सुबह ऊगते सूरज से
भोर डूबते चाँद तक
मैं देखता रहा वर्षों तक
उसे रोज बढ़ते हुए
कर्म के बीज से उपजता रहा
एक विराट वृक्ष
परिवार, कुटुंब और रिश्तों की
बढ़ती गईं शाखें
हरे भरे पल्लवों का
विस्तृत होता रहा संसार
मगर ....
संसार ने कहा "आम" है
इसकी वाणी में अमराई सी ठंडक है
परिचितों ने कहा "आम" है
इसके कर्म में "आम" की खुशबू है
मगर माली ने कहा "नीम" है
इसके मन में कड़वाहट है
ऐ व्यक्ति!
तुम वास्तव में कौन हो?
मन का अव्यक्त विकार
या कि प्रकट विचार
या फिर कर्म साकार?
नहीं!
तुम कोई और हो मन के भीतर
और बाहर कोई और
मन से कर्म तक
तुम बदलते रहे कई रूप
संसार ने तुम्हें जाना
तुम्हारी वाणी से
परिवार और कुटुंब है परिचित
तुम्हारे कर्म से
मगर फलित हुए जीवन में
तुम्हारे मनोभाव
काश तुम होते
अपने रचनाकार की अभिव्यक्ति
काश तुम होते
मन वचन कर्म से एक ही व्यक्ति
तो आम के वृक्ष पर
क्योंकर फलता नीम?
यकीन मानो
मीठे मनोभावों से फलित होती
केवल मिठास
© - प्रशांत सेठ


