गणतंत्र कैसा?
आज ह्रदय में उपज रहा ये
प्रश्न कैसा?
सिर्फ किताबों में है गणतंत्र
जश्न कैसा?
स्वतंत्रता का लक्ष्य नहीं
पूर्ण हुआ है
खंड खंड भारत कहाँ
सम्पूर्ण हुआ है
स्वाभिमान गिरवी रख, संघर्ष
खत्म कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
देखो शत्रु की चुनौती
कितनी बड़ी है
और तरुणाई इस देश की
अकर्मण्य खड़ी है
है यौवन उत्सव में फिर भी
मग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
तुम कहते हो राष्ट्र बढ़ रहा
प्रगति पथ पर
चंद लोग ही क्यों दिखते हैं
स्वर्ण रथ पर?
है किसान मज़दूर यहाँ तब
नग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
सत्ता लोलुप चढ़ाये हुये हैं
चेहरे पर चेहरे
पहचाने नहीं जायें रंग हैं
इतने गहरे
यथार्थ से मुँह चुराता इनका
यत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ....
एकलव्य के हिस्से यहाँ
तिरस्कार लिखा है
पद्म विभूषण पे देखो तो
पवार लिखा है
सर शर्म से झुका दे वो
रत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
खून के बदले आज़ादी का
वो नारा था
हमें किसी गांधी सुभाष ने
क्यों तारा था
है अधूरा अभी संकल्प वो
भग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
काश हमारी ललकार से फिर
पहाड़ गूंजे
सिंहनियों की कोख से फिर
दहाड़ गूंजे
सिंह जनें ना माएँ तो शुभ
लग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
बदलनी है परिपाटी तो
उठना होगा
यदि बनना है तो पहले
मिटना होगा
जागो के अब नींद कैसी
स्वप्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...
© - प्रशांत सेठ