Friday, December 16, 2016

निःशब्द

भाव असीम हैं, शब्द सीमित। ह्रदय के भावों को शब्द देने की कोशिश में अपने बौनेपन के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। तुमने पूछा प्रेम क्या है? ये तो नहीं मालूम, किन्तु खुद को ज़रा सा भी बचा लेना समर्पण नहीं है, प्रेम नहीं है; इतना मालूम है। जिस प्रकार ज्ञानी होने का एहसास सबसे बड़ा अज्ञान है; उसी प्रकार प्रेमी होने का एहसास सबसे बड़ा अप्रेम है। प्रेम, समर्पण, भक्ति इनका अर्थ खोजने निकलो तो इस तलाश की कीमत अपने अस्तित्व से चुकानी पड़ती है।

निःशब्द

मुखरित भाव बिखर जाते हैं
मुझे निःशब्द ही रहने दो
सुन सको तो मौन सुन लो
नयनों को ही कहने दो

तुम कहती श्रृंगार लिखूँ
तुम रूठो मनुहार लिखूँ
तुम परे हो हर भाष्य से
कैसे शब्द आभार लिखूँ
ईश्वरीय कृति अनुपम
इसको मौलिक रहने दो
मुखरित...

माप सका ना प्रेम की
कोई कवि गहराई है
कोई गीत कोई ग़ज़ल
कहाँ तुम्हें कह पाई है
प्रेम परिभाषा गढ़ने की
चाह अभी तुम रहने दो
मुखरित...

ढूँढ रहे कृष्ण आज भी
राधा के ह्रदय का छोर
ताक रहा चाँद अब तक
सम्मोहित सा वो चकोर
इक अनजानी सी मंज़िल का
ये सफ़र है, रहने दो
मुखरित...

मुरली की धुन में सुनना
धुन प्रेम की राधा है
प्रेम समर्पित भक्ति के बिन
ईश्वर खुद भी आधा है
पूर्णता की चाह लेकर
प्रवाह तुम तक बहने दो
मुखरित...

समर्पण से जीत मुझको
तुम कहती हो हार लिखूँ
इसे अपनी जीत लिखूँ या
खुद पर मैं उपकार लिखूँ
अबूझ इस पहेली को तुम
अनुत्तरित ही रहने दो
मुखरित...

तुम कहोगी इसे कविता
मैं शब्द व्यापार लिखूँ
भाव समक्ष गौण शब्द है
मैं कैसे श्रृंगार लिखूँ
खुद को तुम में ढूँढता हूँ
मुझको गुम ही रहने दो
मुखरित...

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, December 7, 2016

डॉलर डॉन II

हम बाज़ार में घूम रहे थे, खड़ी किये कॉलर
अचानक सामने से आ गए दादा डॉलर
हम हिन्दुस्तानी रुपया हैं, इसलिये संस्कारी हैं
हमने कहा दादा प्रणाम, आज किधर की सवारी है?

बोले, छोटे आजकल तुम बहुत इतराते हो
हरे नीले थे, गुलाबी हुये जाते हो
ऐसी कौन सी तुम्हारी लॉटरी निकल पड़ी है?
के आज हमारे सामने तुम्हारी कॉलर खड़ी है?

कल तक तो अंडरग्राउंड तिजोरी में पड़े थे
अभी हमने देखा तुम बैंक की लाइन में खड़े थे?
ये क्या माया है, कुछ हमें भी समझाओ ना
फुरसत मिले तो एकाध दिन घर आओ ना

हमने कहा दादा चारों तरफ खलबली है
हमारी अर्थव्यवस्था कैशलेस हो चली है
हमें कैद करने वाले ज़ार ज़ार रो रहे हैं
हमारी तरक्की हुई है, हम डिजिटल हो रहे हैं

हमारे प्रमोशन से कई बीमारियों का इलाज होगा
सुविधा भोगियों को लूज़ मोशन, मतलब स्वस्थ समाज होगा
हमारे केशलेस होने से बरसों की परंपरा टूट गई है
रिश्वत, दूल्हे के फूफा की तरह रूठ गई है

आतंक, काला बाज़ारी, सट्टा और हवाला
इन सबके पोषक, भ्रष्टाचार का मुँह काला
सुना है इनके बहुत बुरे दिन आने वाले हैं
टैक्स चोर छाती फुलाते थे, अब मुँह चुराने वाले हैं

देश का धन बढ़ेगा, टैक्स की दरें घटेंगी
अंधे की रेवड़ियाँ बराबर से बंटेंगी
अब काला धन चुनाव ना लड़ पायेगा
देखना भले लोगों का शासन आयेगा

हमारी भी इज़्ज़त बढ़ेगी मुद्रा बाज़ार में
तब आयेगा मज़ा आपसे व्यापार में
कुछ वक़्त लगेगा मगर दिन जरूर फिरेंगे
अब आपके मुकाबले हम और नहीं गिरेंगे

दादा डॉलर मुस्कुराये, बोले रुकावट के लिए खेद है
छोटे तुम्हारे सपनों की व्यवस्था में कुछ छेद हैं
उनका क्या बिगड़ेगा जो विदेशों में दलाली पाते हैं
जिन मानसिक गरीबों के स्विस बैंक में खाते हैं

चलन से बाहर की मुद्रा माना कु-जात होगी
बैंक में धन आएगा तो अच्छी बात होगी
मगर जायेगा कहाँ ये कौन बतायेगा?
गरीबों का धन माल्या ही तो खायेगा

पिछले दरवाज़े से ठेके हो रहे हैं
गरीब के आवास में अमीर सो रहे हैं
देश के संसाधन कौड़ियों में बिकते हैं
लोग उसूलों पर नहीं, कोहनियों पर टिकते हैं

व्यवस्था अगर उन्हीं के हाथ में रहेगी
जिनके घर से काले धन की गंगा बहेगी
तो राजनीति सेवा नहीं, व्यापार होगी
और व्यवस्था जस की तस, लाचार होगी

तुम्हारे देश में जुगाड़ों की परम्परा है
सेटिंग का हुनर, कूट कूट के भरा है
आम आदमी लचर व्यवस्था का शिकार है
सच तो ये है, वही खुद जिम्मेदार है

पता नहीं तुम किन संस्कारों की बात करते हो
कानून का सम्मान नहीं, क़ानून से डरते हो
साहस के बगैर ईमान, बहुत दूर नहीं चलता
जब तक खुद ना बदलो, समाज नहीं बदलता

राष्ट्रवाद कर्म में रखो, सिर्फ मुँह से मत चीखो
जाओ पहले अपने हिस्से के बलिदान को सीखो
नोट के साथ साथ मानसिकता भी बदल लो
वरना कॉलर नीचे करो, पतली गली से निकल लो

© - प्रशांत सेठ