भाव असीम हैं, शब्द सीमित। ह्रदय के भावों को शब्द देने की कोशिश में अपने बौनेपन के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। तुमने पूछा प्रेम क्या है? ये तो नहीं मालूम, किन्तु खुद को ज़रा सा भी बचा लेना समर्पण नहीं है, प्रेम नहीं है; इतना मालूम है। जिस प्रकार ज्ञानी होने का एहसास सबसे बड़ा अज्ञान है; उसी प्रकार प्रेमी होने का एहसास सबसे बड़ा अप्रेम है। प्रेम, समर्पण, भक्ति इनका अर्थ खोजने निकलो तो इस तलाश की कीमत अपने अस्तित्व से चुकानी पड़ती है।
निःशब्द
मुखरित भाव बिखर जाते हैं
मुझे निःशब्द ही रहने दो
सुन सको तो मौन सुन लो
नयनों को ही कहने दो
तुम कहती श्रृंगार लिखूँ
तुम रूठो मनुहार लिखूँ
तुम परे हो हर भाष्य से
कैसे शब्द आभार लिखूँ
ईश्वरीय कृति अनुपम
इसको मौलिक रहने दो
मुखरित...
माप सका ना प्रेम की
कोई कवि गहराई है
कोई गीत कोई ग़ज़ल
कहाँ तुम्हें कह पाई है
प्रेम परिभाषा गढ़ने की
चाह अभी तुम रहने दो
मुखरित...
ढूँढ रहे कृष्ण आज भी
राधा के ह्रदय का छोर
ताक रहा चाँद अब तक
सम्मोहित सा वो चकोर
इक अनजानी सी मंज़िल का
ये सफ़र है, रहने दो
मुखरित...
मुरली की धुन में सुनना
धुन प्रेम की राधा है
प्रेम समर्पित भक्ति के बिन
ईश्वर खुद भी आधा है
पूर्णता की चाह लेकर
प्रवाह तुम तक बहने दो
मुखरित...
समर्पण से जीत मुझको
तुम कहती हो हार लिखूँ
इसे अपनी जीत लिखूँ या
खुद पर मैं उपकार लिखूँ
अबूझ इस पहेली को तुम
अनुत्तरित ही रहने दो
मुखरित...
तुम कहोगी इसे कविता
मैं शब्द व्यापार लिखूँ
भाव समक्ष गौण शब्द है
मैं कैसे श्रृंगार लिखूँ
खुद को तुम में ढूँढता हूँ
मुझको गुम ही रहने दो
मुखरित...
© - प्रशांत सेठ
बहुत सुंदर भाव।
ReplyDeleteखूब बधाइयाँ।