सत्य बोध तुम कहते जिसको,
सब मन का ताना बाना है।
एक ही रंग का चश्मा लेकर
सत्य को किसने पहचाना है?
जीवन समर के कुरुक्षेत्र में,
सत्य के समक्ष जब आओगे ।
निज कुतर्क के संधानों से,
सिर्फ पराजय ही पाओगे ।
कालचक्र जो चला आ रहा,
क्या तर्कों से रुक पाना है?
प्रश्न सनातन जस का तस है,
मूक हुआ अब हर ज्ञाता है ।
पंथों के इस शास्त्रार्थ में,
उत्तर तो खो सा जाता है ।
उपादान हैं बुद्धि के सीमित,
फिर असीम को अपनाना है ।
मन है चक्षु के पीछे तो,
फिर मन के पीछे है कौन ?
करता सदा अचंभित मुझको,
दृष्टा का यह शाश्वत मौन ।
शोर है ये सब लहरों का ही,
अरु सागर तो अनजाना है ।
आह! पखेरू कटे रखे हैं,
अहं बोध के पिंजरे में ।
ज्यों असीम नभ जा बैठा हो,
सिमटा कर खुदको कमरे में ।
अंश स्वयं तू है अम्बर का ,
तोड़ के पिंजरा जाना है ।
सुप्त चेतना पड़ी हुई है
चित्त उलझा है तन मन में
अहो बिम्ब को भूल गया क्यों,
प्रतिबिम्बों की उलझन में ।
जाग शक्ति, अब जाग, तुझे,
इस शव में ही शिव जगाना है ।
© - प्रशांत सेठ