Wednesday, January 11, 2017

संस्कार माला

बेटी ने अपने आने वाले जन्मदिन (16 जनवरी) पर उपहार स्वरूप एक कविता की माँग रख दी। तब अपने जीवन के अनुभव, संघर्ष और गुरुजनों की प्रेरणा से उत्पन्न चिंतन को, संस्कारों की माला में पिरोकर उसे ये रचना दे रहा हूँ। अभी उसकी समझ में आये ना आये; भविष्य में अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न होने पर अवश्य काम आएगी। क्योंकि,
म्हारी छोरी की छोरों से होड़ नहीं होवे है
म्हारी छोरी तो खुदई बेजोड़ होवे है...!!!
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विभिन्न परिस्थितियों में, अलग अलग लोगों की मनस्थितियों भी अलग अलग होती हैं। लेकिन, महान वही कहलाये जिन्होंने संशय की स्तिथि में, स्व-अर्थ को त्याग कर परम-अर्थ को स्वीकार करने का निर्णय लिया।

संस्कार माला

जब
जीवन की ठोकर से उपजने लगे संगीत
ह्रदय की चोट बन जाए अहोभाव का गीत
मन धर्म रक्षार्थ मोह को तजने लगे
एक पाञ्चजन्य भीतर ही बजने लगे
तब समझ लेना
तुम अग्रसर निर्माण के पथ पर हो
हे अर्जुन, तुम केशव के रथ पर हो

जब
टूटने लगे "मैं" का भाव तुम्हारा
मिटने लगे भय का प्रभाव सारा
बाहर सजता भीषण कोई रण हो
और भीतर जागता एक समर्पण हो
तब समझ लेना
तुम्हारी सुप्त शक्ति जागरण को तत्पर है
हे हनुमंत, फिर लंका दहन का अवसर है

जब
संसार भर की दृष्टि हो जाये वक्र
और शत्रु रचते हों नित नये कुचक्र
महाबलियों से हो संग्राम तुम्हारा
मातृभूमि करे बलिदान का इशारा
तब समझ लेना
निज प्राणों का मोह छोड़ना होगा
हे अभिमन्यु, तुम्हें चक्रव्यूह तोड़ना होगा

जब
अशक्त रहो किन्तु हताश नहीं
निर्बल होकर भी परास्त नहीं
कर्तव्य से बढ़कर ना लगते हों प्राण
धर्म हेतु कर सको स्व का बलिदान
तब समझ लेना
ये मृत्यु नहीं, मुक्ति का वरण है
हे जटायु, तू राम की शरण है

जब
असत्य तुम्हें अपराधी कहता हो
ह्रदय घोर संताप सहता हो
धैर्य की परीक्षा लेता हो अभिशाप
और दंड बन जाये औरों का पाप
तब समझ लेना
फिर निष्प्राण शिला का उद्धार करेगा
हे अहिल्या, स्वयं ईश्वर तुझे अंगीकार करेगा

जब
भारहीन होने लगे मन
आसक्तियों के विनाश से
और विचरण करे मुक्त
मोह माया के पाश से
तब समझ लेना
अब भवसागर भी डुबा ना पायेगा
हे केवट, कोई राम उस पार ले जायेगा

जब
बीते जीवन पर करो तुम शोध कभी
स्व कर्म के पीछे हो अज्ञान का बोध तभी
ह्रदय में हो राम और मुँह से निकले मरा
निज अंतस में भाव किन्तु हो खरा
तब समझ लेना
निश्चित है फिर किसी रत्नाकर का अंत होना
हे वाल्मीक, असंभव नहीं डाकू का संत होना

जब
पथ निहारते हों नयन, आराध्य का
विरह बन जाये सुर, ह्रदय के वाद्य का
विष भी दे आनंद, ज्यों अमृत का पान
ना होश ही रहे ना देह का संज्ञान
तब समझ लेना
कोई कृष्ण कहीं आस पास है
हे मीरा, बस कुछ क्षण की और प्यास है

© - प्रशांत सेठ

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