Wednesday, April 29, 2015

उत्तरदायी कौन?

भूकंप को लेकर तमाम विचार पढ़ने मिले। उनमे से कुछ ईश्वर के अस्तित्व अथवा शक्ति पर संदेह करने वाले भी थे। कोई कह रहा था की इस तबाही को रोक पाना ईश्वर के बस में भी नहीं है।

शिकायतें और मांगें, इसके अलावा कुछ और लेकर परमशक्ति के समक्ष पहुँचने वाले विरले ही होंगे। ये कटु सत्य है की शिकायतें लेकर जीने वाले लोग, स्वयं के दोषों के प्रति अंधे होते हैं। ऐसे लोगों को मेरी सलाह है के ईश्वर के अस्तित्व को बिलकुल नकार दें। जब वो है ही नहीं, या बेबस और लाचार है तो फिर शिकायत क्यों और किससे। शिकायतों में जीने से बेहतर यही होगा क्योंकि तब शिकायतें नहीं कर पाओगे। शिकायत के समाप्त होते ही नव निर्माण की राह खुलेगी और स्वयं के प्रयास शुरू होंगे।

किस्मत/प्रारब्ध में लिखे हुये किसी भी कष्ट से सम्बंधित प्रश्न को लेकर जब मैं अपने ईश्वर के समक्ष होता हूँ तो हर बार जवाब में यही प्रतिप्रश्न मिलता है...

चार सू ये तबाही का मंज़र, कौन लिख गया
शहर आबाद गाँव को खंडहर, कौन लिख गया
हक़ से ज़ियादा ले रहा कौन, खुद से पूछो
कतरे जैसी प्यास को समंदर, कौन लिख गया

© - प्रशांत सेठ

चार सू = चारों तरफ

Monday, April 27, 2015

पर्याहरण

माफ़ करना दोस्तो। ज़रा सी ज़मीन क्या हिली, हम भी हिल गये। इसलिये आज फिलोस्फी झाडेंगे। दो चार दिन में, हम खुद ही भूल जायेंगे और आप भी कहाँ तक याद रखेंगे।

हम कितने बेबस हैं दोस्त
अपने ही हाथों में
लातों के भूत हैं हम
कहाँ मानते बातों में
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कल हम बतिया रहे थे इंसान की बेहिसाब भूख पर। अब पेट हो तो भर भी दे ये धरती। मगर तृषणा? उसको तो भगवान भी तृप्त नहीं कर सकता।

देह से देहरी तक। बस इतनी ही तो सोच है हमारी। और जैसे हम हैं, वैसी ही हमारी दुनिया होगी। नहीं है तो बना देंगे, "भीतर से खोखली"। आज इसी बात पर कुछ अलग अंदाज़ में...

जाने खुद से कब बिछड़ गये
इस क़दर बसे, उजड़ गये

नदी नाले पहाड़ जंगल
प्रगति की भेंट चढ़ गये

विज्ञान के युग में हम तुम
देखो प्रकृति से लड़ गये

चाँद सूरज कहें पृथ्वी से
माँ तेरे मुंडे बिगड़ गये

घर से मकाँ, मकाँ से महल
जाने कैसे इतने बढ़ गये

गाँव से तो आ गये शहर
रास्ते में रिश्ते सड़ गये

बारिश धन की खूब हुई, पर
संवेदना के पत्ते झड़ गये

भूख नहीं यूँ दौड़ाती है
लोभ के कुत्ते पीछे पड़ गये

चाह कर भी लौटें कैसे
पाँव हवस में गहरे गड़ गये

© - प्रशांत सेठ

Saturday, April 25, 2015

आज के भूकंप पर...

शायद फिर कोई धरतीपुत्र तड़पा होगा
भूकंप नहीं था, माँ का दिल धड़का होगा ।

ये तो हुई किसानों के दर्द की बात लेकिन धरती की इस कंपकपाहट में, उन ज़ख्मों का भी हाथ है, जो इंसानों ने प्रगति के नाम पर वसुंधरा को दिये हैं। इंसानी हवस ने पहाड़ खोद दिये, जंगल उजाड़ दिये, जल और वायु को प्रदूषित कर दिया। इसका भुगतान समूचे समाज को करना होगा, विशेषकर आने वाली पीढ़ियों को।

मगर विडम्बना ये है की अपराध कोई करता है, सज़ा किसी को मिलती है। अमीर के अपराध की सजा अक्सर गरीब के हिस्से आती है। अमीर और गरीब में एक फर्क ज़रूर होता है। अमीर की भूख बेहिसाब रहती है और गरीब की भूख हिसाब से रहती है। भूख जब हद से बढ़ जाये तो हवस कहलाती है। और इसी हवस ने दुनिया का मीजान बिगाड़ रखा है। इस पर फिर कभी..

फिलहाल ये पंक्तियाँ समर्पित उन संवेदनशील लोगों को जो नरम मिट्टी से बने हैं, पत्थरों से नहीं...

मिटटी से जो बना हो, वो मकान टूटता है
इस खेल में सच में है जो इंसान, टूटता हैं ।
धरती तो थरथराये,अमीरों की भूख से,पर
मुफ़लिस के सर पे ही ये आसमान टूटता है ।।

© - प्रशांत सेठ

मुफ़लिस = गरीब


Thursday, April 16, 2015

मुट्ठी भर ज़िन्दगी

बड़े भाई सूरज राय "सूरज" जी के जन्मदिन पर कुष्ठ आश्रम में 'तेरा तुझको अर्पण' करने का सौभाग्य इस वर्ष मुझको भी मिला।

भूख, मुफलिसी अपने आप में बड़ा रोग है। उस पर से गलते हुये हाथ पाँव यानी तिल तिल मरना। दुआयें देने के लिये इनके हाथ भले ही सलामत नहीं थे मगर इनके आंसुओं में दर्द भी था और दुआ भी। आज हम लोग वही समेट लाये झोली भर के। जो दे पाये वो बहुत थोडा था और ज़रूरत कहीं ज़्यादा बड़ी थी।

टूटे हुये टपरे में टपकती हुई बूंदों के बीच, सूरज का इंतज़ार (और ज़रूरत) जितना इनको था, उतना शायद किसी और को नहीं होगा। बारिश की बूँदें तो थम जायेंगी मगर आँखों की बरसात कब थमेगी, ये नहीं मालूम। बेबसी और लाचारी के ये आंसू देखकर यूँ लगा जैसे...

भूखों को उम्मीद दो कौर मिल गई
चंद लम्हात की दौलत और मिल गई
कह दो मौत से के ठहरे ज़रा अभी
मुट्ठी भर ज़िन्दगी इन्हें और मिल गई

© - प्रशांत सेठ