Wednesday, August 10, 2022

हिन्दु, हिंदुत्व, हिन्दुवाद एवं राष्ट्रवाद

हिन्दु, हिंदुत्व, हिन्दुवाद एवं राष्ट्रवाद

हिन्दु शब्द का प्रयोग किसी भी सनातन शास्त्र में क्यों नहीं है? वास्तव में जिसे सन्दर्भ में धर्म शब्द का वर्तमान समय में प्रयोग किया जाता है वह धर्म ना होकर मत, संप्रदाय अथवा पंथ है। पंथ एवं संप्रदाय अथवा मजहब केवल कुछ मान्यताओं (set of beliefs) को मानने के आग्रह को कहा जाता है। धर्म केवल एक ही है वह है "सनातन धर्म"। सनातन धर्म सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों एवं ईश्वर की अनेक व्याख्याओं को समाहित किये हुए है। ईश्वर की अनेक व्याख्याओं के होते हुए भी सनातन शास्त्र इस बात को सदैव स्वीकार करते हैं कि कोई भी परिभाषा इस असीम व अंनत तत्व को सम्पूर्ण रूप से नहीं समेट सकती। और यह भी स्वीकार किया गया है कि कोई भी परिभाषा अंतिम नहीं हो सकती। इस लिहाज से सनातन धर्म सदैव सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों एवं परिभाषाओं के प्रति ना सिर्फ सहिष्णु है, वरन भविष्य में नवीन तथ्यपरक चिंतन को स्वीकार करने के लिए तत्पर भी रहा है। सनातन धर्म में मनुष्यों की इसी वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा की भावना ही उसकी वास्तविक सहिष्णुता है। प्रश्न यह उठता है कि जब सब प्रकार की मान्यताओं का, यहाँ तक कि नास्तिक शास्त्रों (जो वेद विरुद्ध हैं), को भी यहाँ एक दर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त है, तब रक्षा किससे करना है और क्यों? अब यहाँ इस तथ्य पर गहराई से विचार करें तो मनुष्य की इसी वैचारिक दर्शन स्वतंत्रता की रक्षा करना सनातन धर्म है। जो पंथ अन्य मान्यताओं को ख़ारिज करते हैं अथवा भविष्य में नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न होने की सभी संभावनाओं का अंत करना चाहते हैं, सनातन धर्म में ऐसे कट्टरपंथियों को अधर्मी कहा गया है।

सनातन धर्म ने केवल मनुष्य ही नहीं, अन्य जीवों के साथ साथ प्रकृति के विभिन्न तत्व पर्वत, नदी, वृक्ष, इत्यादि के सह अस्तित्व को भी स्वीकार किया है। देव रूप में इन तत्वों की उपासना हमारे इसी दर्शन का बोध कराती है कि इन सबके बिना मनुष्य का अस्तित्व भी सम्भव नहीं है। अतः इनके प्रति सदैव आभार के भाव के साथ इनको पुष्ट करने हेतु सभी आवश्यक पद्धतियों का जीवन में समावेश ही सनातन संस्कृति है। किसी भी जीव के जीने के अधिकार के अधिकार के प्रति स्वीकार भाव ही हमारी अहिंसा की अवधारणा का मूल है। और यही अहिंसा हमें ऐसे अधर्मियों का विरोध करने की शक्ति देती है। अत: ऐसे सम्प्रदाय जो अन्य पंथों के प्रति असहिष्णु हैं, उन विधर्मियों को मनुष्यता का शत्रु जानकर ही उक्त श्लोक को पढ़ा जाता है।

अहिंसा परमो धर्मः
धर्म हिंसा तथैव च

हिन्दु शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो सनातन धर्म में विश्वास रखते हैं। इस लिहाज से हिन्दु स्वाभाविक रूप से सभी पंथों के प्रति सहिष्णु हो जाता है। यही हिंदुत्व की भावना है और एक कट्टर हिन्दु स्वाभाविक रूप से मनुष्य की स्वतंत्रता का रक्षक होने के कारण कट्टरपंथी आतंक के प्रति असहिष्णु हो जाता है। हिंदूवाद इसी दर्शन का मुखर स्वरुप है। इस कारण से हिन्दु के सन्दर्भ में कट्टरता के मायने ही बदल जाते हैं। एक कट्टर हिन्दु मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक है, जबकि अन्य पंथों की कट्टरता इसी वैचारिक स्वतंत्रता के हनन की पक्षधर है। अतः सनातन धर्म, हिन्दु, हिंदुत्व और हिन्दुवाद एक ही मूल भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो है मनुष्य की वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा।

राष्ट्र शब्द से जिस भाव की प्रतीति होती है वह धरती के उस भौगोलिक अंश को कहा गया है जहाँ एक प्रकार की मान्यताओं (set of beliefs) का प्रभुत्व होता है। इन्ही मान्यताओं को राष्ट्र की संस्कृति कहा जाता है। वैसे तो किसी समय सनातन धर्म संस्कृति का भौगोलिक विस्तार आज से कई गुना अधिक था, परन्तु राजनीतिक कारणों से हुई सांस्कृतिक हानि ने इसके विस्तार को वर्तमान भारत भूमि तक समेट दिया। इस सांस्कृतिक हानि का प्रमुख कारण सनातन धर्म की शिक्षा की स्वतंत्रता को समाप्त करने के साथ साथ सहिष्णुता और अहिंसा की गलत व्याख्या है। सनातन धर्म प्रदत्त वैचारिक स्वतंत्रता का दुरूपयोग करके अनेक कट्टरपंथी विधर्मियों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस संस्कृति को नष्ट करने के लगातार प्रयास किये हैं एवं आज भी कर रहे हैं। वर्तमान हिन्दुवाद इस ऐतिहासिक तथ्य को भली भांति जानता है कि अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु, विधर्मी कट्टरपंथी आतंक से अपने राष्ट्र की रक्षा परम आवश्यक है। अतः एक हिन्दु स्वाभाविक रूप से राष्ट्रवादी भी होता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि अन्य पंथ अथवा सम्प्रदाय का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। परन्तु यह अवश्य स्पष्ट हो जाता है कि दूसरों की वैचारिक स्वतंत्रता का हनन करने वाले कट्टरपंथ का भारत में कोई स्थान नहीं है। इसी जागरण से भयभीत होकर कुछ कतिपय स्वार्थी राजनीतिक तत्वों ने हिंदुत्व और हिंदुवाद के विषय में जानबूझकर भ्रम प्रसारित करने का दुष्कृत्य किया है। परन्तु वे ये नहीं जानते कि अनेक सदियों से ऐसे दुष्कृत्यों को झेलते हुए यह सनातन संस्कृति आज भी जीवित है और सदैव रहेगी। धर्म कदापि खतरे में नहीं है वरन अधूरे धार्मिकों के अस्तित्व हमेशा खतरे में रहते हैं। अतः अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सर्वप्रथम अपनी धार्मिकता को पूर्ण कीजिये। संसार को इस बात का परिचय दिया जाना चाहिए कि हमारी हिन्दुवादी कट्टरता इसी वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा का नाम है, जबकि विधर्मी पंथों में सहिष्णुता का कोई स्थान दिखाई नहीं देता। धर्मनिरपेक्ष का अर्थ है जिसे धर्म से कोई अपेक्षा ना हो, परन्तु हमें मनुष्य और विश्व के कल्याण के लिए सनातन धर्म से पूर्ण अपेक्षा है। यही हमारी धार्मिकता है। हिंदुत्व या हिन्दुवाद इसी लक्ष्य के प्रति कृतसंकल्प कट्टरता का नाम है। जय हिंद!

- प्रशांत सेठ

Tuesday, January 11, 2022

मिथ्या के मोहपाश

सत्य बोध तुम कहते जिसको,
सब मन का ताना बाना है।
एक ही रंग का चश्मा लेकर
सत्य को किसने पहचाना है?

जीवन समर के कुरुक्षेत्र में,
सत्य के समक्ष जब आओगे ।
निज कुतर्क के संधानों से,
सिर्फ पराजय ही पाओगे ।
कालचक्र जो चला आ रहा, 
क्या तर्कों से रुक पाना है?

प्रश्न सनातन जस का तस है,
मूक हुआ अब हर ज्ञाता है ।
पंथों के इस शास्त्रार्थ में,
उत्तर तो खो सा जाता है ।
उपादान हैं बुद्धि के सीमित,
फिर असीम को अपनाना है ।

मन है चक्षु के पीछे तो,
फिर मन के पीछे है कौन ?
करता सदा अचंभित मुझको,
दृष्टा का यह शाश्वत मौन ।
शोर है ये सब लहरों का ही,
अरु सागर तो अनजाना है ।

आह! पखेरू कटे रखे हैं,
अहं बोध के पिंजरे में ।
ज्यों असीम नभ जा बैठा हो,
सिमटा कर खुदको कमरे में ।
अंश स्वयं तू है अम्बर का ,
तोड़ के पिंजरा जाना है ।

सुप्त चेतना पड़ी हुई है
चित्त उलझा है तन मन में
अहो बिम्ब को भूल गया क्यों,
प्रतिबिम्बों की उलझन में ।
जाग शक्ति, अब जाग, तुझे,
इस शव में ही शिव जगाना है ।

© - प्रशांत सेठ