Saturday, January 7, 2017

एक मूरत टूटी सी

पेड़ के नीचे रखी भगवान की टूटी मूर्ति को देख कर समझ आया कि..
परिस्थिति चाहे कैसी भी हो,
पर कभी ख़ुद को टूटने नही देना
वर्ना ये दुनिया जब टूटने पर भगवान को घर से निकाल सकती है तो फिर हमारी तो औकात ही क्या है।
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उपरोक्त पंक्तिया वॉट्सएप्प पर पढ़ने को मिलीं तो मन में कुछ भाव जागे। सोचा चलो किसी टूटी हुई मूरत से साक्षात्कार किया जाये...

एक मूरत टूटी सी...

हाँ, मैं खंडित सी मूरत में हूँ
हाँ, मैं तिरस्कार की सूरत में हूँ
हाँ, मैं तुम्हारे हर अपमान में हूँ
क्योंकि, मैं तुम्हारे निर्माण में हूँ

किन्तु,
तुमको भय लगता है
टूटने से
रिश्ते नाते और संसार
छूटने से
क्योंकि, ये संसार देता है आभास
तुम्हारे होने का
और तुम में नहीं है साहस
जो पास है, उसे खोने का

तुम्हारा जीवन
एक सुखद कल की तलाश भर है
और ये कल्पना भी
वर्तमान की लाश पर है
तुम्हारे असुरक्षित मन को छद्म
खोल चाहिए
तुमको संसार की दृष्टि में अपना
मोल चाहिए

इसलिये,
तुम पकड़ते हो झूठ के
सहारों को
इस संसार के मायावी
इशारों को
अनिर्मित को तुमने सदैव ही
नकारा है
तुम्हारी श्रद्धा ने केवल निर्मित को
स्वीकारा है

लेकिन,
मुझपर तो दायित्व है
तुम्हारे निर्माण का
तुम्हारा पथ करना है प्रशस्त
जन्म जीवन निर्वाण का
भ्रम का आवरण हटते ही
सत्य का ज्ञान है
तुम्हारी टूटन ही निर्माण का
प्रथम सोपान है

तुम्हारे लिए सरल है
टूटी मूरत को नकार देना
लेकिन जब कभी भी तुम टूटो
मुझे पुकार लेना
निर्माण योग्य हर मनुष्य
मेरी श्रद्धा का पात्र है
और तुम्हारा टूटना ही एक
विकल्प मात्र है

देखो,
किसी नवजात से पंछी में
सम्भावना के पर को
किसी अनगढ़े पत्थर में
छिपे अवसर को
हर टूटन के पीछे सुनो
निर्माण के स्वर को
इतना भी कठिन नहीं है
समझ पाना ईश्वर को

© - प्रशांत सेठ

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