राह बड़ी हो मुश्किल
हो दूर नज़र से मंजिल
ऊँची-नीची डगर से
यूँ ना तुम डरो
ओ दूर के मुसाफिर, तुम चलना शुरू करो
मिले ना कोई साथ
बढ़े ना कोई हाथ
तन्हाई पर रंज
ज़रा भी ना करो
चेहरे हों अनजाने, तुम मिलना शुरू करो
हवाओं में ज़हर हो
निगाहों में कहर हो
इस मौसम की ज़रा भी
ना परवाह तुम करो
ओ मासूम सी कली, तुम खिलना शुरू करो
ताक़तवर हो दुश्मन
कमज़ोर होता हो मन
लड़ने से पहले ही
यूँ हथियार ना धरो,
ओ कलयुग के अर्जुन, तुम लड़ना शुरू करो
हौसले कड़े हों
फलक से बड़े हों
मृत्यु से पहले ही,
क्योंकर तुम मरो,
ओ नीड़ परिंदे, तुम उड़ना शुरू करो
© - प्रशांत सेठ




















