Monday, March 31, 2014

ऐब या हुनर

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ प्रतिभा होती है। मगर कई बार इस विषय में वह स्वयं नही जानता, दूसरों की तो बात ही छोड़ दीजिए। लोगों की नज़र में जो बहुत खराब हैं, मैंने अक्सर उनके अंदर बहुत अच्छा इंसान भी देखा है। किसी का ह्रदय परिवर्तन वही कर सकता है जिसको ऐब नही हुनर देखने की आदत हो। हुनर देखने के लिये भीतर उतरना पड़ता है।

ठहरा है खारा है शोर बहुत करता है
मगर अपने सीने में मोती लिये फिरता है
जिसने देखा है समंदर को साहिल पर खड़े होकर
वो तो फकत उसके ऐब गिना करता है

- प्रशांत सेठ

Tuesday, March 25, 2014

रोते हुये को हंसाया जाये

बनके आंसू जिया इस तरह जाये
चलो किसी की आँख से यूँ गिरा जाये
किसी के हिस्से का रो लें हम कभी
हमारे हिस्से का कोई मुस्कुरा जाये

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Sunday, March 23, 2014

बौध्दिक चौर्य

मनुष्य का स्वभाव है अहं। ये वो मानव प्रवृति है जो सम्मान पाने या पहचान बनाने की आकांक्षा को जन्म देती है। आत्मविश्वास के अभाव में स्वयं की मौलिकता को न तलाश कर, कई लोग दूसरों की रचनाओं को अपना बताकर पढ़ने का क्षणिक सुख पा लेते हैं। परन्तु खो देते हैं सृजन के असीम आनंद को। ये पंक्तियाँ समर्पित हैं ऐसे ही मित्रों को

किसी कोख से निकला, किसी सीने से बच्चा लगा
शेर मेरा था लेकिन, तेरे मुँह से भी अच्छा लगा

- प्रशांत सेठ

Saturday, March 22, 2014

धर्मयुद्ध

स्वाभिमान नहीं स्वार्थ जगाया
कैसा तुमने पार्थ जगाया
इस सदी के धर्मयुद्ध में कृष्ण
धर्म पराजित ही कहलाया

मानवता की स्थापना के उस
लक्ष्य से दूर भटक ये आया
जूझ रहा है चक्रव्यूह से
जो था इसने स्वयं रचाया

भ्रष्टाचार के हस्तिनापुर ने
फिर उल्लास उत्सव मनाया
शस्त्र छोड़ खड़ा कुरुक्षेत्र में
अर्जुन पुन: भ्रमित घबराया

राजनीति की चौसर पर क्या
लोभ संवरण कर नहीं पाया?
या फिर उसके रथ से कृष्ण
तू ही स्वयं उतर है आया?

हम सैनिक ये प्रश्न लिये हैं
राष्ट्रधर्म नहीं किसने निभाया?
बलिदानो को तत्पर थे फिर
अहं क्यों और कैसे टकराया?

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Friday, March 21, 2014

क्योंकि तुम आम हो ख़ास नहीं


साहस की कमी हो जिसमे
हो धीरज का वास नहीं
खड़े रहना क्षण भर भी
उस मनुज के पास नहीं

जो वेदना थी कल तक
वेदना क्यों वो आज नहीं
परिवर्तन का नारा रह गया
परिवर्तन की आस नहीं

बे-मोल हो गया इस बाज़ार में
प्रण संकल्प विश्वास कहीं
स्वार्थ वेदी पर पड़ा हुआ है
स्वराज निष्प्राण नि-श्वास यहीं

बलिदानो की राह का सिपाही
सत्ता से रचाता रास नहीं
किन्तु आशा किरण कहती है
शायद तुम आम हो ख़ास नहीं

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Wednesday, March 12, 2014

कुर्बान

वो ज़मीं में सो गया हर सांस लुटा के
गो जी सकें अमन से हम अपना सर उठा के

इंतज़ार में होगा कोई अपनी मांग सजा के
चल दिया यूँ बेवफा उसकी दुनिया मिटा के

जितना था खूँ जिस्म में सारा बहा के
चंद अश्क कमाये नसीब ने बेदर्द जहां के

बेवा के उसकी हाथ कुछ मुआवजा थमा के
सो जायेंगे हम भी फिर से ये दस्तूर निभा के

ये तो चला लम्बे सफ़र पर सब धूल झडा के
था फ़र्ज़ जिंदगी से बड़ा इतनी बात बता के

सोचो क्या पाया हमने ये दिलदार गंवा के
हम भी वही तुम भी वही बस शेर जुबां के

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Sunday, March 9, 2014

Do and Prove It

You can't change somebody's perception by arguments. Your own behaviour and deeds will count more than your words.
Have faith in your beliefs and you will make the difference

Don't just follow don't just tread
On the footprints others have had
Let your conscience lead you there
The Nature has a place for you somewhere

-Prashant Seth

Saturday, March 8, 2014

Happy Women's Day



नारी

बहुत की कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूं तो तुमपर लिखने
लायक मेरी औकात नहीं है

विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है

संस्कारों की जननी तुम
मानवता की तुम शिल्पी
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही ज़ात नहीं है

भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा तुम लक्ष्मी
अबला कहूं उचित बात नहीं है

सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है

सृष्टि का श्रृंगार हो तुम
हर रचना का सार हो तुम
क्या सात रंग सात सुरों का
अदभुत तू अनुपात नहीं है ?

माँ का कभी आँचल बनकर
कभी प्रेयसी का काजल बनकर
प्रभु प्रेम का प्रतिबिम्ब नारी
क्या इश्वर का मौन संवाद नहीं है ?

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ

Thursday, March 6, 2014

झाँसी

दिल भी है अपना, दर-ओ-दीवार है यहाँ
ये वो शहर है सब अपने यार हैं जहाँ
मेरे बचपन की खुश्बू, मेरे माज़ी के किस्से
मेरे आज भी कई तलबगार हैं यहाँ

-प्रशांत सेठ

अक्स बच्चों में नज़र आते हैं

ये जो मेरे पीछे नन्हे कदम चले आते हैं
मैं सही राह पर हूँ मुझे यही बताते हैं
दुनिया के आइनो की मुझे ज़रुरत ही क्या है
मेरा अक्स मुझे मेरे बच्चे दिखाते हैं

- प्रशांत सेठ

Sunday, March 2, 2014

कलमवीर

इस मुल्क की सियासत में मेरा किरदार क्या है?
सोचता हूँ वतन को मुझसे दरकार क्या है?
मेरी कलम है सलामत तो यकीन है मुझे
इसके आगे ज़ुल्मत की तलवार क्या है?

- प्रशांत सेठ