Sunday, September 21, 2014

इतवार

छुट्टी का दिन किसे अच्छा नहीं लगता। घर में परिवार के साथ फुर्सत का एक दिन नयी ऊर्जा दे जाता है। इस इतवार का इंतज़ार हफ्ते भर रहता है।

हम और आप सौभाग्यशाली हैं क्योंकि ये इंतज़ार सबको नहीं रहता। एक पिता जिसके अरमान जेब की गुंजाईश के सामने दम तोड़ते हों, उसे बिलकुल नहीं रहता। एक गरीब बाप जिसे आज भी रोटी का इंतज़ाम करना हो, उसे भी नहीं रहता। ऐसे भी लोग हैं जो बच्चों से मुंह चुराकर सुबह से निकल जाते होंगे। या फिर बहला देते होंगे मासूम ख्वाहिशों को नये नये बहानों से। या फिर बचपन का गला घोंट देते होंगे एक थप्पड़ से और गाल को सहलाता हुआ बचपन अचानक समझदार हो जाता होगा।

देखिये इतवार का एक रूप ये भी है...

आज फिर दिन है सब्र की आज़माइश का
आज फिर दिन है बच्चों की फरमाइश का
गम-ए-मुफलिस आ गया फिर इतवार की सूरत
आज फिर चेहरा उतरा है मेरी गुंजाइश का

© - प्रशांत सेठ

मुफलिस = गरीब
गुंजाइश = हैसियत

Friday, September 19, 2014

बंधन

जीवन में स्वछंदता को रोकने के लिये ही शायद समाज का, रिश्तों का जन्म हुआ है। मन की अनंत इच्छाओं के वेग में कई बार ये बंधन बोझ लगने लगते हैं। परन्तु इनका महत्व वही जानता है, जिसने इन्हें खो दिया है।

डोर अर्थात बंधन। यानी अनुशासन, मर्यादा, परस्पर प्रेम, सम्मान, विश्वास, आदि आदि। पतंग की भांति जीवन मूल्यों की डोर से बंधकर जीने वाले, कभी दिशाहीन होकर नहीं भटकते।

और जो स्वछन्द होकर भटकना चाहते हैं उनके लिये....

राब्ता डोर से रख, लीजिये मज़ा ऊंचाई का
ख़ाक मज़ा है तर्क-ए-ताल्लुक की रुसवाई का
चीथड़े जिस्म-ओ-जज़्बात के कर देगा ज़माना
पूछियेगा अंजाम कभी पतंग से बेवफाई का

© - प्रशांत सेठ

राब्ता = रिश्ता
तर्क-ए-ताल्लुक = सम्बन्ध टूटना
रुसवाई = बदनामी