Saturday, July 27, 2019

भय बिनु होइ न प्रीति

हे डरे हुए लोगों के 49 प्रतिनिधियो
तुम्हारा डर लाज़िमी है
क्योंकि
तुम्हारा धर्म खतरे में है
तुम्ही से

धर्म मरता नहीं है
धार्मिकों के मरने से
ईसाईयत नहीं मरी यीशु के साथ
बुद्धत्व नहीं गया बुध्द के साथ
सनातन धर्म मिटा नहीं
राम-कृष्ण के साथ

धर्म मरता है
जब तुम नहीं डरते
मंदिर के प्रसाद में
ज़हर की साज़िश रचते कुछ लोगों से
स्त्रियों को बाँझपन बाँटते श्रीलंकाई डॉक्टर से
मदरसे में पकड़े जाते हथियारों से
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करते
कौम के नेताओं से
कश्मीर के पत्थरबाजों से, हैवानों से
ट्विन टॉवर को मिटाते लादेनों से
मुम्बई को दहलाती साज़िशों से
ध्रुव त्यागियों के हत्यारों से
बुरहान वानियों से, दाऊद इब्राहिमों से
...........
...........
जब तुम नहीं डरते
मध्य पूर्व से आयातित क्रूरता से
धार्मिक उच्छृंखलता से
धर्म के तालिबानी संस्करण से

धर्म मरता है
जब तुम भूल जाते हो
कलाम साहब को, अशफाकुल्लाह को
.........
.........
अब्दुल हमीद को भूलकर
जब तुम्हें दिखता है नायक
तबरेज़ आलमों में

मुझे डर लगता है
जब कोई मदान्ध हत्यारा लेता है
"राम" का नाम
जब कोई कुंठित भगवाधारी देता है
धर्म की परिभाषा
मुझे डर लगता है तब
धार्मिकों की खामोशी से
क्योंकि तब तब
मैं देखता हूँ अपने धर्म को मरते हुए

तुम डरो ज़रूर डरो
तुम्हारा डर ही
विश्व शांति की नई उदघोषणा है
क्योंकि
तुम तब नहीं डरते
जब तुम्हारा धर्म मरता है
अजमल कसाव के हाथों
या फिर हाफ़िज़ सईद की तक़रीरों से

© - प्रशांत सेठ


Sunday, July 7, 2019

केमिस्ट्री

मैंने पढ़ा है
कुछ पदार्थ करते हैं मिलकर
रासायनिक क्रिया
जब अम्ल और क्षार मिलते हैं
तो रह जाता है शेष
नमक और पानी

उन्होंने भी पढ़ा होगा
तभी तो मिलने नहीं देते
सनातन सत्य से
मुसलसल ईमान को
कहीं जाग ना जाए
तुम्हारे खून में नमक
तुम्हारी आँखों में पानी
और धुली हुई आँखों से तुम
पढ़ ना लो फिर से
धर्म को

मैंने सुना है
कुछ पदार्थ होते हैं ज्वलनशील
ज़रा सी हवा में
पकड़ लेते हैं आग

सियासत की हवा में
पाखण्ड और अज्ञान भी
पकड़ लेते हैं
कट्टरता की आग
ये डाल देती है समझ पर
रंगीन धुएं का आवरण
ये करती है सत्य के झूठे अनुवाद
और सोख लेती है
धर्म ग्रंथों से उनके वास्तविक अर्थ

मैंने पढ़ा है
कुछ शाही पदार्थ क्रिया नहीं करते
किसी भी तत्त्व के साथ
जैसे कि धर्म और ज्ञान
इनके सामने हार जाती है
सियासत की हर साज़िश

मगर
मैं जानता हूँ
कुछ पदार्थ होते हैं
प्राणों से भी अधिक बहुमूल्य
इनमें से एक है
अपनी संस्कृति भी

© - प्रशांत सेठ


Monday, July 1, 2019

एक प्यारा सा इतवार

मित्रों के साथ सपरिवार वृक्षारोपण ....

एक प्यारा सा इतवार

कुछ गड्ढे खोदे, कुछ विकार
कुछ पौधे रोपे, कुछ संस्कार
भावों के जल से सींच आज को
रच लिया कल का संसार

कुछ धूप सही, कुछ भूख सही
श्रम की भी थोड़ी बूँद बही
सूरज ने तब कहा हँसकर
वृक्ष नहीं तो तुम ही नहीं

खिलते पल्लव पुष्पों ने जाना
अपने जीवन का आधार

धूप में समझा महत्व छाँव का
शहर ने समझा अर्थ गाँव का
स्वस्थ जीवन की राह में सबने
समझा मतलब श्रम के पाँव का

बचपन ने सीखा यहाँ आकर
प्रकृति को देना आभार

इतना दोहन हम करते हैं
लौटाने से मगर डरते हैं
धरती के इस कर्ज की पहली
चलो आज हम किस्त भरते हैं

मेघों ने भी किया बरसकर
समग्र परिश्रम को स्वीकार

मन की अपनी भूख प्यास का
लक्ष्य ना हो सिर्फ निज विकास का
आज भविष्य को अर्ध्य देते हैं
वर्तमान के लघु प्रयास का

इसी सोच के साथ बीता
एक प्यारा सा इतवार

© - प्रशांत सेठ