Wednesday, November 25, 2015

मधुर स्मृतियाँ

सुर बिना कब पूरे थे गीत
नेह बिना अधूरे मनमीत
साज़ ने जाना जब सरगम को
तब जन्मी दुनिया में प्रीत

जब सफ़र और हमसफ़र दोनों मन के अनुकूल हों तो वक़्त का पता ही नहीं चलता। 19 वर्ष चलते चलते कब इतनी दूर आ गये पता ही नहीं चला। आभार तुम्हारा दिव्या सेठ।

आज तुम्हारे मन के अनकहे एहसासों को शब्दों में पिरोकर तुमको ही देता हूँ, उपहार स्वरूप....

स्मृतियाँ

सिमटी सी थी सकुचाई सी
लजाई कुछ घबराई सी
याद करो वो पल साजन
मैंने मेहँदी रचाई थी
दुल्हन बन कर आई थी

हाथों में जयमाल लिये थी
आँखों में सवाल लिये थी
मुस्कुराकर तुमने भी तो
मूक सहमति जताई थी
मधुर मिलन बेला आयी थी

प्राण प्रण तन मन समर्पित
मन ही मन तुम भी गर्वित
सात फेरे सात वचन वो
कसम जो संग संग खाई थी
हर रस्म हमने निभाई थी

कल तक खेला बचपन था
आज कितना परिवर्तन था
घर की देहरी छूट रही थी
बालपन की विदाई थी
स्वागत में तरुणाई थी

सोचो कितना मुश्किल था
देह कहीं थी, कहीं दिल था
बाबुल के बाग़ की तितली
आज हो रही पराई थी
विछोह की घडी आई थी

ह्रदय में विश्वास अटल था
माँ के संस्कारों का बल था
साथ तुम्हारे मिलकर तब मैं
नया संसार रच पाई थी
प्रकृति हम पर मुस्काई थी

साथ तुम्हारे चलते चलते
दिन बीते सब हँसते खिलते
बाँट रही हूँ तुम संग आज
स्मृतियाँ जो बचाई थीं
प्रियतम मैं शरमाई सी

तृप्त अभी कहाँ मन हुआ है
परिपक्व अब मिलन हुआ है
कदम कदम है तुम संग चलना
देह संग उसकी परछाई सी
तुम सुर ,मैं शहनाई सी

© - प्रशांत सेठ