Sunday, March 10, 2019

युद्ध - कब किसके विरुद्ध?

इस देश में युद्ध के पश्चात ही बुद्ध पैदा हुए हैं। हमने अधर्म के कीचड़ में सदैव प्रेम के कमल खिलाये हैं। परंतु शांति और सौहाद्र के संदेश के बीच हिंदुस्तान की मूल संस्कृति भी विश्व को स्मृत रहे।

अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: |
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एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

जिन हाथों ने थामी मुरली
जिन अधरों पर सजा संगीत
जिन आँखों में बसा प्रेम था
जिस हृदय में गुंजित गीत

एक सुर में रोम रोम फिर
क्यों बोला था क्रुद्ध अब हो?
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

मर्यादा की जहाँ द्रौपदी
पंच तत्व का था वो गाँव
पंचेंद्रियाँ लीन कर्म में
हठ व दंभ का अड़ा था पाँव

कह उठा पुरुषार्थ भी तब
बहुत हुआ के शुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

निर्जन वन की पंचवटी में
छल लांघे जब लक्ष्मण रेखा
मन की पवित्रता को हरने
कुत्सित भावों में हो एका

ज्ञान संयम तप त्याग तब
कहा करते हैं बुध्द अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

समक्ष अधर्म के मौन धरकर
वनवासों में फिरता पांडव
निकलता जब आनंद मठ से
सन्यासी भी करता तांडव

अतिक्रमण हो संस्कृति पे
धर्म यही ये सिद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

अधिकार कैसा अशक्त को
कायर को ना सुहाए प्रीत
जहाँ शौर्य की गाथा ना हो
वहाँ प्रेम के कैसे गीत

नई पौध को उर्वर धरती
देकर तुम प्रबुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

© - प्रशांत सेठ


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