Saturday, May 14, 2016

भीष्म-द्वन्द

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

- रामधारी सिंह दिनकर जी

समर्थ है फिर भी पराजित है, ज्ञान है फिर भी बंधन में है, नीति के ज्ञाता हैं फिर भी अनीति के साथ हैं। ऐसे ही चरित्र को भीष्म कहते हैं। जैसे ज्ञान होते हुए भी मार्ग से भटका हुआ कोई संत या सामर्थ्य होते हुए भी निष्क्रिय नेतृत्व।
अनीति के समक्ष जब भी सामर्थ्य और ज्ञान ने सर झुकाया है, तब परिणाम स्वरुप पश्चाताप ही पाया है। कहीं ना कहीं जीवन में हम सब भी तो थोड़े थोड़े भीष्म हो जाते हैं। विशेषकर तब, जब अनीति के समक्ष मौन धारण कर लेते हैं।

भीष्म-द्वन्द

मुक्ति का सामान सब है
सामर्थ्य शौर्य ज्ञान सब है
हूँ शर शैया पर किन्तु फिर भी
चिंतन को विश्राम कब है

मिट रही भ्रांतियाँ मन की
देख रहा त्रुटियाँ जीवन की
लौट रहीं स्मृतियाँ फिर से
बीते गये हर एक क्षण की

परिवर्तित होता हर पल ये
कालचक्र किसने देखा है
कभी मर्यादा की सीता भी
लांघ जाती लक्ष्मण रेखा है

फल मेरे ही कर्म अकर्म का
शत्रु रूप है आज धर्म का
बहुत विलम्ब से जाना मैंने
अर्थ सृष्टा के मर्म का

एक संकल्प लिया था मैंने
भावुकता के ज्वार में
मैं अपराधी हुआ सत्य का
मोह समक्ष उस हार में

उस संकल्प में बंधकर फिर
देख रहा हूँ द्यूत सभा को
मौन धारण किये ज्ञान को
कर्तव्य की विलुप्त प्रभा को

अहंकारमय एक चित्त अधीर
खींच रहा मर्यादा का चीर
और समय लिख रहा मुझको
अधर्म समक्ष एक निष्क्रिय वीर

निज संकल्पों का बंदी हूँ
मैं नियति का प्रतिद्वंदी हूँ
मार रहा हूँ खुद को खुद ही
मैं स्वयं ही तो शिखंडी हूँ

वर्षों पहले इस कृत्य का
फल मैंने ही वरण किया था
एक स्त्री की मर्यादा का
जब मैंने भी हरण किया था

अधर्म संग प्रतिबद्धता खड़ी है
निज प्रतिज्ञा धर्म से बड़ी है
मेरे संकल्प की शत्रु बनकर
इसलिये नियति स्वयं लड़ी है

कब तक लड़ेगा स्वप्न, यथार्थ से
पराजित भीष्म को होना है पार्थ से
अपने अपने जीवन काव्य को
हम भी समझ लें इसी भावार्थ से

© - प्रशांत सेठ

Thursday, May 12, 2016

एक दिन माँ

उस दिन बहुत खुश हो गई माँ
#हैश टैग के सहारे ट्वीट हो गई
और वॉट्सएप्प पर वायरल भी
फेसबुक पर उमड़ा मातृ प्रेम
लाइक्स और कमेंट्स में
सहेज रहा था अपना अस्तित्व

कुछ बटोरी हुई भावनाओं के साथ
"माँ" हो गई थी अपडेट
पोस्ट हो गई थीं तस्वीरें
हर बार की तरह
इस वर्ष भी
श्रवण कुमार की फेसबुक वॉल पर

हर तरफ माँ-मयी डिजिटल मंज़र
सिर्फ और सिर्फ श्रवण कुमार
टीपे हुये ढेर सारे भाव
वॉट्सएप्प से फेसबुक के बीच
"माँ" होती रही उस दिन
कट कॉपी और पेस्ट

मैं सोच रहा हूँ
उस दिन माँ ने फिर दर्द सहा होगा
उतना ही, जितना कि जब तुम जन्मे थे
नहीं, बल्कि थोडा अधिक ही
क्योंकि इस बार तुम पैदा हुए थे
कुछ कुछ मरे हुये

काश तुम्हारा जन्म भी डिजिटल होता
और माँ रहती प्रसव की वेदना से मुक्त
या टीप लाती वो तुम्हें
किसी सरोगेट मदर से
और चिपका देती स्टेटस की तरह
घर की दीवार पर

साल में एक दिन बदलती तुम्हारा डायपर
और उस दिन को कहा जाता "सन डे"
संडे वो नहीं, जो बावन होते हैं हर साल में
सन डे यानि पुत्र दिवस
जब माँ करती पोस्ट कुछ तस्वीरें
"आज मैंने छोना बेबी का डायपर बदला, मुआआआआह्"

काश तुम्हारे शब्द ही तुम्हारे अपने होते
तो तुम्हें मालूम होता
कितना कठिन है
अपनी कलम से सृजन करना
ह्रदय की कोख से
भावों को जन्म देना

मुक्त कर दो माँ को
और खुद को भी
इन एक दिवसीय छद्म भावनाओं से
आज तुम सिर्फ एक शब्द लिख दो
"माँ"
और कृतज्ञता से देख लो उसकी तरफ

और यदि माँ सिमट गई हो
किसी फोटो फ्रेम में
तो उसकी तस्वीर से ही कह दो
"माँ"
देखना, इधर तुम्हारी आँख में बूँद होगी
उधर उसकी छाती में फिर सागर हिलोरें लेगा

उसकी आँखों से छलकेगा वात्सल्य
उसकी कोख फिर गर्व से भर जायेगी
और यकीन मानो,
तुम्हारी मूक कृतज्ञता से
आज मातृत्व सम्पूर्ण हो जायेगा !!!

© - प्रशांत सेठ