इस बार की दीवाली में एक चिराग कम हो गया। जो दूसरों की राह प्रज्वलित किया करता था, वह स्वयं असमय ही बुझ गया।
ऐसा भाई जो 35 वर्ष पुराना साथ छोड़कर प्रभु श्री राम के चरणों में चला जाये, उसको विभीषण कहना कहाँ गलत है?
और विछोह की इस पीड़ा को रावण से बेहतर कौन समझ सकता है। मेरे जीवन के इस विभीषण को श्रद्धांजलि। नमन प्रिय अरविन्द ....!!!
विभीषण
उसमें भक्ति का समर्पण
मुझमें तप का अहंकार
वो निर्मल चित्त प्रेम का
शक्ति मेरा अलंकार
एक चाक पर थे गढ़े
मिट्टी के ये दो घड़े
वो घट बना मंदिर का
हम तृष्णा में रहे पड़े
मैं आकंठ डूबा चाह में
वो था मुक्ति की राह में
मैं लंका के वैभव में गुम
वो ईश्वर की पनाह में
वो वन का एक तपस्वी
मैं स्वर्ण नगरी का लंकेश
जोड़ घटा गुणा भाग मैं
वो खुश था पाकर के शेष
मैं दस सरों में लिये वजन
वो था ह्रदय का शुद्ध भजन
मैं युगों तक जलने वाला
वो पल में पिघलने वाला
मैं विद्या के दर्प में चूर
वो इन सबसे कोसों दूर
मैं धर्म समाज की व्याधि
उसका जीवन एक समाधि
मैं कुटुंब विनाश का कारण
वो समस्या का निवारण
मैं पराजय था युद्ध की
वो अवस्था प्राप्त बुद्ध की
वो उत्तर मैं दक्षिण था
साथ फिर भी अक्षुण्ण था
लेकिन तोड़ गया वो बंधन
अब करो क्रंदन या वंदन
इस कथा का अंत वही है
खोया पाया सब यहीं है
मिट्टी के हर घट की राह
मिट्टी ही तो ताक रही है
धन विद्या शक्ति व्यर्थ है
मृत्यु जीवन की शर्त है
शरण राम की जिसने पाई
वही सबल वही समर्थ है
© - प्रशांत सेठ