Sunday, June 26, 2016

मनुज धर्म

ये सच है की मनुष्य इस धरती पर सबसे शक्तिशाली जीव है। ये भी सच है की प्रकृति को उसने सिर्फ लूटा है। कदाचित इसलिये इस पृथ्वी पर अगर कोई दुखी है, तो वो है सिर्फ मनुष्य। क्योंकि जीवन का आनंद तो बाँटने में है; और बाँट वही सकता है जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव हो।

पग पग पथ पर कदम बढ़ायें
चलो पथिक का धर्म निभायें

धूप छाँव स्वीकार करें
जो मिला है आभार करें
उलाहनों में क्या रखा है
आओ जीवन से प्यार करें
उठती गिरती बहती नदी सा
गीत कोई हम भी गायें
चलो पथिक का धर्म निभायें

ये मिला और वो नहीं है
ये गलत है, वो सही है
लेखा जोखा क्यों रखें हम
ह्रदय कोई खाता-बही है?
हिसाबों से परे चलकर
खुदको बे-मतलब लुटायें
चलो धरा का धर्म निभायें

दिन ऊगे उड़ जाना है
साँझ ढले घर आना है
अपने हिस्से का दाना हमको
वैसे भी मिल जाना है
कल की फ़िक्र में क्यों अपना
आज हम व्यर्थ गँवायें
चलो पंछी का धर्म निभायें

क्यों घबरायें दुःख के शूल से
धूप, बारिश और धूल से
मुस्कुराना सीखें हम भी
किसी डाल पर खिले फूल से
सारी ऋतुयें जी लें खुलकर
समय से पहले क्यों मुरझायें
चलो पुष्प का धर्म निभायें

खुद जलकर दिया है जिसने
औरों को सदा उजियारा
गिरा नहीं है वो कभी जो
दूसरों का बना सहारा
अंधेरों की जहाँ सत्ता हो
वहां चलकर दीप जलायें
चलो सूरज का धर्म निभायें

परहित का संकल्प लेकर
ठहर जायें किसी राह में
बनें आश्रय थके पथिक का
दें विश्राम अपनी छाँह में
पत्थर की चोटों का मोल
मीठे फल से हम चुकायें
चलो वृक्ष का धर्म निभायें

किसी निर्बल का बल बनकर
सबलता के मर्म को समझें
मौन और निःस्वार्थ कर्म में
निहित वास्तविक धर्म को समझें
उड़ने योग्य किसी पंछी के
पंखों का हम बल बन जायें
चलो वायु का धर्म निभायें

पर्वत जंगल शहर गाँव हो
भेद रहित मन का भाव हो
रीत जायें आओ वहां पे
जहाँ कहीं भी अभाव हो
जो मिला है बाँटें उसको
कृतज्ञता से भर भर जायें
चलो मेघ का धर्म निभायें

रंग बिरंगा ये संसार
इस अदभुत जीवन का सार
बहुत दिया देने वाले ने
कोटि कोटि उसका आभार
बूँद बूँद सींचा है जिसने
उस माली को शीश नवायें
चलो मनुष्य का धर्म निभायें

© - प्रशांत सेठ

Sunday, June 19, 2016

एक शाश्वत प्रश्न?

स्वयं के अज्ञान का बोध ही शायद ज्ञान की ओर पहला कदम होता है...

एक शाश्वत प्रश्न?

स्वप्न सदृश्य इस जगत में
मन क्यों इतना मगन है बोलें
कोई खिड़की उस तरफ की
हे ईश्वर अब आप ही खोलें

हाँ, बहुत सुंदर है माना
इस जगत का ताना बाना
किन्तु है ये रहस्य अभी भी
कहाँ से आये, कहाँ को जाना
अंधे की भांति हम कब तक
खोयी हुई राह टटोलें
कोई खिड़की...

शाश्वत नहीं, सत्य नहीं है
जीवन किन्तु असत्य नहीं है
मार्ग है ये किस गंतव्य का
ज्ञात इसका तथ्य नहीं है
मार्ग के दृश्यों को अपने
मन में कैसे हम संजो लें
कोई खिड़की…

प्रश्न कहो या कहो जिज्ञासा
ये पथिक है ज्ञान का प्यासा
करुणा की बस एक झलक से
मन को दे दें आप दिलासा
अपनी व्याकुलता को हम भी
सिवा आपके किससे बोलें
कोई खिड़की...

बाहर भीतर ऊपर नीचे
चल दें बोलो अब किस ओर
अंतहीन इस राह का भी
निश्चित कहीं होगा छोर
आप तक जाती हो, उस ही
राह पर अब हम भी हो लें
कोई खिड़की...

© - प्रशांत सेठ