शायद फिर कोई धरतीपुत्र तड़पा होगा
भूकंप नहीं था, माँ का दिल धड़का होगा ।
ये तो हुई किसानों के दर्द की बात लेकिन धरती की इस कंपकपाहट में, उन ज़ख्मों का भी हाथ है, जो इंसानों ने प्रगति के नाम पर वसुंधरा को दिये हैं। इंसानी हवस ने पहाड़ खोद दिये, जंगल उजाड़ दिये, जल और वायु को प्रदूषित कर दिया। इसका भुगतान समूचे समाज को करना होगा, विशेषकर आने वाली पीढ़ियों को।
मगर विडम्बना ये है की अपराध कोई करता है, सज़ा किसी को मिलती है। अमीर के अपराध की सजा अक्सर गरीब के हिस्से आती है। अमीर और गरीब में एक फर्क ज़रूर होता है। अमीर की भूख बेहिसाब रहती है और गरीब की भूख हिसाब से रहती है। भूख जब हद से बढ़ जाये तो हवस कहलाती है। और इसी हवस ने दुनिया का मीजान बिगाड़ रखा है। इस पर फिर कभी..
फिलहाल ये पंक्तियाँ समर्पित उन संवेदनशील लोगों को जो नरम मिट्टी से बने हैं, पत्थरों से नहीं...
मिटटी से जो बना हो, वो मकान टूटता है
इस खेल में सच में है जो इंसान, टूटता हैं ।
धरती तो थरथराये,अमीरों की भूख से,पर
मुफ़लिस के सर पे ही ये आसमान टूटता है ।।
© - प्रशांत सेठ
मुफ़लिस = गरीब
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