Wednesday, December 31, 2014

स्वागतम 2015

बदलता कुछ नहीं है, बदलना पड़ता है। कैलेंडर का पन्ना भी पलटाना पड़ता है तब कहीं वर्ष बदलता है।

फिर ये वक़्त कैसे बदलेगा?

सकारात्मक दृष्टिकोण से बीते वक़्त को पलटा दीजिये। आने वाले कल का स्वागत कीजिये नई ऊर्जा से।

कितनी भी मुश्किलें हों उनका सामना कीजिये शिव जी के त्रिशूल से। शिव जी का त्रिशूल इच्छा, क्रिया और ज्ञान रुपी त्रिशक्तियों का प्रतीक माना जाता है। मात्र इच्छा करने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उसके लिये श्रम भी करना होता है। मात्र श्रम से भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। उस लक्ष्य से सम्बंधित ज्ञान भी अर्जित करना पड़ता है।

मगर सबसे ज़रूरी बात। लक्ष्य के मूल में धर्म होना चाहिये, अधर्म नहीं। धर्म यानी सबके कल्याण की भावना से किया गया कोई भी कर्म। फिर पराजय का प्रश्न ही नहीं उठता। आइये इसी विश्वास के साथ स्वागत करें वर्ष 2015 का ....

बाधाओं के पर्वत हों, पथ में बिछे हों शूल भी
हर क्षण एक संग्राम सही, परिस्थितियां प्रतिकूल भी ।
उस पथिक की जय ही जय है, जिसका शस्त्र त्रिशूल हो
धर्म लक्ष्य का मूल हो और जीवन का उसूल भी ।।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, December 17, 2014

दहशत का खुदा कोई नहीं ...

"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये"

किसी ग़ज़ल के इस शेर से बिलकुल उलट ये ना जाने कौन सा धर्म है जिसने इतने मासूम बच्चों को मौत की नींद सुला दिया ....

हरगिज़ ये दिलेरी का कोई काम नहीं है
दहशत किसी भी मज़हब का पैग़ाम नहीं है ।
तुम जानो तुम्हारा ख़ुदा तुम्हारी इबादत
पर हमको तो यकीं है ये इस्लाम नहीं है ।।

क्या इतनी क़ुरबानी पर्याप्त है आतंकवाद के खिलाफ संपूर्ण विश्व को एकजुट करने के लिये? क्या यह वहशियाना कृत्य काफी है उन नासमझों को जगाने के लिये, जिन्होंने स्वयं इस नफरत के जिन्न को पाल कर बड़ा किया है? या फिर अभी इंतज़ार है खुद की बारी का?

धर्मान्धता किसी भी धर्म के लिए बुरी है क्योंकि ये मौलिक और नवीन चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है। यह अतिक्रमण करती है व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर।

धर्मान्ध वही हो सकता है जिसने दूसरे किसी धर्म को समझना तो दूर, अपने ही धर्म को ठीक से नहीं समझा। देश और दुनिया पर हुकूमत की चाहत लिये, हथियारों से लैस, ये लोग किसी धर्म के अनुयायी नहीं होते। ये अनुयायी होते हैं केवल स्वार्थ के, अहंकार के और सत्ता की भूख के।

इतिहास उठा के देख लीजिये; धर्मान्धता का जिन्न अंत में उसको ही खा जाता है जो इसका पालन करता है। इस मज़हबी जुनून को अपने दिल में जगह देने से पहले सोचिये की कहीं हम अपने ही हाथों अपना घर तो नहीं उजाड़ रहे; क्योंकि इस संकीर्ण सोच का भुगतान निश्चित रूप से हमारी संतानों को करना पड़ेगा ...

मिरे आँगन में अभी तो खिली थी
ज़िन्दगी चार कदम भी ना चली थी ।
लो मिट गई इस जुनूँ-ए-नफरत पर
ये नफरत इसी गोद में पली थी ।।

याद रखिये, इस नफरत को और अपनी संतान को एक ही गोद में, एक साथ नहीं पाला जा सकता....

कत्लो-गारत की वहशियाना नज़ीरों से
मासूम हाथ में ज़िहादी शमशीरों से ।
मुमकिन नहीं किसी सूरत, खिलना चमन में
फूल अमन के, दहशत की तदबीरों से ।।

© - प्रशांत सेठ

नज़ीर = उदाहरण, शमशीर = तलवार, तदबीर = योजना

Tuesday, December 9, 2014

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:

फिर व्यवस्था की अस्मत लुट गई। फिर बलात्कार हुआ समाज का, मेरा भी और आपका भी।

शील नारी का भंग नहीं होता। नारी तो स्वयं मान है समाज का। अपमान होता है समाज का। हम भी उस ही समाज का हिस्सा हैं इसलिए मर्यादा जो भंग हुई वो हमारी थी। ये हमारी और आपकी इज़्ज़त है जिस पर बुरी नज़र डाली जाती है। ऐसी घटनायें क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि अब हम अपने सम्मान की रक्षा करने में असमर्थ हो गये हैं?

सिर्फ क़ानून और व्यवस्था को दुरुस्त करने से क्या होगा? नज़रिया भी दुरुस्त करना होगा। इस बात को महसूस करना होगा कि समाज में प्रत्येक स्त्री हमारी अपनी इज़्ज़त की तरह है। ऐसी घटनाओं में जब तक हम अपना अपमान नहीं देखेंगे तब तक स्थितियाँ नहीं बदलने वाली।

अपने आस पास नज़र डालिये और देखिये कहीं ना कहीं कोई आपकी इज़्ज़त पर बुरी नज़र डाल रहा है। नज़रअंदाज़ करना इस कृत्य में शामिल होने के समान है। इसलिए नज़रअंदाज़ मत कीजिये, तमाशा मत देखिये। आज ही प्रतिकार कीजिये,  इससे पहले की देर हो जाये...

किसी का घर जला, हाथ सेक लिये
या हमदर्दी के चंद लफ्ज़ फेक लिये
लो निभा दिया हमने फ़र्ज़ यूँ अपना
आ गये सड़क पे मोमबत्ती एक लिये

चीखे कुछ चिल्लाये तस्वीर भी उतरी
घर को लौट गये सीरत नेक लिये

कल दफन होंगे फिर ये भी राख में
हैं अखबार आज जलते लेख लिये

बोली तंज़ कर हवायें यूँ हमसे
इस आग ने तेरे भी घर देख लिये

© - प्रशांत सेठ

सीरत = चरित्र, तंज़ = व्यंग

Friday, December 5, 2014

अब कोई गुलशन ना उजड़े

अभी कुछ दिन पहले एक शख्स का बयान आया कि 57 साल से मंदिर मस्जिद का मुकदमा लड़ने का पश्चाताप है उन्हें। मुकदमा वो लड़े, हिंदुओं की नाराज़गी को सहन किया, मगर मंत्री दूसरे लोग बन गये। यानि की ये सारी लड़ाई थी, भावनाओं को भड़का के, वर्ग विशेष के नेतृत्व की। मंत्री ना बन पाने का दुःख है। मंदिर मस्जिद के बनने टूटने की बात नहीं है। किसी की आस्था से खिलवाड़ की फ़िक्र नही है। फ़िक्र है तो सत्ता का ख्वाब टूटने की।

हमारी आपकी आस्था इन जैसे लोगों के लिए मात्र एक सीढ़ी है सत्ता तक पहुँचने की। जी हाँ ! हमारे अन्धविश्वास की मिटटी पर ही पलते हैं ये बबूल के पेड़। फिर चाहे इनका नाम कोई ....राम हो या कोई ....खान/ओबैसी। ये कोई मठाधीश हों या इमाम। कल कोई शौर्य दिवस मनायेगा तो कोई काला दिवस। मगर वो लोग कौन सा दिवस मनायें,  जिनका मानना है की

"ज़र्रे ज़र्रे में खुदा का नूर है" या "कण कण में परब्रह्म परमात्मा है"

कमान-ए-मज़हब से नफ़रत का तीर छूटा जब
कोई मस्जिद टूटी या के मन्दिर टूटा तब ।
अक़ीदत के लिबास में सियासी भेड़ियों का
अधूरा इल्म है, चेहरा ज़हीनी झूठा सब ।।

(अक़ीदत = आस्था, इल्म = ज्ञान, ज़हीन = विद्वान)

मज़हब और सियासत के विनाशकारी गठजोड़ का परिणाम सीरिया और इराक में दिख रहा है। नफरत के इस सैलाब से हिंदुस्तान को बचाना है तो वक़्त आ गया है की हमारी आस्थाओं से खेलने वाले सियासी चेहरे और अधकचरे ज्ञान के अतिसार से पीड़ित छद्म धर्मगुरुओं को पहचान कर बेनकाब कर दिया जाये। इनके आध्यात्मिक अज्ञान की यही पहचान है कि धर्म की आड़ में ये नफरत फैलाते हैं या आपकी भौतिक लालसाओं को प्रलोभन देकर ठगते हैं।

इनको मिटाने के लिये ज़रूरी है मिटाना, अपने अंदर छुपी धर्मान्धता और अन्धविश्वास को, क्योंकि ...

मज़हब का सियासत से जब जब हुआ है संगम
दरख्ते अमन नफरत से सींचा गया उस मौसम ।
खड़ी हुई बंटवारे की दीवार जिसके सीने पे
रोता रहा सदियों तक फिर घर का वो आँगन ।।

© - प्रशांत सेठ

( दरख्ते अमन = सौहाद्र का वृक्ष)