Prashant Seth
An unusual combination of a business mind, a writer's heart and a philosopher's soul
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सफेदपोश
एक व्यंग लेख
हमारे प्रिय मित्र हैं Shirish Gontiya "उजड्ड"। श्रेष्ठ व्यंगकार भी हैं और रंगमंच के कलाकार भी। अब आप पूछेंगे कि व्यंगकार हैं तो मित्र नहीं हो सकते, क्योंकि व्यंगकार तो किसी को भी नहीं बख्शता। परंतु शायद आप नहीं जानते कि एक व्यंगकार दूसरे व्यंगकार के प्रति हमेशा सहिष्णुता का परिचय देता है। इनका नाम स्वामी उजड्ड आनंद रखने का हमारे पास दो कारण हैं। पहला ये कि इन्होंने उजड्डता के मार्ग पर चलकर आनंद प्राप्त करने का संकल्प लिया है, जिसकी वजह से नगर के राजनीतिक हलकों में इन्हें प्रातः निंदनीय एवं सांध्य कुटनीय का सम्मान प्राप्त है। दूसरा ये कि इन्हें सुबह सुबह एक विशेष किस्म का प्रेशर बनता है। इस प्रेशर को ये मुझे एक छोटा सा "मॉर्निंग प्रवचन" देकर रिलीज़ करते हैं। ये तो प्रेशर रिलीज़ करके निकल लेते हैं परंतु दिन भर के लिए उक्त प्रवचन में छुपे गूढ़ रहस्य को खोजने का प्रेशर मुझपर आन पड़ता है।
स्वामीजी की यह प्रवचन सिद्धि एक दिन अकस्मात एक अलौकिक घटना के पश्चात प्रकट हुई। हुआ यूं कि एक दिन ये अपनी बुलेट मोटरसायकिल समेत नगर के गटर में मेनहोल के रास्ते समा गए। इस घटना में उनके उस प्रदेश पर चोट लगी जहाँ अमूमन व्यंग्यकारों की अक्ल रहा करती है। इनकी छठी इंद्री जाग गई और गटर में इन्हें समाज की गंदगी का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे इनके भीतर की उजड्डता और प्रखर हो गई। तभी से ये मुझे अपनी कृपा स्वरूप सुबह सवेरे एक प्रवचन पेल कर चल देते हैं और शाम तक उसकी बखिया उधेड़ने का आदेश भी दे जाते हैं।
तो अभी दो दिन पूर्व के इनके प्रवचन और उसकी बखिया पेश है
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मोर्निंग प्रवचन
सच्चा ज्ञान हल्दी की गांठ की तरह होता है उसे आप दूध में डालकर अपनी इम्युनिटी तो बढ़ा सकते हैं पर चबा का हज़म नहीं कर सकते।
- उजड्ड वाणी
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प्रवचन बखिया
स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान वह होता है जो सत्य से परिचय करवाये, शेष सब अज्ञान है। परंतु सत्य कड़वा भी होता है और हल्दी की तरह गरिष्ठ भी। अतएव जिस प्रकार हल्दी को दूध के साथ लेने पर ही हजम करना संभव होता है, उसी प्रकार स्वामीजी के प्रवचन को हमारी बखिया के बिना लेने पर आपका हाजमा बिगड़ सकता है।
परंतु स्वामीजी को मॉर्निंग में उत्पन्न होने वाले प्रवचन रूपी प्रेशर का केवल इतना सरल अर्थ नहीं होता। यहाँ स्वामीजी इशारों में गूढ़ रहस्य की ओर इंगित करते हैं। आप सभी जानते हैं कि हल्दी पीली होती है और वाणिक समाज में पीले का अर्थ स्वर्ण धातु से होता है। अर्थात यहां धनार्जन की प्रक्रिया की ओर स्वामीजी इशारा करते हैं।
आप सभी जानते हैं और स्वामीजी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वर्तमान युग मे ईमानदारी की आय से आवश्यकता की पूर्ति भर हो सकती है, ऐश्वर्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपना धन टैक्स से बचाने के बाद सरकारी अफसर, क्षेत्रीय माफिया, पुलिस, मीडियाई माफिया, नेता, जज और वकीलों की कृपा से ही आप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकते हैं। इस सत्य को जानने वाले काला-पीला करने की कला जल्दी ही सीख लेते हैं। परंतु समस्या ये है कि काले के साथ पीला लेने पर एक दिन हाजमा बिगड़ ही जाता है और सारा पीला अन्य रास्ते से निकल कर वापस पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। उदाहरण के लिए देख लीजिए, विजय माल्या से लेकर हमारे मोहल्ले के कालिया तक सभी आज गालियां खा रहे हैं, मेरा मतलब है कि बदहजमी की गोलियां खा रहे हैं।
स्वामीजी इशारों में कहते हैं कि इसी पीले को अगर सफेद की साझेदारी मिल जाये तो सब हजम हो जाता है। यही कारण है कि सफल व्यक्ति हमेशा किसी सफेद खद्दरधारी के संरक्षण में रहता है। यह गठजोड़ आश्चर्यजनक रूप से और शीघ्र सफलता प्राप्त करने का अचूक नुस्खा है। तब आप अवैधानिक कार्य को भी वैधानिक पद्धति से कर सकते हैं। वहीं यदि आपका गठजोड़ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी नेता से है तो उक्त कार्य को संवैधानिक तरीके से भी किया जा सकता है। इस प्रकार आप पीले को आसानी से हजम कर सकते हैं और समाज भी आपको डाइजेस्ट कर लेता है। यदि भाग्य के सितारे अधिक प्रबल हुए तो आपको लोग देवता भी मानने लगते हैं।
इस बात को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। हमारे शहर के एक अस्पताल संचालक काले के साथ पीला कर रहे थे तो नकली इंजेक्शन के मामले में फंस गए। वहीं कुछ लोग असली इंजेक्शन और अस्पताल के बेड को ही ऊंचे दामों में बेचकर ऐश्वर्य भोग रहे हैं। यह हुई वैधानिक पद्धति।
यदि और गहराई में देखें तो यह इंजेक्शन उक्त बीमारी का इलाज करने में असफल मानकर WHO ने उसे अपनी उस लिस्ट से हटा दिया, जिसे WHO ने कुछ माह पूर्व स्वयं ही जारी किया था। लेकिन लिस्ट से हटाने के पहले ही, उच्च स्तरीय सफेद के गठजोड़ से बड़ी फार्मा कंपनियों ने अच्छा खासा पीला हजम कर लिया। इसको स्वामीजी संवैधानिक पद्धति बताते हैं। यह पद्धति दो देशों को लड़वाकर हथियार बेचने से लेकर, कौड़ियों के दाम में कीमती जमीन अलॉट करने, निजी भवनों को अपनी ही सरकार को ऊंचे किराए पर देने, मीडिया को सरकारी विज्ञापन देकर खरीदने, भय का माहौल बनाकर उत्पाद बेचने और गमलों में गोभी उगाकर करोड़ों रुपये कमाने तक में काम आती है। सरकारी सब्सिडी, वजीफे और अनुदानों को वर्ग विशेष के लोगों को भी संवैधानिक तरीके से बांटा जा सकता है और संवैधानिक रूप से ही नोट के साथ वोट भी कमाये जा सकते हैं। स्वामीजी यह भी बताते हैं कि सफेद की आड़ में पीला पचाने वाले लक्ष्मीपुत्रों को ही शास्त्रों में सफेदपोश कहा गया है।
- ठेठवाणी फ्रॉम प्रशांत सेठ
Wednesday, October 28, 2020
हे आदिशक्ति! हे जगजननी!
प्रकृति के गर्भ में अपने जन्म की प्रतीक्षा में एक चिरपंथी की प्रार्थना ...
