Saturday, December 7, 2019

रुक जाना नहीं ...

राह बड़ी हो मुश्किल
हो दूर नज़र से मंजिल
ऊँची-नीची डगर से
यूँ ना तुम डरो
ओ दूर के मुसाफिर, तुम चलना शुरू करो

मिले ना कोई साथ
बढ़े ना कोई हाथ
तन्हाई पर रंज
ज़रा भी ना करो
चेहरे हों अनजाने, तुम मिलना शुरू करो

हवाओं में ज़हर हो
निगाहों में कहर हो
इस मौसम की ज़रा भी
ना परवाह तुम करो
ओ मासूम सी कली, तुम खिलना शुरू करो

ताक़तवर हो दुश्मन
कमज़ोर होता हो मन
लड़ने से पहले ही
यूँ हथियार ना धरो,
ओ कलयुग के अर्जुन, तुम लड़ना शुरू करो

हौसले कड़े हों
फलक से बड़े हों
मृत्यु से पहले ही,
क्योंकर तुम मरो,
ओ नीड़ परिंदे, तुम उड़ना शुरू करो

© - प्रशांत सेठ


Saturday, October 26, 2019

चॉक एंड डस्टर

तुमने देखा होगा
दुनिया लिखती है
तुम्हारे मन के ब्लैकबोर्ड पर
अपना अपना गणित

समय की सफेद चॉक
छोड़ जाती है बहुत से निशान
अनुभव के
और धीरे धीरे यही निशान
बन जाते हैं "जीवन दर्शन"

बस इतना करना
अगली कक्षा में जाने के पहले
मिटाते जाना हर एक निशान
प्रेम के डस्टर से

शून्य से शून्य तक
सृष्टि का विस्तार और सिमटना
निर्भर है तुम्हारी कला पर
क्या सौंप सकोगे वापस?
मन का ब्लैकबोर्ड
ज्यों का त्यों, कोरा ही

जीवन के स्कूल में
बुद्धत्व के पाठ से उपजा
एक प्रश्न

© - प्रशांत सेठ

Friday, October 25, 2019

गुरु भजन

गुरु की वाणी में कल कल
धार गंगा सी बहती है
चारों वेद अठारह पुराण की
बात यहीं तो रहती है

सतयुग में हरिश्चंद्र ने
गुरु को ही सर्वस्व दिया
त्रेता में रामचंद्र ने फिर
मर्यादा को प्रशस्त किया

द्वापर की तो बात कहें क्या
केशव की बलिहारी है
गुरु का ध्यान धरे हृदय में
स्वयं कृष्ण मुरारी है

कलिकाल का नर्तन देखो
धर्म कहाँ विलुप्त हुआ
लोभ विलास में पड़े मानव
ज्ञान भी ऐसा सुप्त हुआ

पापों का है वेग प्रचंड
बुद्धि इनसे हारी है
गुरु चरणों की सेवा ही
इस युग में तारणहारी है

किस दिशा में चलते हम हैं
लक्ष्य का हमको ज्ञान नहीं
सत्य को क्या जानें जबकि
स्व का हमको भान नहीं

परम सत्य के पथ पर उसकी
चलने की तैयारी है
गुरु शरण मे रहकर जिसने
दृष्टि भीतर उतारी है

अहं अपना कर समर्पित
गुरु चरणों को लीजे थाम
पथ का आनंद ना रोके तो
दूर नहीं है परम धाम

भक्ति भाव से श्रद्धा जिसने
गुरु पर अपनी वारी है
उसकी नैया भवसागर की
लहरों से कब हारी है?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 24, 2019

!!सावधान!!

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
तर्क करती है
अब नहीं बहलती किताबी ज्ञान से
समझने लगी है यथार्थ

मैं समझाता हूँ प्रेम
तो करती है प्रश्न अस्तित्व पर
प्रेम के लिए अनिवार्य है अस्तित्व

मैं समझाता हूँ
"अहिंसा परमो धर्म:"
कहती है
"धर्म हिंसा तथैव च:"

मैं समझाता हूँ "वसुधैव कुटुम्बकम"
वह कहने लगी है
"धर्मो रक्षति रक्षितः"

मैं जगाना चाहता हूँ
श्रद्धा और विश्वास
वो दिखाती है
इतिहास के आईने में
पीठ पर निशान "विश्वासघात" के

मैं सुनाता हूँ किस्से, देता हूँ दिलासा
पाप बढ़ने पर, ईश्वर के अवतार के
कहती है, अवतरित है सदा से
मेरे भीतर मेरा ईश्वर

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
अब नहीं आती छलावे में
"धर्म निरपेक्ष" जैसे छद्म शब्दों के

सावधान!
अब यह मेरे बस की बात नहीं
तुम्हारी भी जिम्मेदारी हो चली है
मेरी "सहिष्णुता"
अब सयानी हो गई
जवाब देने लगी है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, October 22, 2019

गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल

घर के बाहर
गीला-सूखा कचरा समेटे
दो डस्टबिन, हरे और नीले
बैठे रहते हैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
मेरे घर की पवित्रता, ऋणी है तुम्हारी

लेकिन
हृदय की दहरी के भीतर
मेरे मन का गीला-सूखा कचरा
अब भी गंधाता है समाज को
इसे नहीं ले जाता कोई गाड़ीवाला

काश!
हमेशा खुला रहे
हमारी समझ का द्वार
हमारी दृष्टि जाए
अहं के दरवाजे से बाहर
हमारे मन का हो विस्तार
स्वार्थ की चौखट के उस पार भी
हमारे हृदय में समा जाए
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक
समूचा संसार

तब शायद
हम भी करने लगें प्रबंध
अपने नकार का

मैंने सुना है
कुछ लोग बना लेते हैं
मन के गीले-सूखे कचरे से खाद
फिर उगाते हैं फूल, जीवन की बगिया में
और महक जाता है उनका घर
भीतर भी, बाहर भी

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, September 11, 2019

शतरंज का खिलाड़ी

तुमने भी खेला होगा ये खेल
कभी काले
तो कभी सफेद मोहरों से
और चखा होगा स्वाद
हार का भी, जीत का भी

आमने सामने डटी दो सेनाएं
अपने अपने अहंकार की
मन के चौंसठ खानों की बिसात पर
काम क्रोध मद लोभ रूप
हाथी घोड़े ऊँटों से सुसज्जित
प्रतिद्वंदी से युद्ध को तत्पर

अधर्म के पासों से, जीत के प्रयास में
तुमने भी दाँव पर लगाई होगी
धर्म की द्रौपदी
तुम्हारी ज्ञान इंद्रियों ने भोगा होगा
जन्म, फिर पुनर्जन्म का लम्बा वनवास
मन की सौ इच्छाओं के चक्रव्यूह में
तुम्हारी समझ का अभिमन्यु
मरा होगा कई बार

एक बार फिर से खेल कर देखना
इस बार दोनों तरफ से ....
खुद ही खुद का प्रतिद्वंदी बनकर
चलना चालें, अपने ही विरुद्ध
फिर सोचना
कौन जीता और कौन हारा?

शायद तुम समझ सको
कुरुक्षेत्र के मैदान में बिछी
शतरंज की बिसात को
और पहचान पाओ उस खिलाड़ी को
जिसने कहा था
"मैं" ही मरता हूँ
"मैं" ही मारता हूँ

शायद अबकी बार
सारे द्वंद भूलकर
खेलना सीख जाओ तुम भी
संसार के कुरुक्षेत्र में
जीवन की शतरंज

© - प्रशांत सेठ


Sunday, September 8, 2019

हे सत्य के वाहक !!

मैं देखता रहा उम्र भर
तुम्हें जीते हुए
ठीक उसी समय जी रहा था
घुट घुट कर, कोई और
तुम्हारे मन के भीतर
तुम्हारा सत्य

अभिव्यक्ति
मर जाती है कई बार
व्यक्त हुए बिना ही
व्यक्ति के भीतर ...
जैसे गर्भ में ही मर जाया करती हैं
अजन्मी बेटियाँ

सत्य
मर जाता है अक्सर
जब खोखले शब्द उठा लेते हैं दायित्व
उसे जन्म देने का ...
अंधत्व और
"ओढ़े हुए अंधत्व" के संयोग से जैसे
उत्पन्न हो जाया करता है
दुर्योधन

अभिव्यक्ति
पा लेती है पूर्णता
जब अहंकारी सींखचों में कैद
प्रतिकूलताओं की बेड़ियों में जकड़ी
धर्म की देवकी करती है संकल्प
उसे जन्म देने का
और साहस का वसुदेव
निष्काम कर्म की टोकरी में रख
पहुँचा देता है उसे
जीवन के थपेड़ों से उस पार ...
प्रेम की यशोदा की गोद में
बाबा (आ)नंद के आँगन में
ज्ञान रूप गोकुल में
अनुभूति के वृंदावन में

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, September 4, 2019

"मैं" और मेरा राम

सुनो विशिष्टो
शिष्टता से विलग होना ही
यदि है विशिष्टता
शेष से अलग होना ही
यदि होता है विशेष
यदि तुम्हारा बल
निर्बलों को देखकर होता हो पुष्ट
यदि तुम्हारा ज्ञान हो
औरों के अज्ञान से तुष्ट

तब समझ लेना
मायावी रावण के पास
अपहत है तुम्हारी शक्ति
और अहंकार के नागपाश में
मूर्छित पड़ा है ज्ञान

दुआ करना
भीतर विलाप करते आत्माराम को
कभी समय का सुषेण बताए 
पहाड़ से जीवन में दुर्लभ
उस जड़ी का पता
और तुम्हारे विवेक का हनुमान
भक्ति के बल पर ले आए
प्रेम की संजीवनी

तब समझोगे अर्थ
व्यक्ति में समष्टि का
खुद के भीतर सृष्टि का
महत्व श्रद्धा और भक्ति का
कण कण में उसकी
अभिव्यक्ति का

और जानोगे
आनंद वही है अशेष
जिसका हो सबमें समावेश
ज्ञान भी वही ज्ञान है
प्रेम ही जिसका परिणाम है

© - प्रशांत सेठ


Thursday, August 29, 2019

मन के मर्म तक

सुबह ऊगते सूरज से
भोर डूबते चाँद तक
मैं देखता रहा वर्षों तक
उसे रोज बढ़ते हुए

कर्म के बीज से उपजता रहा
एक विराट वृक्ष
परिवार, कुटुंब और रिश्तों की
बढ़ती गईं शाखें
हरे भरे पल्लवों का
विस्तृत होता रहा संसार
मगर ....

संसार ने कहा "आम" है
इसकी वाणी में अमराई सी ठंडक है
परिचितों ने कहा "आम" है
इसके कर्म में "आम" की खुशबू है
मगर माली ने कहा "नीम" है
इसके मन में कड़वाहट है

ऐ व्यक्ति!
तुम वास्तव में कौन हो?
मन का अव्यक्त विकार
या कि प्रकट विचार
या फिर कर्म साकार?

नहीं!
तुम कोई और हो मन के भीतर
और बाहर कोई और
मन से कर्म तक
तुम बदलते रहे कई रूप

संसार ने तुम्हें जाना
तुम्हारी वाणी से
परिवार और कुटुंब है परिचित
तुम्हारे कर्म से
मगर फलित हुए जीवन में
तुम्हारे मनोभाव

काश तुम होते
अपने रचनाकार की अभिव्यक्ति
काश तुम होते
मन वचन कर्म से एक ही व्यक्ति
तो आम के वृक्ष पर
क्योंकर फलता नीम?
यकीन मानो
मीठे मनोभावों से फलित होती
केवल मिठास

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 26, 2019

एक मित्र बड़ा विचित्र

शब्दों से मैं खींच रहा हूँ
आज अनूठा सा एक चित्र
काश कलम से गा पाऊँ वो
अदभुत सा जीवन चरित्र

हम संग खेले कूदे पढ़े थे
साथ हमने सपने गढ़े थे
समय की इस चाक पे हम
मिट्टी के दो कच्चे घड़े थे

एक दिन सपने घायल लेकर
पास जो थे चावल लेकर
मन याचक बन द्वार खड़ा था
मित्र का वैभव बहुत बड़ा था

उसने सुना तो दौड़ा आया
आकर मुझको गले लगाया
कुछ समय तो सुख से बीता
निर्धन चावल से भी रीता

था निराश मन खाली हाथ
क्यों व्यर्थ में पाली आस
अपनी कुटिया कहाँ बुरी थी
क्या मिला धनिकों के पास

क्षण भर के वैभव का सुख
देता जीवन भर का दुःख
कटु सत्य का ज्ञान हुआ
तब यथार्थ का भान हुआ

बदला बदला सब कुछ पाया
मैं ये किस पते पर आया
अब समझा हूँ उसकी लीला
आज अंतर्मन हुआ है गीला

यह लोक है द्वारका नगरी
मन है छिद्रों वाली गगरी
उस घट में कब जल ठहरे
जिसमें छिद्र हों इतने गहरे

जीवन में रहे ना शेष
इच्छाओं का कोई क्लेश
मन सुदामा रहे वैरागी
किंतु कृष्ण का हो अनुरागी

© - प्रशांत सेठ

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Friday, August 2, 2019

गुमशुदा

मैंने पूछा सिकुड़ी हुई अँतड़ियों से
तुम्हारा धर्म क्या है?
तुम्हारा इष्ट कौन है?

भूख का इष्ट रोटी है साहब
और अमाशय के मंदिर में
इस देवता की स्थापना ही मेरा धर्म है
और मेरी पूजा है
श्रम के यज्ञ में, पसीने की आहुति

मैंने पूछा झुकी हुई कमर से
रोग ग्रस्त मरणासन्न देह से
अपना इष्ट और धर्म बताओ?

जीवन और सिर्फ जीवन
यही मेरा धर्म है
चंद साँसें जो दिला दे
वही इष्ट है
दुआ ही मेरी इबादत है

मैंने पूछा
जीवन में पहला कदम बढ़ाते
नन्हे पैरों से
तुम्हारा पंथ क्या है?
और मंज़िल किधर है?

ज्ञान मेरा पंथ है
मुझे खुद से मिला दे वही इष्ट है
अज्ञान से मुक्ति ही मंज़िल है

मैंने पूछ बैठा भरे पेटों से
स्वस्थ शरीरों से
और ज्ञानी के चोले में
तथाकथित शिक्षितों से

मैं गुम गया हूँ अब
रंगों और झंडों की भीड़ में
फसादों के शोर में, लफ़्ज़ों के युद्ध में
उन्मादी जाहिलों में, सियासती फ़ितूरों में

मैं तुम्हारा चिंतन
गुम गया हूँ नफरत के मेले में
और खो गया मुझसे इस कोलाहल में
मानवता का धर्म
सत्य का पंथ
और प्रेम की मंज़िल

© - प्रशांत सेठ


Saturday, July 27, 2019

भय बिनु होइ न प्रीति

हे डरे हुए लोगों के 49 प्रतिनिधियो
तुम्हारा डर लाज़िमी है
क्योंकि
तुम्हारा धर्म खतरे में है
तुम्ही से

धर्म मरता नहीं है
धार्मिकों के मरने से
ईसाईयत नहीं मरी यीशु के साथ
बुद्धत्व नहीं गया बुध्द के साथ
सनातन धर्म मिटा नहीं
राम-कृष्ण के साथ

धर्म मरता है
जब तुम नहीं डरते
मंदिर के प्रसाद में
ज़हर की साज़िश रचते कुछ लोगों से
स्त्रियों को बाँझपन बाँटते श्रीलंकाई डॉक्टर से
मदरसे में पकड़े जाते हथियारों से
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करते
कौम के नेताओं से
कश्मीर के पत्थरबाजों से, हैवानों से
ट्विन टॉवर को मिटाते लादेनों से
मुम्बई को दहलाती साज़िशों से
ध्रुव त्यागियों के हत्यारों से
बुरहान वानियों से, दाऊद इब्राहिमों से
...........
...........
जब तुम नहीं डरते
मध्य पूर्व से आयातित क्रूरता से
धार्मिक उच्छृंखलता से
धर्म के तालिबानी संस्करण से

धर्म मरता है
जब तुम भूल जाते हो
कलाम साहब को, अशफाकुल्लाह को
.........
.........
अब्दुल हमीद को भूलकर
जब तुम्हें दिखता है नायक
तबरेज़ आलमों में

मुझे डर लगता है
जब कोई मदान्ध हत्यारा लेता है
"राम" का नाम
जब कोई कुंठित भगवाधारी देता है
धर्म की परिभाषा
मुझे डर लगता है तब
धार्मिकों की खामोशी से
क्योंकि तब तब
मैं देखता हूँ अपने धर्म को मरते हुए

तुम डरो ज़रूर डरो
तुम्हारा डर ही
विश्व शांति की नई उदघोषणा है
क्योंकि
तुम तब नहीं डरते
जब तुम्हारा धर्म मरता है
अजमल कसाव के हाथों
या फिर हाफ़िज़ सईद की तक़रीरों से

© - प्रशांत सेठ


Sunday, July 7, 2019

केमिस्ट्री

मैंने पढ़ा है
कुछ पदार्थ करते हैं मिलकर
रासायनिक क्रिया
जब अम्ल और क्षार मिलते हैं
तो रह जाता है शेष
नमक और पानी

उन्होंने भी पढ़ा होगा
तभी तो मिलने नहीं देते
सनातन सत्य से
मुसलसल ईमान को
कहीं जाग ना जाए
तुम्हारे खून में नमक
तुम्हारी आँखों में पानी
और धुली हुई आँखों से तुम
पढ़ ना लो फिर से
धर्म को

मैंने सुना है
कुछ पदार्थ होते हैं ज्वलनशील
ज़रा सी हवा में
पकड़ लेते हैं आग

सियासत की हवा में
पाखण्ड और अज्ञान भी
पकड़ लेते हैं
कट्टरता की आग
ये डाल देती है समझ पर
रंगीन धुएं का आवरण
ये करती है सत्य के झूठे अनुवाद
और सोख लेती है
धर्म ग्रंथों से उनके वास्तविक अर्थ

मैंने पढ़ा है
कुछ शाही पदार्थ क्रिया नहीं करते
किसी भी तत्त्व के साथ
जैसे कि धर्म और ज्ञान
इनके सामने हार जाती है
सियासत की हर साज़िश

मगर
मैं जानता हूँ
कुछ पदार्थ होते हैं
प्राणों से भी अधिक बहुमूल्य
इनमें से एक है
अपनी संस्कृति भी

© - प्रशांत सेठ


Monday, July 1, 2019

एक प्यारा सा इतवार

मित्रों के साथ सपरिवार वृक्षारोपण ....

एक प्यारा सा इतवार

कुछ गड्ढे खोदे, कुछ विकार
कुछ पौधे रोपे, कुछ संस्कार
भावों के जल से सींच आज को
रच लिया कल का संसार

कुछ धूप सही, कुछ भूख सही
श्रम की भी थोड़ी बूँद बही
सूरज ने तब कहा हँसकर
वृक्ष नहीं तो तुम ही नहीं

खिलते पल्लव पुष्पों ने जाना
अपने जीवन का आधार

धूप में समझा महत्व छाँव का
शहर ने समझा अर्थ गाँव का
स्वस्थ जीवन की राह में सबने
समझा मतलब श्रम के पाँव का

बचपन ने सीखा यहाँ आकर
प्रकृति को देना आभार

इतना दोहन हम करते हैं
लौटाने से मगर डरते हैं
धरती के इस कर्ज की पहली
चलो आज हम किस्त भरते हैं

मेघों ने भी किया बरसकर
समग्र परिश्रम को स्वीकार

मन की अपनी भूख प्यास का
लक्ष्य ना हो सिर्फ निज विकास का
आज भविष्य को अर्ध्य देते हैं
वर्तमान के लघु प्रयास का

इसी सोच के साथ बीता
एक प्यारा सा इतवार

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 16, 2019

पिताजी

पिताजी अंधे हैं
लोग कहते हैं वो विद्वान हैं
मेरी कमियों से मगर अनजान हैं
मुझपर गर्व उन्हें हर क्षण है
उनका पुत्र दुनिया में विलक्षण है
नहीं देखते, मेरे मन पे जमी काई को
नहीं देखते, मुझमें किसी बुराई को
पिताजी निश्चित अंधे हैं

पिताजी बुरे हैं
वो छुड़ा लेते हैं मेरा हर सामान
मेरी पीड़ा सारी, मेरे दुःख तमाम
और छुपा ले जाते हैं मुझसे
अपने अकेलेपन की हर शाम
खुद का कोई सपना नहीं सजाते हैं
मेरे हर सपने को अपना बताते हैं
पिताजी वाकई बहुत बुरे हैं

पिताजी लापरवाह हैं
अनुराग में डूबे इतने हैं मगन
खो दिया यूँ ही सारा जीवन
तमाम उम्र खिलौने सहेजने में
खुद बिखरे हमें समेटने में
तिनका तिनका हमें जोड़ती गईं
उनकी इच्छायें दम तोड़ती गईं
पिताजी बेहद लापरवाह हैं

पिताजी बेपरवाह हैं
उनकी अपनी कोई सूरत नहीं है
उन्हें दर्पण की ज़रूरत नहीं है
अपने काव्य में ज्यूँ खुदको ढूँढ़ता कवि
खुुुश होते हैं देखकर, मुझमें अपनी छवि
कवि-कविता के बीच कोई नहीं होता
अपने काव्य के वो स्वयं ही हैं श्रोता
पिताजी दुनिया से बेपरवाह हैं

पिताजी नासमझ हैं
मेरा नजरिया ही उनकी दृष्टि है
मेरी दुनिया ही उनकी सृष्टि है
ईश्वर पिता है या पिता ही ईश्वर स्वरूप
वो सृजन करते रहे, मेरी इच्छा के अनुरूप
उनकी अपनी कोई मंज़िल, कोई रास्ता नहीं है
उन्हें दुनिया में किसी से वास्ता नहीं है
पिताजी समझते नहीं हैं

पिताजी नरम गरम हैं
वक़्त की धूप में खुद तपते हैं
मुझको तो शीतल मगर लगते हैं
मेरे सफर में वो हौसलों का पाँव हैं
मेरी थकन को बरगद की छाँव हैं
जिसकी ज्योति से चन्द्रमा देदीप्यमान है
मेरी चमक के पीछे, वो सूर्य के समान हैं
पिताजी मेरी ऊर्जा हैं

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 9, 2019

धर्म

वेद पुराण गीता कुरान
शायद फिर से पढ़ना होगा
धर्म वही नई दृष्टि से अब
कदाचित फिर से गढ़ना होगा

निंदा करना सरल है किंतु
निंदा का यह सूत्र तो मानें
वंदित को जानें ना जानें
निंदित को अवश्य पहचानें

प्रकाश को समझना है तो
गहरे तम को पढ़ना होगा

मैं बड़ा हूँ, वह छोटा है
मन ने कितने वहम हैं पाले
मेरा कथन ही अंतिम सत्य है
बुद्धि पर ये अहं के ताले

दुनिया से क्या जूझ रहे हो
पहले खुद से लड़ना होगा

अपनी समझ का नित विस्तार
ना करे वो छात्र नहीं है
ग्रहण करो या करो निस्तार
ज्ञान बड़ा है, पात्र नहीं है

जड़ता के जो पोषक, उनको
ठहरे जल सा सड़ना होगा

मन शैतान मन फरिश्ता
मानव तेरा मर्म यही है
जीव का जीवों से रिश्ता
जो बतला दे धर्म वही है

करुणा के धागे से सबको
एक सूत्र में जुड़ना होगा

वेदों में विज्ञान को देखा
कुरान में शिव का स्वरूप
बहुत गहन है अगर मानो तो
कण कण है उसका ही रूप

अर्ध सत्य स्वीकार किया तो
भ्रम में फिर फिर पड़ना होगा

मुक्त होने को तत्पर मन हो
जब अपनी ही ग्रंथियों से
सनातन सत्य की राह चलना
मोह ना रखना पंथियों से

अज्ञात को पाना चाहो तो
ज्ञात से आगे बढ़ना होगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, May 26, 2019

एक गमला बचपन

मैं देखा करता था उसे
पीठ पर मन भर बस्ता लाद कर
स्कूल से लौटते हुए
फिर मन में बस्ता भर ख्वाहिशें देकर
नंबरों के पीछे दौड़ाते हुए तुम
उसे चढ़ा आते थे
कोचिंग सेंटर की सीढ़ियाँ

शिक्षा के कारखाने में
जमा की थीं तुमने
उसकी शरारतें, मासूमियत, जीवन की खुशबू
शाम ढले जब घर लौटता था
तब उसकी समझ पर लगा होता था
तुम्हारी पसंद का रंगीन चश्मा

एक दिन
वो लाया था खोदकर कहीं से गीली मिट्टी
बालकनी की मुंडेर पर
करीने से सजे हुए गमलों में भरने
उसने कहा था
इसमें पापा की पसंद के फूल खिलेंगे
उसकी समझ की कच्ची मिट्टी में
तुमने बो दिए थे चुपके से
अपनी नाकाम हसरतों के बीज

लेकिन अक्सर
ज़रा सी आँधी में उखड़ जाती हैं
कमज़ोर जड़ें
ज़रा से धक्के में गिरकर बिखर जाते हैं
बालकनी की मुंडेर पर सजे हुए गमले
तुम्हारी ख्वाहिशों की तीसरी मंजिल पर
टंगा हुआ बचपन भी
झुलस गया उस दिन, यथार्थ की आग में
तुमने सिखाया था उसे
सिर्फ और सिर्फ ऊपर बढ़ना

शायद तुमने सुना हो
तीसरी मंज़िल से
मौत की गोद में छलांग लगाते हुए
वो गमला, कह रहा था
"पापा, इस बार तुम भूल गए लेकिन
फिर कभी जब वक़्त गिराए मुझे ऊँचाई से
तुम खड़े रहना नीचे
मुझे थाम लेना
मैं टूट कर बिखरने से बच जाऊँगा
तुम्हारी पसंद के फूल खिलाऊँगा
शायद अगली बार"

© - प्रशांत सेठ


Sunday, March 10, 2019

युद्ध - कब किसके विरुद्ध?

इस देश में युद्ध के पश्चात ही बुद्ध पैदा हुए हैं। हमने अधर्म के कीचड़ में सदैव प्रेम के कमल खिलाये हैं। परंतु शांति और सौहाद्र के संदेश के बीच हिंदुस्तान की मूल संस्कृति भी विश्व को स्मृत रहे।

अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: |
______________________________________

एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

जिन हाथों ने थामी मुरली
जिन अधरों पर सजा संगीत
जिन आँखों में बसा प्रेम था
जिस हृदय में गुंजित गीत

एक सुर में रोम रोम फिर
क्यों बोला था क्रुद्ध अब हो?
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

मर्यादा की जहाँ द्रौपदी
पंच तत्व का था वो गाँव
पंचेंद्रियाँ लीन कर्म में
हठ व दंभ का अड़ा था पाँव

कह उठा पुरुषार्थ भी तब
बहुत हुआ के शुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

निर्जन वन की पंचवटी में
छल लांघे जब लक्ष्मण रेखा
मन की पवित्रता को हरने
कुत्सित भावों में हो एका

ज्ञान संयम तप त्याग तब
कहा करते हैं बुध्द अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

समक्ष अधर्म के मौन धरकर
वनवासों में फिरता पांडव
निकलता जब आनंद मठ से
सन्यासी भी करता तांडव

अतिक्रमण हो संस्कृति पे
धर्म यही ये सिद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

अधिकार कैसा अशक्त को
कायर को ना सुहाए प्रीत
जहाँ शौर्य की गाथा ना हो
वहाँ प्रेम के कैसे गीत

नई पौध को उर्वर धरती
देकर तुम प्रबुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

© - प्रशांत सेठ


Friday, March 8, 2019

एक अपूर्ण कविता

स्त्री क्या है
और क्या नहीं
शायद वो खुद भी नहीं जान पाई
इसलिए होती रही परिभाषित
कवि से, उपासकों से
और शोषकों से

ईश्वर भी स्वयं की तलाश में
रच बैठा संसार
और होता रहा परिभाषित
ज्ञानियों से, उपासकों से
और शोषकों से

"मैं"
साध्य को साधन समझ
उलझा हूँ आज भी
अपने अनुरूप
एक नई परिभाषा गढ़ने में

© - प्रशांत सेठ


Saturday, March 2, 2019

एक बूँद की अभिलाषा

कविता क्या है?
शायद उद्गम से अंत तक
बहते हुए जीवन में
टकराते प्रश्नों के उत्तर की खोज

एक दिन मैंने पूछ लिया
बहती हुई नदी से...
दो पाटों के बीच प्रवाह का
इन पाटों के होने का
और होकर भी ना मिलने का रहस्य?

उसने कहा
किसी एक पाट को हटाकर देख लो
प्रवाह रुक जाता है
दिशा बदल जाती है
तुम बिखर जाते हो

मैंने जाना
नीति में पक्ष-विपक्ष का
जीवन में सुख-दुःख का
ज्ञान में सत्य-असत्य का
कर्म में धर्म-अधर्म का महत्व

दृश्य क्या है?
शायद देख लेना
महासागर में समाहित बूँद को
किसी ताप के प्रभाव से उड़ते हुए
और कभी कभी
मेघ बनकर पुनः बरसते हुए
मैंने जाना 
सृष्टि के अनवरत क्रम को

दर्शन क्या है?
शायद बंद आँख से झाँक लेना
नदी की गहराई में
और देख लेना
दोनों पाटों को मिलते हुए
जो कभी अलग थे ही नहीं
मैंने जाना
प्रकृति संपूर्ण है सदा से

कर्म क्या है?
शायद जान लेने के पश्चात भी
किसी बूँद का प्रवाह में रहना
प्यासों की प्यास बुझाने
मैंने जाना
इस धरा पर संतों के, ज्ञानियों के
और गुरु के होने का रहस्य

कवि क्या है?
शायद वही जो करता है युगों से
अपने छोटे से बर्तन में
बहती हुई नदी को भरने का प्रयास

© - प्रशांत सेठ
 

Friday, March 1, 2019

ठेठ वाणी - 1

यूँ तो मैं व्यक्ति आधारित राजनीति का पक्षधर नहीं हूँ, क्योंकि स्थायी समाधान के लिए विचार का स्थापित होना जरूरी है। परंतु ये भी सत्य है कि दृढ़ विचारों का वाहक दृढ़ व्यक्तित्व ही होता है। अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति की एक उम्र होती है, परंतु विचार अमरत्व का वरदान लिए होते हैं, जो सृष्टि के अंत तक साथ चलते हैं। व्यक्तियों के पीछे चलने वाली उन्मादी भीड़ से आप विचारों का वाहक बनने की आशा नहीं कर सकते। इसलिए जो लोग व्यक्ति से प्रेम करते हैं, उनकी अपेक्षा मुझे वे लोग अधिक प्रिय हैं जो उस व्यक्तित्व के विचारों से प्रेम करते हैं और अपनाते हैं।

इस देश ने दस साल तक महा मौन रखा था। किसी की मृत्यु पर दो मिनट का मौन रखा जाता है, परंतु तब तो लोकतंत्र की मृत्यु हुई थी। ये निश्चित है कि इस महा मौन के बाद वाक तूफान तो आना ही था। ये प्रकृति का नियम है। ये भी उतना ही निश्चित है कि तूफान के बाद शांति होगी। व्यक्ति केवल निमित्त है।

लोग कह रहे हैं कि शहीदों की शहादत को वोट अर्जन का साधन बना लिया गया है। निश्चित ये दुःखद है; परंतु वोट तो जनता देती है; तो क्या विपक्षी ने भी चुपके से मान लिया कि युद्ध से वोट मिलेंगे? हाँ क्योंकि वो जानते हैं, वोट युद्ध को नहीं, दृढ़ता को मिलेंगे। इससे पहले भी जनता ने 1971 के बाद दृढ़ता को ही चुना गया था। आतंकवाद ने कुकर्म पहले भी किए हैं, परंतु उसकी नाक में नकेल बहुत वर्षों पश्चात डाली गई है।

दूसरा पहलू ये भी है कि कोई जवानों की लाश पर राजनीति कर रहा है तो कोई मासूम नागरिकों की लाश पर करता रहा। चाहे वो कश्मीर में हिंदुओं की हत्या और पलायन हो, या गोधरा हो, या मुम्बई अटैक, इत्यादि हो।

बुद्ध के देश में युद्ध किसी को प्रिय नहीं होता। परंतु ये बात नकारी नहीं जा सकती के आतंकवाद के जरिये विश्व पर आधिपत्य की कामना लिए एक वर्ग विशेष युद्ध को ही धर्म समझ रहा है। तब हमारे भीतर के बुद्ध को युगों तक जीवित रखने के लिए जंग का नाम ही महाभारत है। जिसका सिद्धांत मात्र इतना है कि आने वाली पीढ़ियों को शांति उपलब्ध कराने के लिए, शांतिप्रिय लोगों का जीवित रहना आवश्यक है। अतः बाहर चल रहे युद्ध का भीतर की शांति से गहरा संबंध है, प्रबुद्ध लोगों के जीवन में। मानवता, अहिंसा, दया, निष्ठा को मजबूत काँधों पर ही ढोया जा सकता है। पिलपिली जिव्हा पर ये गुण बहुत दूर नहीं जा सकते। मगर तुम यही करते रहे; कदाचित इसीलिए गाँधी के इस अहिंसात्मक और सत्यवादी देेश ने जितनी हिंसा, बेईमानी और मक्कारी का अनुुुभव किया हैै, उतना विश्व में शायद ही किसी और राष्ट्र ने किया हो। ध्यान रहे, प्रकृति भी कोमल बीजों को कठोर आवरण प्रदान करती है।

- प्रशांत सेठ


Sunday, February 24, 2019

गुलेल से गोली तक

मैंने देखा था उसे एक दिन
मेरे घर की मेज़ पर...
उस दिन
ज़रा सी हवा चली थी
वो फड़फड़ाया था
फिर उड़कर बालकनी की मुंडेर से
जा बैठा था पड़ोसी की छत पर
मैं मुस्कुराकर देख रहा था

फिर एक दिन वो दिखा था
किसी ने लिख दिया था उस पर
"पत्थर"
जिस पर मुझे लिखना चाहिए था
"फूल"
मैंने तब भी
मुस्कुराकर ही देखा था

मुझे मालूम नहीं था
इधर उस पर
कोई लिखेगा "दहशत"
उधर किसी गोली पर
नियति लिख देगी
उसका नाम
मैं बेबस देख रहा हूँ
घर में पनपता "आतंकवाद"

वो मेरे घर का मासूम
कोरा कागज़
नफरत की हवाओं में उड़ा क्यों?
काश
मैंने रख दिया होता
अपने बच्चे पर उसी दिन
प्रेम, फिर अनुशासन
फिर ज़िम्मेदारियों का "पेपर वेट"
जब ज़रा सी हवा में वो
पहली बार फड़फड़ाया था

© - प्रशांत सेठ


Thursday, February 21, 2019

चौसर

ज़िन्दगी की रेस में
दौड़ते भागते तुम
कहाँ देख पाते हो पलटकर
उन नन्हे नन्हे पैरों को
जो चले आते हैं तुम्हारे
पदचिह्नों पर

और फिनिशिंग लाइन के पार
मजबूरी में
सुस्ताने के लिए ठहरे तुम
जब देखते हो मुड़कर
वो नन्हे से पैर
समाने लगे हैं
तुम्हारे जूतों में

इन मासूम पैरों में है
श्रद्धा और विश्वास
जो ले आई है इन्हें
तुम्हारे पीछे
कल ये भी दौड़ेंगे तुम्हारी तरह
अंधी रेस में

यदि बचाना चाहते हो
इन नन्हे अभिमन्युओं को
इस चक्रव्यूह से
तो करो स्वीकार इनके समक्ष
कि असत्य के दरबार में
तुम्हारे अहंकार का अर्जुन
मद का भीम
लोभ का नकुल
स्वार्थ का सहदेव
और मौन के धर्मराज मिलकर
गँवा बैठे हैं
वक्त की चौसर पर
जीवन रूपी द्रौपदी

इन्हें बता दो
युद्ध में
अश्वों की रास थामे हाथ से
अधिक सुंदर थीं
वो मुरली बजाती उँगलियाँ
कुरुक्षेत्र में बहते ज्ञान से
बेहतर था
बृज में बरसता प्रेम

© - प्रशांत सेठ