मैं देखा करता था उसे
पीठ पर मन भर बस्ता लाद कर
स्कूल से लौटते हुए
फिर मन में बस्ता भर ख्वाहिशें देकर
नंबरों के पीछे दौड़ाते हुए तुम
उसे चढ़ा आते थे
कोचिंग सेंटर की सीढ़ियाँ
शिक्षा के कारखाने में
जमा की थीं तुमने
उसकी शरारतें, मासूमियत, जीवन की खुशबू
शाम ढले जब घर लौटता था
तब उसकी समझ पर लगा होता था
तुम्हारी पसंद का रंगीन चश्मा
एक दिन
वो लाया था खोदकर कहीं से गीली मिट्टी
बालकनी की मुंडेर पर
करीने से सजे हुए गमलों में भरने
उसने कहा था
इसमें पापा की पसंद के फूल खिलेंगे
उसकी समझ की कच्ची मिट्टी में
तुमने बो दिए थे चुपके से
अपनी नाकाम हसरतों के बीज
लेकिन अक्सर
ज़रा सी आँधी में उखड़ जाती हैं
कमज़ोर जड़ें
ज़रा से धक्के में गिरकर बिखर जाते हैं
बालकनी की मुंडेर पर सजे हुए गमले
तुम्हारी ख्वाहिशों की तीसरी मंजिल पर
टंगा हुआ बचपन भी
झुलस गया उस दिन, यथार्थ की आग में
तुमने सिखाया था उसे
सिर्फ और सिर्फ ऊपर बढ़ना
शायद तुमने सुना हो
तीसरी मंज़िल से
मौत की गोद में छलांग लगाते हुए
वो गमला, कह रहा था
"पापा, इस बार तुम भूल गए लेकिन
फिर कभी जब वक़्त गिराए मुझे ऊँचाई से
तुम खड़े रहना नीचे
मुझे थाम लेना
मैं टूट कर बिखरने से बच जाऊँगा
तुम्हारी पसंद के फूल खिलाऊँगा
शायद अगली बार"
© - प्रशांत सेठ

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