जन कर लेते हैं।

अब बात आती है विश्वास और अंधविश्वास पर। तो आपको जानकर हैरत होगी कि अंधविश्वास ही विश्वास है, वरना विश्वास है ही नहीं। कैसे? इसके लिए मैं आपको एक सच्चा अनुभव सुनाता हूँ।

किसी नए प्रोडक्ट की मार्केटिंग के दौरान मैं एक व्यवसायी को प्रोडक्ट के तमाम गुण और लाभ, इत्यादि बता रहा था। मेरी हर बात से सहमत होने के बावजूद भी ऑर्डर देने को वो राजी नहीं हो रहा था। कारण पूछा तो उसके मुँह से यह निकल गया कि "मुझे आपकी बात पर 90 प्रतिशत विश्वास है लेकिन..."। 

मैंने उससे कहा- मित्र, विश्वास या तो 100 प्रतिशत यानी अंधा होता है, या नहीं होता। पूछो कैसे?

उसने पूछा - कैसे

मैंने कहा- यही बात आज आप अपनी श्रीमतीजी से बोलकर देखिएगा कि मुझे तुमपर 90 नहीं, बल्कि 99 प्रतिशत विश्वास है। आपको जवाब वहीं मिल जाएगा लेकिन उस 1 प्रतिशत के चक्कर मे 99 प्रतिशत जोखिम है आपका।

कहने की जरूरत नहीं के मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने में तो सफल रहा है, लेकिन मुझे स्वयं भी ज्ञान हुआ कि लाख तर्क क्षमता होने के बावजूद भी हम जीवन के अनेक क्षेत्रों में अंधविश्वास ही नहीं, बल्कि भक्ति करते हैं। और अपने परिवार, गुरुजनों एवं इष्ट मित्रों पर इस अंधविश्वास और भक्ति के बिना जीवन अकल्पनीय है, कुरूप है। जीवन की सुंदरता इसी अंधविश्वास में है। आप अपनी सेना पर, डॉक्टरों पर, सहयोगियों पर, प्रशासन पर, सरकार पर अंधविश्वास किए बिना शांति से नहीं जी सकते। इसीलिए अविश्वासी व्यक्ति निरंतर अशांत रहता है।

अतः सीमित बुद्धि के तर्कों की सहायता से उस असीमित ज्ञान का उपलब्ध होना संभव ही नहीं। पूर्वजों के ज्ञान पर श्रद्धा और विश्वास करके, जीवन में उसे उतारकर ही, हम अनुभव द्वारा उसे सिद्ध कर सकते हैं; वर्तमान युग के अनुसार निरंतर परिष्कृत भी।

- प्रशांत सेठ

Sunday, March 22, 2020

कर्फ्यू

क्या तुम रोक पाओगे आज?
मन का अपने घर से निकलना
भूली बिसरी किन्ही पुरानी
खोई हुई यादों से मिलना

घर की चार दीवारों में जो
जीवन कुछ दिन आ ठहरा
मिल लो उस अनजाने से भी
दर्पण जिसका है चेहरा

स्मृतियों के गलियारे में
चुपके से दबे पाँव चलना
और यदि वक्त मिल जाये तो
कुछ उधड़े रिश्तों को सिलना

वरना तो सदा ही मन पर
ज़रूरतों का था पहरा
या फिर दुनिया की दौड़ से
रिश्ता इतना था गहरा

भूल गए थे फूल प्रेम के
हृदय की बगिया में खिलना
आज उसी बाग में छुपकर
अपनी हरियाली से मिलना

बंधा है मुस्कानें खोकर
सर पे दायित्व का सहरा
ये भीतर का मौन नहीं सच
शोर बहुत है, मन बहरा

इन ठहरे ठहरे लम्हों में
खुद से खुद का हो मिलना
रिहाई अपनी कैद से लेकर
खूब निकलना खूब निकलना

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 18, 2020

अहिल्या

स्त्रियां हो जाती हैं पत्थर
जब छली जाती हैं
पत्थर हो जाते हैं स्त्री
जब स्पर्श करता है प्रेम

किसी कठोर आवरण के अंतस में छुपी
कोमलता में
निहित रहती है उर्वरता
संभवतः यह संतुलन ही शर्त है
सृजन के बीज की

तभी तो
पुरुषत्व के यथार्थ में संरक्षित
स्त्री की कोमल कल्पनाएं
कर देती हैं सृजन
एक सृष्टि का

मगर जब
यथार्थ भटकता हो अनभिज्ञ
मन के संकल्पों से
या मन की कल्पनाओं को अस्वीकार हो
यथार्थ का बंधन,
तब बिगड़ जाता है प्रकृति का संतुलन
नष्ट हो जाती है उर्वरता

तुमने सुना होगा
भटकते हैं बहुत से पुरुषत्व के अहं
ठोकर खाते शिलाओं से

और बहुत सी निष्प्राण शिलाओं में
आज भी धड़कती हैं अहिल्याएँ
एक स्पर्श की प्रतीक्षा में
किसी मर्यादित पुरुषोत्तम के

© - प्रशांत सेठ

Sunday, March 8, 2020

प्रियतमा

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं

"प्रियतमा"

तुमने छू लिया चांद को
अपनी उड़ान से
तुमने हरा दिया रेसिंग ट्रैक को
अपनी रफ्तार से
तुमने झुका दिया हिमशिखरों को
अपने हौसले से

उधर आज भी
सुदूर गाँव में कहीं,
किसी बैलगाड़ी के पीछे चलते चलते
युग बीते, मगर
तुम पहुँच नहीं पाईं
बैलों की लगाम तक

यकीन मानो
निर्भरता से आत्मनिर्भरता तक
तुम्हारा यह सफर
पुरुषत्व की पराजय नहीं है
बल्कि, खरीद सकते हैं हम-तुम मिलकर
बैलों की एक और जोड़ी

© - प्रशांत सेठ