Sunday, February 24, 2019

गुलेल से गोली तक

मैंने देखा था उसे एक दिन
मेरे घर की मेज़ पर...
उस दिन
ज़रा सी हवा चली थी
वो फड़फड़ाया था
फिर उड़कर बालकनी की मुंडेर से
जा बैठा था पड़ोसी की छत पर
मैं मुस्कुराकर देख रहा था

फिर एक दिन वो दिखा था
किसी ने लिख दिया था उस पर
"पत्थर"
जिस पर मुझे लिखना चाहिए था
"फूल"
मैंने तब भी
मुस्कुराकर ही देखा था

मुझे मालूम नहीं था
इधर उस पर
कोई लिखेगा "दहशत"
उधर किसी गोली पर
नियति लिख देगी
उसका नाम
मैं बेबस देख रहा हूँ
घर में पनपता "आतंकवाद"

वो मेरे घर का मासूम
कोरा कागज़
नफरत की हवाओं में उड़ा क्यों?
काश
मैंने रख दिया होता
अपने बच्चे पर उसी दिन
प्रेम, फिर अनुशासन
फिर ज़िम्मेदारियों का "पेपर वेट"
जब ज़रा सी हवा में वो
पहली बार फड़फड़ाया था

© - प्रशांत सेठ


Thursday, February 21, 2019

चौसर

ज़िन्दगी की रेस में
दौड़ते भागते तुम
कहाँ देख पाते हो पलटकर
उन नन्हे नन्हे पैरों को
जो चले आते हैं तुम्हारे
पदचिह्नों पर

और फिनिशिंग लाइन के पार
मजबूरी में
सुस्ताने के लिए ठहरे तुम
जब देखते हो मुड़कर
वो नन्हे से पैर
समाने लगे हैं
तुम्हारे जूतों में

इन मासूम पैरों में है
श्रद्धा और विश्वास
जो ले आई है इन्हें
तुम्हारे पीछे
कल ये भी दौड़ेंगे तुम्हारी तरह
अंधी रेस में

यदि बचाना चाहते हो
इन नन्हे अभिमन्युओं को
इस चक्रव्यूह से
तो करो स्वीकार इनके समक्ष
कि असत्य के दरबार में
तुम्हारे अहंकार का अर्जुन
मद का भीम
लोभ का नकुल
स्वार्थ का सहदेव
और मौन के धर्मराज मिलकर
गँवा बैठे हैं
वक्त की चौसर पर
जीवन रूपी द्रौपदी

इन्हें बता दो
युद्ध में
अश्वों की रास थामे हाथ से
अधिक सुंदर थीं
वो मुरली बजाती उँगलियाँ
कुरुक्षेत्र में बहते ज्ञान से
बेहतर था
बृज में बरसता प्रेम

© - प्रशांत सेठ


Thursday, February 14, 2019

प्रेम

कोई पूछेगा तुमसे
दो और दो कितने होते हैं
तुम कह दोगे झट से,
चार!!
क्योंकि
तुम्हारी दुनिया चलती है
नाप तौल, जोड़ तोड़, गुणा भाग से
तुम देखते हो खुली आँखों से
दृश्य को

मुझसे मत पूछना
दो और दो कितने होते हैं
मैं झाँकूंगा बंद आँखों से
अतीत के झरोखे में
जहाँ दिखाई देगी एक रसोई
उसमें धधकता चूल्हा
और गर्म आँच में तपता
"माँ" का वात्सल्य

जब मैं कहूँगा
माँ ! दो, और दो
वो कहेगी "ले और ले"
ना मालूम कैसे
अंतिम रोटी हो जाएगी
पहले से दुगनी
रोटियाँ अक्सर हो जाती हैं
दो और दो पाँच
माँ के हाथ से
क्योंकि "प्रेम" के समक्ष
गणित नहीं ठहरता

खुली आँखों से दुनिया को देखा
तो "कविता" होगी ना "प्रेम"
बंद आँखों से टटोलो
मन के किसी कोने में दबी
एक प्यारी सी स्मृति
किसी प्यारे से रिश्ते की ...
प्रेम वही है जो ठहर जाए हृदय में
किसी के जाने के बाद भी

© - प्रशांत सेठ


Sunday, February 10, 2019

परिभाषाओं के पार चलें तो?

ठहर गए हैं वो राह में
अपना सफर तो जारी है
ये खाली खाली एक बर्तन
भरे हुओं का आभारी है

ऊपर से नीचे बहना क्यों
मीठे जल की तू धारा
क्या देगा ये सागर तुझको
जो स्वयं ही है खारा
सीमित से उस विस्तार पर
अल्हड़ यौवन भारी है
ये खाली खाली...

शिल्प गणित के उपासक
अनगढ सौंदर्य क्या जानें
गढ़ लिए ईश्वर जिन्होंने
हम उनको ज्ञानी क्यों मानें?
प्यास यहाँ पर कहीं नहीं
बस कुओं की सरदारी है
ये खाली खाली...

गणित मंचों पर रोकेगा
भूख पथ से भटकाएगी
ज्ञान उद्गम तक तुमको
प्यास तीव्र ही ले जाएगी
चिंतन से शून्य लेखन
शब्दों की अय्यारी है
ये खाली खाली...

नई विधाएँ नई खोज
सीमा के उस पार मिलेगी
तोड़ दे सारे तटबंध दृष्टि
तब सृजन की कली खिलेगी
पूछ स्वयं से इस पथ पे क्या
चलने की तैयारी है?
ये खाली खाली...

© - प्रशांत सेठ