मैंने पढ़ी थी कभी
मेंडेल की जीन थ्योरी
जिसके अनुसार
माँ-पिता से हस्तांतरित होते हैं
संतान में संस्कार
मुझे पता है
संस्कारों से ही मिलती है दृष्टि
दृष्टि से चिंतन
और चिंतन से मिलती है
जीवन को दिशा
तो एक दिन
मैंने पूछ ही लिया उससे ...
बुद्धिमत्ता
जब हो जाती है व्यभिचारिणी
तब होता है संसर्ग
कभी स्वार्थ से
कभी अहंकार से
और कभी महत्वाकांक्षाओं से
इनके संस्कार से
बुद्धि जब देखती है संसार को
लाभ-हानि के गणित से
तब पाती है औरों में
अपना प्रतिद्वंदी
फिर शुरू हो जाती है
जीवन में स्पर्धा
और खो जाती है बुद्धि
कामनाओं के लौकिक जंगल में
बुद्धिमत्ता
जब होती है अहिल्या सी पवित्र
तब करती है निश्छल प्रेम
ह्रदय में विराजमान
परमेश्वर से
इस मिलन से उत्पन्न बुद्धि
नहीं जानती गणित लाभ-हानि का
वो करती है चिंतन
सही-गलत का
धर्म और अधर्म का
तब सम्पूर्ण सृष्टि में समा जाता है
"मैं" का अस्तित्व
दिखने लगता है हर जीव में
अपना ही अक्स
उतरती है जीवन में
सबके प्रति
भेद रहित स्वीकार्यता
और बुद्धि बढ़ने लगती है
जिज्ञासा का हाथ थाम कर
सत्य के मार्ग पर
कुछ प्रश्नों को माना
हल कर देती हैं विवशतायें
प्रश्न को ही मारकर
फिर भी उस दिन
मैंने पूछ ही लिया
ज़िन्दगी के अस्पताल में
अनुभवों के पलंग पर
चिंतन की प्रसव वेदना से पीड़ित
अपनी बुद्धिमत्ता से
बता, तेरी कोख से जन्म ले रही
इस बुद्धि का जनक कौन है?
© - प्रशांत सेठ
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