Wednesday, February 28, 2018

जीत का मनोविज्ञान

कभी देता है सफलता
कभी देता है वो ज्ञान
समय बुरा नहीं होता बंधु
तुम ही नहीं सके पहचान

लक्ष्य पाया है उन्होंने
पार गये जो विरोधों से
संकल्पों को मिलती दृढ़ता
जीवन में अवरोधों से
दोष ना देकर बाधाओं को
उनका भी करो सम्मान
समय बुरा .....

विफलता में छुपे सबक से
ज्ञान की बढ़ जाती पूँजी
कहीं द्वार जब बंद मिले तो
अनुभव ही बन जाता कुँजी
गिरकर उठना हर ठोकर पर
सफलता का यही सोपान
समय बुरा .....

लक्ष्य से नित घटती जाती
हर कदम के साथ दूरी
नहीं होती एक दिन में
किसी साधक की साध पूरी
त्रुटियों को छोड़कर पीछे
निखरते हैं चरित्र महान
समय बुरा .....

हताशा के घने तिमिर में
जलाये रहो आशा का दीप
धीरज से गढ़ पाती है
एक मोती कोई सीप
गहराई के बल पर वृक्ष
छू पाते हैं आसमान
समय बुरा .....

© - प्रशांत सेठ

अहमक

मीडिया हो या बॉलीवुड, ये कुछ नहीं सिर्फ व्यापारी हैं। ये वही बेचते हैं जो हम खरीदते हैं। एक अदाकारा कैसे मरी या किसकी अदाओं पे ये देश मर रहा है, ये गंभीर सवाल हैं। सरहद पर कौन कब क्यों मर रहा है उसपर इतना संजीदा होने की क्या ज़रूरत है?  ये सेलिब्रिटी नहीं होते। ये तो कुछ पागल होते हैं जिन्हें मुल्क से मोहब्बत हो जाती है। और पागलों के लिये कौन रोता है?

अहमक

ठुमकने पर, ठुनकने पर, ये मरते हैं इशारों में
ये ऐसा मुल्क है याँ लोग, मरते हैं अदाओं में
हिलाये भौहें कोई नाज़नीं, तो लाखों मर जायें
वो अहमक हैं जो मरते हैं, सरहद की वफाओं में

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 24, 2018

The Gene Theory

मैंने पढ़ी थी कभी
मेंडेल की जीन थ्योरी
जिसके अनुसार
माँ-पिता से हस्तांतरित होते हैं
संतान में संस्कार
मुझे पता है
संस्कारों से ही मिलती है दृष्टि
दृष्टि से चिंतन
और चिंतन से मिलती है
जीवन को दिशा
तो एक दिन
मैंने पूछ ही लिया उससे ...

बुद्धिमत्ता
जब हो जाती है व्यभिचारिणी
तब होता है संसर्ग
कभी स्वार्थ से
कभी अहंकार से
और कभी महत्वाकांक्षाओं से
इनके संस्कार से
बुद्धि जब देखती है संसार को
लाभ-हानि के गणित से
तब पाती है औरों में
अपना प्रतिद्वंदी
फिर शुरू हो जाती है
जीवन में स्पर्धा
और खो जाती है बुद्धि
कामनाओं के लौकिक जंगल में

बुद्धिमत्ता
जब होती है अहिल्या सी पवित्र
तब करती है निश्छल प्रेम
ह्रदय में विराजमान
परमेश्वर से
इस मिलन से उत्पन्न बुद्धि
नहीं जानती गणित लाभ-हानि का

वो करती है चिंतन
सही-गलत का
धर्म और अधर्म का
तब सम्पूर्ण सृष्टि में समा जाता है
"मैं" का अस्तित्व
दिखने लगता है हर जीव में
अपना ही अक्स
उतरती है जीवन में
सबके प्रति
भेद रहित स्वीकार्यता
और बुद्धि बढ़ने लगती है
जिज्ञासा का हाथ थाम कर
सत्य के मार्ग पर

कुछ प्रश्नों को माना
हल कर देती हैं विवशतायें
प्रश्न को ही मारकर
फिर भी उस दिन
मैंने पूछ ही लिया
ज़िन्दगी के अस्पताल में
अनुभवों के पलंग पर
चिंतन की प्रसव वेदना से पीड़ित
अपनी बुद्धिमत्ता से
बता, तेरी कोख से जन्म ले रही
इस बुद्धि का जनक कौन है?

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 3, 2018

वो बच्चा किधर गया?

ना मालूम कब कैसे ये मंज़र गुज़र गया
मासूमियत के सीने से खंजर गुज़र गया

बेफिक्री, वो जिंदादिली, मिट गया बचपन
मै पनपता रहा बाहर, अन्दर गुज़र (मर) गया

दौलत शोहरत कामयाबी अजब दौड़ थी
जितना उठा ऊपर, उतना मैं गिर गया

तुम हवस को मेरी तरक्की का नाम दे दो
मेरी तिश्नगी को देख, समंदर भी डर गया

इन ख्वाहिशों की मगर कोई हद नहीं होती
इनके पीछे चल कर सिकंदर भी मर गया

जिस्म-ओ-जहाँ का खेल, नाहक हो तुम परेशाँ
कभी ख्वाब बिखर गया, कभी जिस्म बिखर गया

© - प्रशांत सेठ