भैया हम तो ऐसे ही थे। मगर आपकी आँखों पर भावुकता का चश्मा चढ़ा था तो इसमें हमारा क्या दोष? आप तब भी नहीं समझे जब हमने कहा की हम आंदोलन से निकले हैं। मैं तो साफ़ बोलता हूँ जी। स्पष्ट कहा था के हम आंदोलन से निकल गये हैं जी। आप को तब ही समझ लेना था की हम राजनीति करेंगे। वही करने आये थे जी। वही कर रहे हैं...खों खों।
आप तब भी नहीं समझे जब हमने आप को टोपी पहना दी। हमें चाहिए स्व-राज। लो मिल गया। अपना राज है जी अब तो। मैं शुरू से कहता रहा हूँ, मैं बहुत छोटा आदमी हूँ जी। आप ही लोगों ने बड़ा कर दिया जी। हाज़मा भी कमज़ोर है जी। सफलता हज़म करने का वक़्त भी नहीं दिया जी। बेंगलुरु जाऊंगा तो पचा के आऊंगा जी।
लोग कह रहे हैं मैंने उनको "कमीना" कहा। मैंने तो कहा की उनमे कोई "कमी" ना है जी। लोग कह रहे हैं हिंसा हुई है। अब थोड़ी बहुत तो चलती है जी। आप को अहिंसा ही करनी थी तो आंदोलन क्या बुरा था जी। राजनीति में क्यों आये। अब ये भूषण जी और यादव जी चिल्लाते हैं तो चिल्लाने दो जी। ये तो कल की बात हो गए। अन्ना परसों की बात हो गये। और आप की भावनायें? छोड़िये ना, वो तो बरसों पुरानी बात हो गई।
अब ये मत पूछना जी के ये लोग गंदे थे तो अंदर आये कैसे? हम ही लाये थे जी। कीचड साफ़ करनी थी इसलिये कीचड़ मचाना ज़रूरी था जी। लेकिन आप लोग इस प्रशांत सेठ की बातों में मत आना। ये प्रशांत नाम के होते ही ऐसे हैं। ये हमेशा यही कहता है की जो जिस पार्टी में है वो वहाँ का कीचड़ साफ़ करे तब असली सफाई होगी? अब उसको कौन समझाये। हमारा अपना खुद का कीचड़ है जी। दूसरों का साफ़ क्यों करें?
आप तो एक गीत सुनो जी...
"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए..."
रुकिए रुकिए पीर तो पिघल कर बह गई कब की। दूसरा सुनाता हूँ ...
इंसान का इंसान से हो भाईचारा.. खों खों
जाने दीजिये खांसी आ गई। इसलिये फिर कभी। मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है।
तब तक आप सेठ जी के साथ अतीत का सफ़र करिये और पार्टी का विज़न डॉक्यूमेंट पढ़िये। हां सेठ जी की शायिरी ज़रूर सुनते जाइयेगा। सेठ जी को इसके अलावा और आता भी क्या है। बल्कि ये काम भी ठीक से नहीं बनता...
वक़्त के दरिया में बहे ना जाने कितने
साथ हवा के उड़ गये फ़साने कितने
क़ज़ा ले जायेगी साँसों की दौलत ये
गढ़ ले जिंदगी अब चाहे बहाने कितने
आदमियत आदमी में मिलती है कहाँ
गुज़र गये तलाश में यूँ ज़माने कितने
अपने सोचे से यहाँ कुछ होता नहीं
किये मुकम्मल इंतजाम आसमां ने कितने
कदम बढ़ते नहीं मुस्तकबिल से मिलने
हैं याद-ए-माजी तिरे कैदखाने कितने
पंख क्या निकले, वो नशेमन ही छोड़ गये
ये ख्वाब हुये हैं आज फिर बेगाने कितने
सियासत की गंगा साफ़ हो तो हो कैसे
देख लो उतरे हैं आज नहाने कितने
© - प्रशांत सेठ
कज़ा = मौत, मुकम्मल = सम्पूर्ण, मुस्तकबिल = भविष्य, याद-ए-माज़ी = अतीत की यादें, नशेमन = घोंसला