माफ़ करना दोस्तो। ज़रा सी ज़मीन क्या हिली, हम भी हिल गये। इसलिये आज फिलोस्फी झाडेंगे। दो चार दिन में, हम खुद ही भूल जायेंगे और आप भी कहाँ तक याद रखेंगे।
हम कितने बेबस हैं दोस्त
अपने ही हाथों में
लातों के भूत हैं हम
कहाँ मानते बातों में
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कल हम बतिया रहे थे इंसान की बेहिसाब भूख पर। अब पेट हो तो भर भी दे ये धरती। मगर तृषणा? उसको तो भगवान भी तृप्त नहीं कर सकता।
देह से देहरी तक। बस इतनी ही तो सोच है हमारी। और जैसे हम हैं, वैसी ही हमारी दुनिया होगी। नहीं है तो बना देंगे, "भीतर से खोखली"। आज इसी बात पर कुछ अलग अंदाज़ में...
जाने खुद से कब बिछड़ गये
इस क़दर बसे, उजड़ गये
नदी नाले पहाड़ जंगल
प्रगति की भेंट चढ़ गये
विज्ञान के युग में हम तुम
देखो प्रकृति से लड़ गये
चाँद सूरज कहें पृथ्वी से
माँ तेरे मुंडे बिगड़ गये
घर से मकाँ, मकाँ से महल
जाने कैसे इतने बढ़ गये
गाँव से तो आ गये शहर
रास्ते में रिश्ते सड़ गये
बारिश धन की खूब हुई, पर
संवेदना के पत्ते झड़ गये
भूख नहीं यूँ दौड़ाती है
लोभ के कुत्ते पीछे पड़ गये
चाह कर भी लौटें कैसे
पाँव हवस में गहरे गड़ गये
© - प्रशांत सेठ
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