भूकंप को लेकर तमाम विचार पढ़ने मिले। उनमे से कुछ ईश्वर के अस्तित्व अथवा शक्ति पर संदेह करने वाले भी थे। कोई कह रहा था की इस तबाही को रोक पाना ईश्वर के बस में भी नहीं है।
शिकायतें और मांगें, इसके अलावा कुछ और लेकर परमशक्ति के समक्ष पहुँचने वाले विरले ही होंगे। ये कटु सत्य है की शिकायतें लेकर जीने वाले लोग, स्वयं के दोषों के प्रति अंधे होते हैं। ऐसे लोगों को मेरी सलाह है के ईश्वर के अस्तित्व को बिलकुल नकार दें। जब वो है ही नहीं, या बेबस और लाचार है तो फिर शिकायत क्यों और किससे। शिकायतों में जीने से बेहतर यही होगा क्योंकि तब शिकायतें नहीं कर पाओगे। शिकायत के समाप्त होते ही नव निर्माण की राह खुलेगी और स्वयं के प्रयास शुरू होंगे।
किस्मत/प्रारब्ध में लिखे हुये किसी भी कष्ट से सम्बंधित प्रश्न को लेकर जब मैं अपने ईश्वर के समक्ष होता हूँ तो हर बार जवाब में यही प्रतिप्रश्न मिलता है...
चार सू ये तबाही का मंज़र, कौन लिख गया
शहर आबाद गाँव को खंडहर, कौन लिख गया
हक़ से ज़ियादा ले रहा कौन, खुद से पूछो
कतरे जैसी प्यास को समंदर, कौन लिख गया
© - प्रशांत सेठ
चार सू = चारों तरफ
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