मैंने देखा था उसे एक दिन
मेरे घर की मेज़ पर...
उस दिन
ज़रा सी हवा चली थी
वो फड़फड़ाया था
फिर उड़कर बालकनी की मुंडेर से
जा बैठा था पड़ोसी की छत पर
मैं मुस्कुराकर देख रहा था
फिर एक दिन वो दिखा था
किसी ने लिख दिया था उस पर
"पत्थर"
जिस पर मुझे लिखना चाहिए था
"फूल"
मैंने तब भी
मुस्कुराकर ही देखा था
मुझे मालूम नहीं था
इधर उस पर
कोई लिखेगा "दहशत"
उधर किसी गोली पर
नियति लिख देगी
उसका नाम
मैं बेबस देख रहा हूँ
घर में पनपता "आतंकवाद"
वो मेरे घर का मासूम
कोरा कागज़
नफरत की हवाओं में उड़ा क्यों?
काश
मैंने रख दिया होता
अपने बच्चे पर उसी दिन
प्रेम, फिर अनुशासन
फिर ज़िम्मेदारियों का "पेपर वेट"
जब ज़रा सी हवा में वो
पहली बार फड़फड़ाया था
© - प्रशांत सेठ



