Saturday, March 28, 2015

आप तो ऐसे ना थे?

भैया हम तो ऐसे ही थे। मगर आपकी आँखों पर भावुकता का चश्मा चढ़ा था तो इसमें हमारा क्या दोष? आप तब भी नहीं समझे जब हमने कहा की हम आंदोलन से निकले हैं। मैं तो साफ़ बोलता हूँ जी। स्पष्ट कहा था के हम आंदोलन से निकल गये हैं जी। आप को तब ही समझ लेना था की हम राजनीति करेंगे। वही करने आये थे जी। वही कर रहे हैं...खों खों।

आप तब भी नहीं समझे जब हमने आप को टोपी पहना दी। हमें चाहिए स्व-राज। लो मिल गया। अपना राज है जी अब तो। मैं शुरू से कहता रहा हूँ, मैं बहुत छोटा आदमी हूँ जी। आप ही लोगों ने बड़ा कर दिया जी।  हाज़मा भी कमज़ोर है जी। सफलता हज़म करने का वक़्त भी नहीं दिया जी। बेंगलुरु जाऊंगा तो पचा के आऊंगा जी।

लोग कह रहे हैं मैंने उनको "कमीना" कहा। मैंने तो कहा की उनमे कोई "कमी" ना है जी। लोग कह रहे हैं हिंसा हुई है। अब थोड़ी बहुत तो चलती है जी। आप को अहिंसा ही करनी थी तो आंदोलन क्या बुरा था जी। राजनीति में क्यों आये। अब ये भूषण जी और यादव जी चिल्लाते हैं तो चिल्लाने दो जी। ये तो कल की बात हो गए। अन्ना परसों की बात हो गये। और आप की भावनायें? छोड़िये ना, वो तो बरसों पुरानी बात हो गई।

अब ये मत पूछना जी के ये लोग गंदे थे तो अंदर आये कैसे? हम ही लाये थे जी। कीचड साफ़ करनी थी इसलिये कीचड़ मचाना ज़रूरी था जी। लेकिन आप लोग इस प्रशांत सेठ की बातों में मत आना। ये प्रशांत नाम के होते ही ऐसे हैं। ये हमेशा यही कहता है की जो जिस पार्टी में है वो वहाँ का कीचड़ साफ़ करे तब असली सफाई होगी? अब उसको कौन समझाये। हमारा अपना खुद का कीचड़ है जी। दूसरों का साफ़ क्यों करें?

आप तो एक गीत सुनो जी...

"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए..."

रुकिए रुकिए पीर तो पिघल कर बह गई कब की। दूसरा सुनाता हूँ ...

इंसान का इंसान से हो भाईचारा.. खों खों

जाने दीजिये खांसी आ गई। इसलिये फिर कभी। मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है।

तब तक आप सेठ जी के साथ अतीत का सफ़र करिये और पार्टी का विज़न डॉक्यूमेंट पढ़िये। हां सेठ जी की शायिरी ज़रूर सुनते जाइयेगा। सेठ जी को इसके अलावा और आता भी क्या है। बल्कि ये काम भी ठीक से नहीं बनता...

वक़्त के दरिया में बहे ना जाने कितने
साथ हवा के उड़ गये फ़साने कितने

क़ज़ा ले जायेगी साँसों की दौलत ये
गढ़ ले जिंदगी अब चाहे बहाने कितने

आदमियत आदमी में मिलती है कहाँ
गुज़र गये तलाश में यूँ ज़माने कितने

अपने सोचे से यहाँ कुछ होता नहीं
किये मुकम्मल इंतजाम आसमां ने कितने

कदम बढ़ते नहीं मुस्तकबिल से मिलने
हैं याद-ए-माजी तिरे कैदखाने कितने

पंख क्या निकले, वो नशेमन ही छोड़ गये
ये ख्वाब हुये हैं आज फिर बेगाने कितने

सियासत की गंगा साफ़ हो तो हो कैसे
देख लो उतरे हैं आज नहाने कितने

© - प्रशांत सेठ

कज़ा = मौत, मुकम्मल = सम्पूर्ण, मुस्तकबिल = भविष्य, याद-ए-माज़ी = अतीत की यादें, नशेमन = घोंसला

Thursday, March 19, 2015

D.K.Ravi - bold but bowled

सत्ता की कप्तानी में खेलते हुये, भ्रष्टाचार की टीम से माफिया ने बॉल डाली और क्लीन बोल्ड..!!!

डी के रवि पवेलियन की और लौट गये बिना खाता खोले ही। नैतिकता की टीम पर ज़बरदस्त दबाव। इसके पहले मंजुनाथ, अमित जेठवा और कई बिना खाता खोले ही लौट चुके हैं। ज़ुबान भर खोल पाये थे बेचारे..

अगला बैट्समेन कोई आने को तैयार नहीं। पुराने धरनावीर और अनशनकारी पहले ही राजनीतिक स्वार्थ से चोटिल हो कर घर लौट चुके हैं। और इस तरह Duckworth Lewis नियम से ईमानदारी को पराजित घोषित किया जाता है। इस साल का वर्ल्ड कप फिर भ्रष्टाचार को....

माफ़ करना दोस्त #DKRavi; क्रिकेट के बुखार में डूबे हिन्दुस्तान को याद दिलाने का और कोई उपाय नहीं सूझा मुझे। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे। हम कमज़ोरों के पास तो अंतहीन चुप्पी है ही...

चल देते हैं चुपचाप यूँ अक्स ईमान के
ख़ामोशी से बह जाते हैं अश्क हिंदुस्तान के

Shshshshhh मुंह खोल के आउट होना है क्या?

© - प्रशांत सेठ

Friday, March 13, 2015

एक था जन आंदोलन

एक गन्दी सी बस्ती में रोता हुआ मिल गया। मैंने पूछा तू रोता क्यों है? बोला बिछड़ गया हूँ। मैंने पूछा किससे और कैसे? बोला लंबी कहानी है, कई बार दोहराई गई है। मैंने कहा कोई बात नहीं, एक बार और सही ...

गिलहरी के रेत में लोटने और समुद्र में डुबकी लगाने से प्रेरित होकर हमारे नायक ने सोचा की राजनीति की कीचड़ में बार बार लोट कर और माफ़ी की गंगा में स्नान कर के, मैं भी इस कीचड़ को साफ करूंगा।

तो इस तरह शुरू हुआ कीचड़ में लोटने और नहाने का सिलसिला। जनता जनार्दन ने हाथ भी फेर दिया। कीचड़ तो ख़त्म नहीं हुई, हाँ बार बार लोटने से खांसी ज़रूर हो गई। तथाकथित देशभक्ति और ईमानदारी का जामा पहने निजी महत्वकांक्षाओं का हुजूम भी पीछे चल पड़ा। भ्रमवश कुछ राष्ट्रनिर्माण और परिवर्तन के सपने भी साथ चले मगर ज़्यादा दूर तक नहीं चल सके।

हमारे नायक ने कभी पीछे मुड़के नहीं देखा। ज़रूरत भी नहीं थी। सामने मंज़िल हो तो रफ़्तार बढ़ ही जाती है। महत्वकांक्षायें प्रबल थीं इसलिए चाटुकार भी शुभचिंतक नज़र आने लगे। कुछ लोग जो एक छोटे से बच्चे "सिद्धांत" का हाथ पकड़ के चल रहे थे, वो पीछे रह गये।

सफलता मिलने लगी तो तथाकथित शुभचिंतकों की भीड़ में वो छोटा सा "सिद्धांत" भी बिछड़ गया। ठीक वैसे ही जैसे कुम्भ के मेले में माँ से उसका बच्चा बिछड़ जाता है। काफी खोजने के बाद जब वो नहीं मिला तो ज़िन्दगी की रफ़्तार में एक दिन उसे भुला दिया गया।

अब देखना ये है की ये बिछड़ा हुआ सिद्धांत किसको मिलता है। शायद हिंदी फ़िल्मों की तरह इसे भी कोई पाल पोस कर बड़ा कर रहा हो। जब ये बच्चा बड़ा और काबिल होकर आयेगा तब उस पर अपना दावा ठोकने, कोई नायक फिर प्रस्तुत होगा आपके सामने।

तब तक के लिये अलविदा...

द्रष्टा बन के देखिये अजब गज़ब संसार
मानव मन दौड़ रहा, दौड़ा रहा अहंकार
___________

मंदिर-ओ-मज़ार टूटे, दर-ओ-दीवार टूटे हैं
यूँ तो ख्वाब इस मुल्क के हज़ारों बार टूटे हैं

गर तुम गैर होते तो दिलासा दिल को यूँ देते
एक ग़ज़नी ने अरमानों के फिर अम्बार लूटे हैं

गम नहीं, खो गये हैं मंज़िल के निशाँ ही अब
गम ये है के रस्ते भी हो के बेज़ार रूठे हैं

इस मंच पे देखो हर शख्स का यही चेहरा है
तमाशा-ए-सियासत में सब किरदार झूठे हैं

नशेमन से बिछड़े हम परिंदों का दर्द सुन लो
यहाँ सारे गुलशन के फरमाबरदार झूठे हैं

गम ये है अब अपनी ज़मीं रही ना आसमाँ ही
उड़ेंगे ना सदियों तक के पंख इस बार टूटे हैं

© - प्रशांत सेठ

नशेमन = घोंसला, फरमाबरदार = ज़िम्मेदार लोग

Friday, March 6, 2015

रंग बिरंगी शुभकामनायें

रंग यानि खुशियाँ, ऊर्जा, उमंग। रंग यानि जीवन। जीवन यदि एक ही रंग में ढला हो, तो सोचो कितना नीरस होगा। जिसने सारे रंगों को नहीं जाना उसने जीवन को नहीं जाना। तभी तो सृष्टि एक नहीं, अनेक रंगों से भरी है उस चित्रकार ने।

विज्ञान कहता है की प्रत्येक वस्तु उस रंग विशेष की दिखाई पड़ती है जिस रंग के प्रकाश को वो समाहित नहीं कर पाती (Reflection of light)। यानी जो जिस रंग का नज़र आता है, उसमेँ वही रंग नहीं होता। सफ़ेद में कोई रंग नहीं होता और काले में सारे रंग समाहित होते हैं। शायद इसलिये वो चित्रकार भी काला है क्योंकि उसने हर रंग को खुद में समाहित रखा है।

एक रंग में दूजो मिले, रंग बने न्यारो
कारे में जो कोई मिले, वो भी होये कारो ।।

हो सकता है आपको कोई रंग विशेष पसंद हो। मगर इसका मतलब ये तो नहीं के आप बाकी रंगों को मिटाने में जुट जायेंगे। लेकिन दुनिया में तो यही हो रहा है। इस रंग बिरंगी दुनिया में सबने अपना अपना रंग पकड़ रखा है। और खो दिया है जीवन के आनंद को।

होली यही सन्देश लेकर आती है के हर रंग के अस्तित्व को स्वीकार करो। यकीन ना हो तो आज एक ही रंग से होली खेल कर देख लो। वो चित्रकार फिर तुमसे यही पूछेगा...

तुम्हारे रंग ना जाने क्यों उड़े उड़े थे
मैंने तो इस चित्र में सातों रंग भरे थे ।
हर रंग में रंग जाने का दिन है होली
एक तुम ही थे जो भगवा थे, हरे थे ।।

© - प्रशांत सेठ

आप सभी को रंग बिरंगी शुभकामनायें