Tuesday, January 28, 2020

उठो शाहीन अब आँखें खोलो

भारत माँ की तरफ से अपने प्यारे मगर ढीठ बच्चों के लिए सुबह सवेरे वाली कविता। सोहनलाल द्विवेदी जी से क्षमा सहित 🙏🏼😄

उठो शाहीन अब आँखें खोलो
बहुत हुआ तुम घर को हो लो

दिल्ली में ना कमल दल फूले
तुम्हारा वोट बैंक ना झूले

गंदी हवा खूब फैलाई
बहुत मिली बिरयानी भाई

रुपये पाँच सौ खूब बंटे हैं
महीने भर से सब डटे हैं

राजनीति ने खेल खिलाया
तुमने खूब माल कमाया

नेताओं ने खाई मलाई
देश कहे बहुत दुःखदायी

देखो फिर से सर ना फूटे
EC (इलेक्शन कमीशन) का कहर ना टूटे

मोदी शाह की अजब माया
उकसावे में कोई ना आया

और ना अब तुम ज्यादा ऐंठो
मेरे प्यारे अब उठ बैठो

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 21, 2020

शंखनाद

विद्वता के अधरों पे है
अधर्म सभा ने मौन जड़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

कुरुवंश के सत्ता मोह में
उपवन में आ गिद्ध डटे
ज्ञान नहीं है जिन्हें धर्म का
नकली सारे सिद्ध जुटे

चीर पर माँ भारती के
अहंकार ने पग धरा
फिर पाञ्चजन्य ....

कर्तव्य का गांडीव त्याग
सामर्थ्य आज हताश क्यों?
पार्थ के संकल्प को बांधे
भावुकता बाहुपाश क्यों?

धर्म-अधर्म के बीच निर्णय
असमंजस में क्यों पड़ा?
फिर पाञ्चजन्य ....

निज स्वार्थ में धर्मपथ से
हुआ च्युत जब राजवंश
युगों युगों तक मानवता ने
झेला उसका है विषदंश

आज भी तो प्रश्न वही
समक्ष राष्ट्र के पुनः खड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

सुनियोजित शनैः शनैः
किया नष्ट वेद भाष को
षडयंत्रों ने दिया प्रश्रय
संस्कृति के विनाश को

बूंद बूंद से कलिकाल ने
पाप का भर दिया घड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

नवनिर्माण के शौर्य रथ की
थाम सकेगा रास कौन?
तुम ही हो सारथी जिसके
बाहर विध्वंस भीतर मौन

शस्त्र शास्त्र के संगम का
तुमने ही दृष्टांत गढ़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

© - प्रशांत सेठ




Wednesday, January 15, 2020

मकरसंक्रांति

सम्पूर्ण मानवता को सनातन संस्कृति की शुभकामनाएं देता पर्व 🙏🏼

मुझे नहीं पता
तुम्हारे इस राशि से उस राशि में
प्रवेश का अर्थ
मगर, हे सूर्यदेव!
मैं देख रहा हूँ
माँ नर्मदा की गोद में
सर्द मौसम को पिघलते हुए

काश पिघल जाए इसी के साथ
संबंधों के पहाड़ पर पसरी
बर्फ सी सफेद चादरें
अहंकार की

इच्छाओं की पतंगे
खूब छुएँ आसमान
मगर बंधी रहें
सिद्धांतों की डोर से

ज्ञान का उदित सूर्य
मुक्त करे अस्तित्व को
माया के संक्रमण से
हम करें दान
अज्ञान से संचित सारे संग्रह

मुक्त हो जाए ये बूँद
पृथकता के संकल्प से
कर सके समर्पण
उस शाश्वत सागर की
अनंत गहराई में

छूट जाएं आज
शरशैया पर लेटे जीवन की
हठीली भीष्म प्रतिज्ञाएं
और मानवता हो चले मुक्त
अधर्म के पाश से

© - प्रशांत सेठ