Thursday, August 29, 2019

मन के मर्म तक

सुबह ऊगते सूरज से
भोर डूबते चाँद तक
मैं देखता रहा वर्षों तक
उसे रोज बढ़ते हुए

कर्म के बीज से उपजता रहा
एक विराट वृक्ष
परिवार, कुटुंब और रिश्तों की
बढ़ती गईं शाखें
हरे भरे पल्लवों का
विस्तृत होता रहा संसार
मगर ....

संसार ने कहा "आम" है
इसकी वाणी में अमराई सी ठंडक है
परिचितों ने कहा "आम" है
इसके कर्म में "आम" की खुशबू है
मगर माली ने कहा "नीम" है
इसके मन में कड़वाहट है

ऐ व्यक्ति!
तुम वास्तव में कौन हो?
मन का अव्यक्त विकार
या कि प्रकट विचार
या फिर कर्म साकार?

नहीं!
तुम कोई और हो मन के भीतर
और बाहर कोई और
मन से कर्म तक
तुम बदलते रहे कई रूप

संसार ने तुम्हें जाना
तुम्हारी वाणी से
परिवार और कुटुंब है परिचित
तुम्हारे कर्म से
मगर फलित हुए जीवन में
तुम्हारे मनोभाव

काश तुम होते
अपने रचनाकार की अभिव्यक्ति
काश तुम होते
मन वचन कर्म से एक ही व्यक्ति
तो आम के वृक्ष पर
क्योंकर फलता नीम?
यकीन मानो
मीठे मनोभावों से फलित होती
केवल मिठास

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 26, 2019

एक मित्र बड़ा विचित्र

शब्दों से मैं खींच रहा हूँ
आज अनूठा सा एक चित्र
काश कलम से गा पाऊँ वो
अदभुत सा जीवन चरित्र

हम संग खेले कूदे पढ़े थे
साथ हमने सपने गढ़े थे
समय की इस चाक पे हम
मिट्टी के दो कच्चे घड़े थे

एक दिन सपने घायल लेकर
पास जो थे चावल लेकर
मन याचक बन द्वार खड़ा था
मित्र का वैभव बहुत बड़ा था

उसने सुना तो दौड़ा आया
आकर मुझको गले लगाया
कुछ समय तो सुख से बीता
निर्धन चावल से भी रीता

था निराश मन खाली हाथ
क्यों व्यर्थ में पाली आस
अपनी कुटिया कहाँ बुरी थी
क्या मिला धनिकों के पास

क्षण भर के वैभव का सुख
देता जीवन भर का दुःख
कटु सत्य का ज्ञान हुआ
तब यथार्थ का भान हुआ

बदला बदला सब कुछ पाया
मैं ये किस पते पर आया
अब समझा हूँ उसकी लीला
आज अंतर्मन हुआ है गीला

यह लोक है द्वारका नगरी
मन है छिद्रों वाली गगरी
उस घट में कब जल ठहरे
जिसमें छिद्र हों इतने गहरे

जीवन में रहे ना शेष
इच्छाओं का कोई क्लेश
मन सुदामा रहे वैरागी
किंतु कृष्ण का हो अनुरागी

© - प्रशांत सेठ

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Friday, August 2, 2019

गुमशुदा

मैंने पूछा सिकुड़ी हुई अँतड़ियों से
तुम्हारा धर्म क्या है?
तुम्हारा इष्ट कौन है?

भूख का इष्ट रोटी है साहब
और अमाशय के मंदिर में
इस देवता की स्थापना ही मेरा धर्म है
और मेरी पूजा है
श्रम के यज्ञ में, पसीने की आहुति

मैंने पूछा झुकी हुई कमर से
रोग ग्रस्त मरणासन्न देह से
अपना इष्ट और धर्म बताओ?

जीवन और सिर्फ जीवन
यही मेरा धर्म है
चंद साँसें जो दिला दे
वही इष्ट है
दुआ ही मेरी इबादत है

मैंने पूछा
जीवन में पहला कदम बढ़ाते
नन्हे पैरों से
तुम्हारा पंथ क्या है?
और मंज़िल किधर है?

ज्ञान मेरा पंथ है
मुझे खुद से मिला दे वही इष्ट है
अज्ञान से मुक्ति ही मंज़िल है

मैंने पूछ बैठा भरे पेटों से
स्वस्थ शरीरों से
और ज्ञानी के चोले में
तथाकथित शिक्षितों से

मैं गुम गया हूँ अब
रंगों और झंडों की भीड़ में
फसादों के शोर में, लफ़्ज़ों के युद्ध में
उन्मादी जाहिलों में, सियासती फ़ितूरों में

मैं तुम्हारा चिंतन
गुम गया हूँ नफरत के मेले में
और खो गया मुझसे इस कोलाहल में
मानवता का धर्म
सत्य का पंथ
और प्रेम की मंज़िल

© - प्रशांत सेठ