Sunday, May 26, 2019

एक गमला बचपन

मैं देखा करता था उसे
पीठ पर मन भर बस्ता लाद कर
स्कूल से लौटते हुए
फिर मन में बस्ता भर ख्वाहिशें देकर
नंबरों के पीछे दौड़ाते हुए तुम
उसे चढ़ा आते थे
कोचिंग सेंटर की सीढ़ियाँ

शिक्षा के कारखाने में
जमा की थीं तुमने
उसकी शरारतें, मासूमियत, जीवन की खुशबू
शाम ढले जब घर लौटता था
तब उसकी समझ पर लगा होता था
तुम्हारी पसंद का रंगीन चश्मा

एक दिन
वो लाया था खोदकर कहीं से गीली मिट्टी
बालकनी की मुंडेर पर
करीने से सजे हुए गमलों में भरने
उसने कहा था
इसमें पापा की पसंद के फूल खिलेंगे
उसकी समझ की कच्ची मिट्टी में
तुमने बो दिए थे चुपके से
अपनी नाकाम हसरतों के बीज

लेकिन अक्सर
ज़रा सी आँधी में उखड़ जाती हैं
कमज़ोर जड़ें
ज़रा से धक्के में गिरकर बिखर जाते हैं
बालकनी की मुंडेर पर सजे हुए गमले
तुम्हारी ख्वाहिशों की तीसरी मंजिल पर
टंगा हुआ बचपन भी
झुलस गया उस दिन, यथार्थ की आग में
तुमने सिखाया था उसे
सिर्फ और सिर्फ ऊपर बढ़ना

शायद तुमने सुना हो
तीसरी मंज़िल से
मौत की गोद में छलांग लगाते हुए
वो गमला, कह रहा था
"पापा, इस बार तुम भूल गए लेकिन
फिर कभी जब वक़्त गिराए मुझे ऊँचाई से
तुम खड़े रहना नीचे
मुझे थाम लेना
मैं टूट कर बिखरने से बच जाऊँगा
तुम्हारी पसंद के फूल खिलाऊँगा
शायद अगली बार"

© - प्रशांत सेठ