Wednesday, November 25, 2015

मधुर स्मृतियाँ

सुर बिना कब पूरे थे गीत
नेह बिना अधूरे मनमीत
साज़ ने जाना जब सरगम को
तब जन्मी दुनिया में प्रीत

जब सफ़र और हमसफ़र दोनों मन के अनुकूल हों तो वक़्त का पता ही नहीं चलता। 19 वर्ष चलते चलते कब इतनी दूर आ गये पता ही नहीं चला। आभार तुम्हारा दिव्या सेठ।

आज तुम्हारे मन के अनकहे एहसासों को शब्दों में पिरोकर तुमको ही देता हूँ, उपहार स्वरूप....

स्मृतियाँ

सिमटी सी थी सकुचाई सी
लजाई कुछ घबराई सी
याद करो वो पल साजन
मैंने मेहँदी रचाई थी
दुल्हन बन कर आई थी

हाथों में जयमाल लिये थी
आँखों में सवाल लिये थी
मुस्कुराकर तुमने भी तो
मूक सहमति जताई थी
मधुर मिलन बेला आयी थी

प्राण प्रण तन मन समर्पित
मन ही मन तुम भी गर्वित
सात फेरे सात वचन वो
कसम जो संग संग खाई थी
हर रस्म हमने निभाई थी

कल तक खेला बचपन था
आज कितना परिवर्तन था
घर की देहरी छूट रही थी
बालपन की विदाई थी
स्वागत में तरुणाई थी

सोचो कितना मुश्किल था
देह कहीं थी, कहीं दिल था
बाबुल के बाग़ की तितली
आज हो रही पराई थी
विछोह की घडी आई थी

ह्रदय में विश्वास अटल था
माँ के संस्कारों का बल था
साथ तुम्हारे मिलकर तब मैं
नया संसार रच पाई थी
प्रकृति हम पर मुस्काई थी

साथ तुम्हारे चलते चलते
दिन बीते सब हँसते खिलते
बाँट रही हूँ तुम संग आज
स्मृतियाँ जो बचाई थीं
प्रियतम मैं शरमाई सी

तृप्त अभी कहाँ मन हुआ है
परिपक्व अब मिलन हुआ है
कदम कदम है तुम संग चलना
देह संग उसकी परछाई सी
तुम सुर ,मैं शहनाई सी

© - प्रशांत सेठ

Monday, October 26, 2015

एक आहत व्यंग

हो सके तो कलम में फिर धार करो
उठो हे समाज के सृजक, प्रहार करो
रुदन ना करो अन्य के दोषों पर आज
तुम स्वयं शिल्पकार हो, स्वीकार करो

ना किसी नाम विशेष पर टिपण्णी है, ना ही ये किसी की निंदा है। क्योंकि दूर बैठकर किसी के मन के भाव को जान लेने का सामर्थ्य मुझमें नहीं। यह केवल एक प्रयास है कर्तव्यबोध का।

विरोध क्यों और किसका? जब हम स्वयं इस समाज के निर्माता हैं। सत्ता में कोई भी रहे वह तो जनता की छाया मात्र है। लोकतंत्र है इसलिये यथा प्रजा तथा राजा। दोषारोपण करना साहित्य का काम नहीं है। साहित्य का काम है सत्य का दर्शन करना और कराना और साथ ही भविष्य का निर्माण करना।

एक आहत व्यंग

आज टीवी न्यूज़ थी ब्रेकिंग अर्थात तोड़ने वाली
एक और साहित्यकार के पुरुस्कार छोड़ने वाली
सबकी तरह हमने भी मानसिक मंजन किया
सोने से पहले कुछ औपचारिक चिंतन किया

नींद में अचानक हमारे अंदर के लेखक ने पुकारा
हे ज्ञानपुंज, हे सिद्धांतवादी, हे वर्तमान युग के नाकारा
सारे देश में चारों तरफ हाहाकार हो रहा है
और एक स्वयंभू साहित्यकार सो रहा है?

उठो किसी का समर्थन करो या विरोध करो
बना नहीं सकते तो उत्पन्न अवरोध करो
परिचय दो संसार को अपनी विद्वता का
कर्म के वृक्ष पर अमरबेल की लता का

मैंने कहा देव, मैं ना किसी के समर्थन में हूँ ना ही विरोध में
मैं साहित्यकार भी नहीं हूँ, बस जिज्ञासु हूँ सत्य के शोध में
एक बात ये भी है, कुछ मिला ही नहीं तो छोड़ूँगा क्या?
मैं नंगा अगर नहा लूँगा तो फिर निचोड़ूँगा क्या?

वो बोले तुझे ले चलता हूँ एक विचित्र संसार में
गीत ग़ज़ल शायिरी और साहित्य के बाज़ार में
देख कितनी दुकानें हैं यहाँ, बड़े बड़े नाम हैं
जो साहित्य के रावण हैं मगर लिखते राम हैं

और इनसे मिलो ये इस बाज़ार के बड़े माफिया हैं
साहित्य ग़ज़ल है अगर तो ये रदीफ़ हैं, काफ़िया हैं
इनके पलटने से बड़े बड़ों के तख़्त पलट जाते हैं
ये कभी पुरुस्कार लेते हैं तो कभी लौटा आते हैं

हमने कहा हुज़ूर साहित्य सृजन है, विषय नहीं क्रोध का
इसे क्यों बनाते हैं हथियार राजनीतिक प्रतिशोध का
मिले हुए सम्मान का कुछ तो सम्मान कीजिये
कलम को सियासत का मत गुलाम कीजिये

वो बोले तुम अभी नए हो इसलिये आदर्शवादी हो
सूट बूट के ज़माने में, नैतिकता की खादी हो
अब वक़्त बदल गया है, रस्मो रिवाज़ बदल गए हैं
साहित्य के परिंदे के सियासी पर निकल गए हैं

हाथ जोड़ो, पैर पकड़ो, पुरुस्कार की भीख लो
पुरानी धुन छोडो और नई सरगम सीख लो
'स' से सलाम 'र' से राजा 'ग' से गुणगान 'म' से मंच
साहित्यकार कहलाना है तो जान लो ये सारे प्रपंच

त्याग की बात करते रहो और बने रहो भोगी
तो इस बाज़ार में एक दुकान तुम्हारी भी होगी
टीवी में, अख़बार में तुम ही तुम दिखोगे
मेरी बात मान लो प्यारे, खूब बिकोगे

स्वप्न था या दृश्य यथार्थ कथन का?
हमने चित्र देखा मनुष्यता के पतन का
हम अपनी दुनिया में तो लौट आये हैं
कुछ प्रश्न मगर साथ में ज़रूर लाये हैं

व्यवस्था पर दोष डालना सही ढंग नहीं है
क्या हम भी इसी व्यवस्था का अंग नहीं हैं?
अगर साहित्यकार हैं तो दायित्व स्वीकार करें
उठायें कलम, रुग्ण मानसिकता पर प्रहार करें

दर्पण में बिम्ब दिखायें अवश्य वर्तमान का
मगर रास्ता भी बनायें भविष्य के निर्माण का
क्योंकि कल की नींव है ये, प्रेरणा है आज की
कलम तो स्वयं शिल्पकार है इस समाज की

© - प्रशांत सेठ

Monday, October 19, 2015

अहंकार

"मुझे आज तक समझ में नहीं आया के संसार ऐसा क्यों है, वैसा क्यों नहीं है। लोग इतनी सी बात को समझते क्यों नहीं हैं"

ये शब्द आपने अक्सर कुछ लोगों के मुंह से सुने होंगे। ये एक विशेष प्रकार की प्रजाति होती है जो स्वयं को इस संसार से अलग मानती है और प्रदर्शित भी करती है। ईश्वर ने उन्हें गलती से इस संसार में भेज दिया होता है क्योंकि उनके अनुसार वे पात्र तो किसी अन्य उत्कृष्ट लोक के होते हैं। बहुत घुटन होती है उन्हें इस संसार में। अपने चारों तरफ उन्हें कोई भी अपने समकक्ष नहीं मिलता। अंत में अवसाद लेकर इस संसार से जाते हैं। निश्चित है ऊपर जाकर भी शिकायत ही करते होंगे।

हम कोई अपवाद तो हैं नहीं। आपको ऐसे लोग मिल सकते हैं तो हमको क्यों नहीं? ऐसे ही एक सज्जन सुबह सुबह टकरा गए। मन ही मन कुछ हमदर्दी और उजागर शुभकामनाओं के साथ विदा किया। अब आप पूछेंगे की हमदर्दी भी कोई मन ही मन देने की चीज़ है? तो हम कहेंगे की मेरे भाई, जिसे स्वयं के रुग्ण होने का पता नहीं है, वो हमारी हमदर्दी क्यों लेगा?

चिंतन करना मेरा स्वाभाव है। उद्देश्य है स्वयं के अंदर निरंतर सुधार का प्रयास। इसलिये इस दर्पण में सबसे पहले अपना चेहरा देखा तो पाया कि कभी हम भी तो ऐसे ही थे। जब तक सिर्फ दूसरों को पढ़ते रहे तब तक शिकायतों से भरे रहे। अब जब दूसरों के पहले खुद को भी पढ़ते हैं तो अपनी कमियों के प्रति सजगता बढ़ती है। परिणाम आनंद शांति और प्रेम के रूप में मिलता है। और इससे बड़ी सफलता क्या होती होगी?

इस बार विजयादशमी पर भीतर ही कुछ जल जाये तो क्या बुरा है। देखिये, ये रचना शायद आपके भी किसी काम की हो...

अहंकार

विद्वता का चोला ओढ़े
कब चुपके से तुम आ गये
मेरे मन मंदिर के भीतर
चोरी चोरी समा गए

कभी पर्वत सा वृहद लेकर
कभी राई सा लघु आकार
क्रोध घृणा है द्वेष मोह भी
अनंत तुम्हारे हैं प्रकार

दस चेहरे तुम ही रावण के
तुम ही राम का हो वनवास
सूर्पनखा का दर्प तुम ही हो
तुम ही सीता का संत्रास

लेकिन मैं पहचान रहा हूँ
बदलो तुम कितने भी रूप
तुम ही कभी छाँव हो और
कभी तुम ही बन जाते धूप

भ्रम के अदृश्य आवरण से
अवरुद्ध करते ज्ञान की राह
भटकाते हो मन को तुम ही
देकर झूठे मान की चाह

सहज सुंदर जीवन में
विशिष्टता का भ्रामक स्वाद
फिर कुंठाओं का रूप लेकर
तुम ही बन जाते अवसाद

भरा घट लेकर मेघों से
करते हो वर्षा की आस
चलो जरा रीत भी जाओ
खाली होकर आओ पास

मन भीतर से खुद पूछेगा
प्रकाश रखूँ या अंधकार?
सागर मिलन की प्यास रखूँ
या पृथक बूँद का अहंकार?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 15, 2015

एक पाती (वित्त) चोर के नाम


मेरे एक प्यारे से मित्र हैं। हास्य कवि हैं, उसपर से सरदार भी। उनकी कोई फैक्टरियां भी नहीं हैं और बाप दादों ने भी दिल खोल के दिया तो है, लेकिन केवल आशीर्वाद।

उनके घर कल रात चोरी हो गई। पहले तो दुखी हुए; बताया की जीवन भर की जो थोड़ी बहुत जमा पूँजी थी वो चली गई। फिर हंसने लगे। मुझे भी हंसी आ गई; अब एक कवि के घर सरस्वती ही रह सकती है, लक्ष्मी कहाँ ठहरती है। वित्त चला गया तो जाने दो, चित्त ना जाने पाये।

भीगा होगा अंतर्मन जिसका
वही तो मुस्कुराता है
मुझे मालूम है वो रोया होगा
जो सबको हंसाता है

द्रवित ह्रदय ने फिर एक रचना को जन्म दे दिया ....

एक पाती (वित्त) चोर के नाम

उम्मीदें थीं कल की इसमें
कुछ बूँदें थीं पसीने की
कुँवारे जेवर थे बहन के
बेटी की फीस महीने की

लटक रही पीले पत्ते सी
एक आशा की डाली थी
बीमार माँ की थीं श्वांसें
दवा की शीशी खाली थी

बच्चों से किये वादे इसमें
जो अभी तक अधूरे थे
बहुत नहीं था अलमारी में
लेकिन सपने पूरे थे

फिर भी सब कहाँ था उसमें
भावों का गंगाजल नहीं था
रब की उसमें दुआ नहीं थी
और धीरज का बल नहीं था

कुछ ज़रूरत थीं जीवन की
मुश्किलों का हल नहीं था
असली धन तो छोड़ गए तुम
साहस और संबल नहीं था

यही सोच मैं दुआ देता हूँ
तुम्हारी भी तो बेटी होगी
बूढ़ी माँ होगी बिस्तर पर
जो बीमार सी लेटी होगी

ऐसी कोई मजबूरी जो
शायद मुझसे बड़ी होगी
सर उठाये ज़रूरत कोई
द्वार तुम्हारे खड़ी होगी

मगर जीवन यज्ञ में सुन लो
निज श्रम का ही फल मिलता है
खुशियों का कोई फूल कहाँ
रेगिस्तानों में खिलता है

इसलिये मेरी इस पाती को
पवित्र ह्रदय से पढ़ना तुम
चरित्र आँगन के फूलों का
संस्कारों से गढ़ना तुम

ईमान का कुछ धन लेकर
बेटी की फीस में मिला देना
बूढ़ी माँ को मेहनत की भी
दो बूँद ज़रूर पिला देना

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, October 14, 2015

बचपन

सफल लोग बताते हैं की जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन मैं इन सफल लोगों से सहमत नहीं हूँ। कभी कभी पीछे मुड़कर देख लेने से बहुत कुछ ऐसा मिल जाता है जो जीवन की रफ़्तार में छूट गया है....

बचपन

बचपन वाले पंख लगाकर
उड़ने को बस है तैयार
चला आज फिर सपने लेकर
मन पंछी बादल के पार

स्मृतियों के झरोखे से
अतीत झाँक रहा इस पार
इक सुंदर थी राजकुमारी
इक सुंदर था राजकुमार
चला आज फिर....

फूलों से लेकर खुशबू
तितलियों से रंग हज़ार
हवाओं के साथ मिलकर
महकाते थे हम संसार
चला आज फिर....

रूठना फिर मान जाना
ज़रा देर की वो तकरार
ना ह्रदय में गांठ कोई
ना रिश्तों में अहंकार
चला आज फिर....

ना किसी की जीत ही थी
ना किसी की थी तब हार
संघर्षों से परे ह्रदय में
पलता था बस निश्छल प्यार
चला आज फिर....

मित्रता में स्वार्थ नहीं था
ना क्षमा थी ना आभार
इक पल में बह जाता था
नयनों से ह्रदय का ज्वार
चला आज फिर....

समझ नहीं ज्ञान नहीं था
दायित्वों का ना था भार
छोटी छोटी ख़ुशी बड़ी थी
छोटा सा दुःख था अपार
चला आज फिर....

मिट्टी की गुल्लक में रखे
सपनों का फलता व्यापार
हमसे बड़ा धनिक नहीं था
इच्छाओं का न था विस्तार
चला आज फिर....

मुस्कानों पे शर्त नहीं थी
मुक्त थी आंसुओं की धार
उत्सव था जीवन सारा
हर दिन था जैसे त्यौहार
चला आज फिर....

बचपन में नादानी थी
समझ पड़ी थी लाचार
मुड़कर देखा तो पाया कि
छूट गया जीवन का सार
चला आज फिर....

© - प्रशांत सेठ

Sunday, October 11, 2015

मेरा किरदार पढ़ लोगे

काव्योदय में आज के मिसरे से प्रेरित एक ग़ज़ल। मिसरा था...

"कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे"
___________

न काबा में न काशी में मुझे क्या यार पढ़ लोगे
कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे

न जाने खोजते हो क्या सदा औरों की सीरत में,
कि खुद को पढ़ लिया जिस दिन तो तुम संसार पढ़ लोगे

ज़रा डुबो कभी इसमें ये जीवन मौजे दरिया है
किनारों पर यूँ ही रहकर भला क्या धार पढ़ लोगे

ज़रा साँसों को तरसो और लो गहराई में डुबकी
कज़ा क्या है ज़रा इस पार से उस पार पढ़ लोगे

कभी जब वक़्त होगा ज़ीस्त की दौलत लुटाने का
अमानत थी किसी की ये तुम्हें उधार पढ़ लोगे

तुम्हारे हाथ में हैं गढ़ लो खुद तकदीर तुम अपनी
लकीरें जब पसीने से धुलेँगी सार पढ़ लोगे

सफीना हौसले का हो, रहे पतवार रहमत की
बहुत छोटी सी है मुश्किल की ये मझधार पढ़ लोगे

गुमाँ ताउम्र था हो वस्ल तुमसे आज ही शायद
गुमाँ ही था कि तुम आँखों में इंतज़ार पढ़ लोगे

चलो अच्छा ही है जो बाख़बर हो तुम ज़माने से
खबर जब साया होगी "सेठ" की, अखबार पढ़ लोगे

© - प्रशांत सेठ

Friday, October 2, 2015

अपना अपना गांधी

गांधी जब तक एक दर्शन है तब तक वंदनीय है। मगर जहाँ केवल प्रदर्शन (दिखावा) बनकर रह गया है, वहां निंदनीय हो जाता है। दुनिया में राजनीतिक स्वार्थ और अपूर्ण समझ ने ऐसे कितने ही दर्शन और चिंतन को विकृत रूप दिया है तो गांधी कौन सा अपवाद हैं।  इस दर्शन को अपनाने के बजाय केवल प्रदर्शन तक सीमित हो जाने की वजह से इसकी गहराई को समझ पाना सबके लिए संभव नहीं है। इसको वही जान सकता जिसने गांधी जी के आत्मबल को धारण किया होगा। बलहीनों को भी अपने अधिकार के लिये संघर्ष करने का जो तरीका गांधी ने दिया है, उसके सामने दुनिया आज भी झुकती है; लेकिन तब ही जब इस प्रक्रिया को पूरी तरह आत्मसात किया जाए।

लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ। यह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं है, वरन एक मानसिकता पर है। और समर्थन है एक दर्शन का। एक पुरानी रचना जो आज भी पुरानी नहीं है...

अपना अपना गांधी

गांधी वो जो है नोट पर
या वो जो जिया लंगोट पर

गांधी वो जिसकी तस्वीर दीवारों पर
या वो जिसका प्रभाव है विचारों पर

गांधी वो जो स्वयं में एक दर्शन है
या वो जो खादी में कोरा प्रदर्शन है

गांधी वो चरखा जिसका स्वाभिमान है
या वो जो चर के खा रहा हिंदुस्तान है

गांधी वो जो दफ़न है राजघाट में
या वो जो है सत्ता के ठाट बाट में

मुझे नहीं मालूम तुम्हारा गांधी कौन है
मेरा गांधी तो शर्म से मौन है

फिर भी तुम सबको बधाई हो
शायद तुमने भी गांधी जयंती मनाई हो

खैर जाने दो अपना अपना सबका गांधी है
मेरा तो चला गया गुजरी हुई आंधी है

तुम्हारा वही है ना?
जिसके चेलों की आज भी चांदी है

© - प्रशांत सेठ


Thursday, October 1, 2015

बिटिया

कल प्यारी बेटी का 17वां जन्मदिन था। इससे बढ़कर मेरे पास कोई उपहार नहीं था। संसार की सभी बेटियों को समर्पित ...

बिटिया

मेरी बिटिया तू लाखों में है
तेरा स्वप्न मेरी आँखों में है
यही विश्वास तेरा उपहार है
बल मेरा तेरे पाँखों में है
(पाँखों = पंख)

मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है
तू मेरे प्रयासों की शक्ति है
एक तू ही बंधन है जग से
तू ही जीवन से अनुरक्ति है

यह संसार कुम्हार की भट्टी
और ये कच्ची गीली सी मिटटी
इसे संस्कारों की चाक पे गढ़ना
तुझमें ईश्वर की छुपी थी चिट्ठी

समय हुआ अब उड़ने का नीड़ से
घर से निकल मिल दुनिया की भीड़ से
तुझे गगन है पाने को आतुर
मोह कैसा मुझ नश्वर अनीड से
(अनीड = जिसका आश्रय ना हो)

साहस हूँ मैं, नहीं बैसाखी हूँ
पथरीली राहों का साथी हूँ
भोर हुये जिसको बुझना होगा
रात भर जलती हुई बाती हूँ

कल तेरी अपनी सृष्टि होगी
देह नहीं, मेरी दृष्टि होगी
मै वहीँ रहूंगा ह्रदय में तेरे
जब जब स्मृतियों की वृष्टि होगी

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, September 29, 2015

अधूरापन

काव्योदय के साथियों ने आज एक मिसरा दिया

"अधूरी सी मोहब्बत है अधूरा प्यार जाने क्यूँ"

इस पर कुछ कहने की कच्ची सी कोशिश ....

अधूरी सी मोहब्बत है, अधूरा प्यार जाने क्यूँ
इधर एहसास का दरिया, उधर व्यापार जाने क्यूँ

तिरी यादों की लहरें क्या साहिल से हैं टकराई
समंदर हैं मिरी आँखें, भीगे अश्आर जाने क्यूँ

मिरी कोशिश रही छोटी, वही ऊंची ज़ियादा थी
हमारे दरमियां इक थी खड़ी दीवार जाने क्यूँ

मिरे हाथों में होकर भी मिरे हाथ ही नहीं आतीं
लकीरों पर मिरा इतना, नहीं इख़्तियार जाने क्यूँ

न मेरी है ज़मीं कोई, न मेरा है फलक ही वो
परिंदे सा मिला मुझको, अजब किरदार जाने क्यूँ

पसीने से जिसने अपने, ज़माने भर को पाला है
उसे ही रोटी की है अब, बड़ी दरकार जाने क्यूँ

© - प्रशांत सेठ

Saturday, September 26, 2015

अर्जुन

कर्ण से लेकर अर्जुन तक की यात्रा में प्रथम पड़ाव थी मेरी पूर्व रचना "कर्ण"। मेरा निवेदन है कि इस रचना को पढ़ने से पूर्व "कर्ण" को अवश्य पढ़ें।

http://prasantseth.blogspot.in/2015/09/blog-post_20.html

सच कहूँ तो झूठ नहीं लिखा था, परंतु सच भी पूरा नहीं लिखा था एवं जानबूझकर कुछ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए थे। आशा थी कि गुणीजनों से ऐसे उत्तर मिल जायेंगे जो नकारात्मकता एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित ना होकर, दोनों पक्षों के गुण-दोष का निष्पक्ष चिंतन करेंगे और मर्म तक पहुंचेंगे। बहुत अच्छी और श्रेष्ठ चिन्तनयुक्त प्रतिक्रियाएं मिली किन्तु फिर भी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिली। तब मैंने सोच लिया की अब उत्तर भी वहीँ से लाऊंगा जहाँ से प्रश्न आये थे और मुझे विश्वास था की उत्तर अवश्य मिलेगा।

मैंने निवेदन किया था की कर्ण और अर्जुन की तुलना में कोई ना उलझे क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। सच तो यह है कर्ण के बिना अर्जुन को समझा नहीं जा सकता। हम लोग (मैं भी) बड़ी जल्दी अपने अल्प ज्ञान से किसी के भी चरित्र की समीक्षा ही नहीं करते, वरन निर्णय भी सुना देते हैं। सच तो ये है की उस युग के तथाकथित अधर्मी भी इस युग के मनुष्यों से कहीं आगे थे ज्ञान में, कर्म में, बल में, बुद्धि में। अत: तुलना करनी ही है तो स्वयं से की जानी चाहिए। तब निर्णय सुनाने की बजाय कदाचित हम निर्णय लेना शुरू कर दें।

कर्ण और अर्जुन, दोनों के कर्म में कोई निजी स्वार्थ नहीं था। हाँ, कर्ण, भीष्म, द्रोण, आदि ने निज संकल्पों को धर्म से ऊपर रखा, इसलिए अधर्मी ना होते हुए भी संकल्पों एवं उपकारों से बंधे हुए, अधर्म की तरफ खड़े दिखाई दिए। इनको परास्त करने का सामर्थ्य अर्जुन में नहीं था। परंतु जिसमें सामर्थ्य था वह अर्जुन के साथ था। और वह अर्जुन के साथ क्यों था, इस पर चिंतन ही इस रचना का उद्देश्य है। फिर किसी भावुक कर्ण का दोहन ना हो और भावनायें सही जगह समर्पित हों ऐसा प्रयास है।

महाभारत आज किसके जीवन में नहीं है? जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों में निर्णय लेते समय, यदि इन ग्रंथों से मार्गदर्शन लिया जाए तो संभव है हमारे आपके जीवन की महाभारत भी समाप्त हो जाए। समर्पण किसके प्रति हो? जीवन रुपी रथ पर, इन्द्रियों रुपी अश्वों की लगाम थामे, ईश्वर रुपी सारथी के प्रति या धृतराष्ट्र रुपी मोह और दुर्योधन रुपी लालसाओं के प्रति। सक्षम होते हुए भी तथा अधर्मी ना होते हुए भी यदि जीवन में पराजय है तो हमें अपने बंधनों को पहचान कर तोडना होगा। अपने अंदर के कर्ण को सही दिशा देनी होगी। मैंने अपनी अल्प समझ से गीता का यही सार समझा है।

मुझे विश्वास है की इस रचना को भी सराहना अवश्य मिलेगी, (शायद उतनी नहीं)। "कर्ण" ने यदि आपके ह्रदय को छुआ था तो "अर्जुन" आपके मस्तिष्क पर अवश्य चोट करेगी...

अर्जुन

कर्ण, तुम मेरे भ्राता भी हो, ज्येष्ठ भी
धनुर्धर, मुझसे कहीं अधिक श्रेष्ठ भी
मित्र मोह में किन्तु समझ सके ना मर्म को
उपकृत कौशल तुम्हारा समर्पित रहा अधर्म को

मेरे अपने संकल्प का यहाँ कोई अर्थ नहीं है
तुम्हें पराजित कर सकूं, मेरा सामर्थ्य नहीं है
तुम्हारे शौर्य, पराक्रम, दानवीरता का सदैव वंदन है
तुम्हारा शत्रु यह पार्थ नहीं, केवल निज मोह बंधन है

विश्वास, लक्ष्य, संकल्प जहाँ सब अर्पित हो
प्रभु चरणों में जिनका जीवन ही समर्पित हो
निज सामर्थ्य का नहीं कभी जो गीत गाते हैं
वो वानर भी, अजेय लंका को जीत लाते हैं

कृष्ण सा सारथी जिसके भी पास है
यश और कीर्ति सदैव उसकी दास है
वह सारथी नहीं है केवल मेरे रथ का
वह स्वयं धर्म है, मैं पथिक धर्मपथ का

पराजित अहंकार था मेरा, संकल्प भग्न था
मैं क्षत्रिय जब शस्त्र त्याग कर हुआ नग्न था
वह केशव था जिसने शस्त्र पुनः धारण किया
मैं नहीं, कृष्ण ने अधर्मियों का संहारण किया

क्रिया भी, कार्य भी, जो कुछ है प्रभु है
उस विराट के समक्ष निज अस्तित्व लघु है
मन, बुद्धि, अहंकार जिसके वशीभूत, वही सर्वस्व है
सवार तो सदा से वही है, यह अर्जुन मात्र अश्व है

मैं पराजित था जब तक स्वयं युद्धरत था
युद्ध उसका था, धर्म स्थापना जिसका व्रत था
नियति अधीन है उसके, वह कालजयी है
वरना कर्ण तो सदा विजयी था, विजयी है

हे कर्ण, जीवन मूल्यों का मैंने भी मान किया है
कुल और मित्र के समक्ष अहंकार का दान किया है
किन्तु धर्म, सत्य, मानवता पर संकट के क्षण में
भविष्य पर सदा बलिदान, निज वर्तमान किया है

आत्मा अनश्वर है, देह-बंधन माया है
मैंने यही गीता अमृत उससे पाया है
स्थूल दृष्टि से परे यही चित्र है कोई
ना शत्रु है कहीं, ना मित्र है कोई

मुझे सफल कहो, सबल कहो, ना समर्थ कहो
ना धर्म का पर्याय कहो मुझे, ना ही अर्थ कहो
युगों युगों तक वंदना केवल निष्काम कर्म की होगी
विजय कर्ण की ना अर्जुन की, सदैव धर्म की होगी

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, September 23, 2015

चिंतन

दो दिन पूर्व कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास करती हुई एक रचना पोस्ट की थी। तबसे अद्भुत अनुभव और प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हो रही हैं। रचना नितांत भावनात्मक है और एक पक्षीय चिंतन है। विशेषकर उस पराजित पक्ष का जिसे अक्सर विजय के दंभ में चिंतन के योग्य भी नहीं समझा जाता।

प्रतिक्रियाएं तो सभी प्रेरक हैं परंतु कुछ एक मश्तिष्कवादियों ने स्वयं को कर्ण और अर्जुन की तुलना में उलझा लिया। किसी ने सही गलत का फैसला सुना दिया तो किसी ने असहमति प्रदान कर दी। एक सज्जन ने तो सहानुभूति प्राप्त करने का तरीका ही कह दिया। मुझे समझ में नहीं आया की इस युग में बेचारे कर्ण को किसी की सहानुभूति से या सहमति से क्या लेना देना। एक सज्जन ने तो बर्बरीक के कथन को अंतिम सत्य कह के चिंतन पर ही विराम लगा दिया।

एक बार फिर स्पष्ट कर दूं, यह रचना केवल और केवल कर्ण के दृष्टिकोण और मनोभावों को व्यक्त करने का प्रयास भर है। उसके पक्ष को उचित ठहराने का कोई उद्देश्य नहीं है। बेचारा कर्ण आज फिर निहत्था था और विद्वानों के पूर्वाग्रह ने उसे मृत्युदंड दे दिया।

भावों के समंदर में उतरे बिना उसकी गहराई का माप बताने वालों को मैं यह बात अवश्य कहना चाहता हूँ कि...

"केवल अध्ययन से ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके साथ साथ चिंतन मनन ना हो तो नवीन विचारों की उत्पत्ति संभव नहीं है।"

एक छोटी सी रचना के माध्यम से मेरी बात..

चिंतन

कितना भी गहरा हो किन्तु
जो ठहर गया वो खारा है
चिंतन में प्रवाह हो सतत्
ज्ञान तो बहती धारा है

प्रश्न कर्ण है ना अर्जुन ही
वो सब उत्तर पा गए हैं
प्रश्न है अपनी जिज्ञासा का
हम कहाँ तक आ गए हैं?

विशिष्ट विचार बोध केवल
अहंकार है, भ्रम मात्र हैं
तर्क वितर्क में ज्ञानी उलझें
जिज्ञासा तो सदैव छात्र है

विजयी लिखते इतिहास सदा
पराजित सहता उपहास है
जय पराजय सब क्षणभंगुर
कालचक्र में विलुप्त श्वांस है

धर्म की सदा विजय होती या
विजयी कथन ही धर्मशास्त्र है
इस पर भी चिंतन करने की
समग्र दृष्टि किसके पास है?

कहें बर्बरीक, देव या यम
या कहते हों कृष्ण स्वयं
सत्य अन्वेषण धर्म यही है
चिंतन प्रवाह ना जाये थम

© - प्रशांत सेठ

Monday, September 21, 2015

कर्ण

जीवन में अक्सर उन लोगों को पिछड़ते देखा है जो नैतिकता और सिद्धांतो को ज़्यादा महत्त्व देते हैं, संबंधों को निभाते हैं, भावनाओं को जीते हैं। जो इन्हें त्याग देते हैं, वो आगे बढ़ जाते हैं। यह सफलता (केवल भौतिक) प्राप्त करने का मन्त्र आज भी है, कल भी था और शायद कल भी रहेगा।

समाज के इस चेहरे को दर्शाने के लिए उस युग का केवल सन्दर्भ लिया है। कर्ण और अर्जुन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों अपनी अपनी जगह सफल हैं और अपने अपने दृष्टिकोण से संतुष्ट भी। फर्क है तो दोनों की दृष्टि में सफलता के अर्थ का। एक जीने के लिए रिश्तों को त्याग रहा है; दूसरा रिश्तों के लिए जीवन को। लेकिन एक कड़वा सच ये भी है की सांसारिक दृष्टि में सफल तो अर्जुन को ही माना जाता है।

आज के युग के सफल अर्जुनों को नमन करते हुये एक नवीन दृष्टिकोण केवल भावुक लोगों के लिए। एक आवश्यक बात और। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है की जब बात देश, समाज, धर्म और सत्य की हो तब ऐसी निजी भावुकता को त्याग देना चाहिए। संभवतः उस युग के कर्ण की पराजय इसलिए आवश्यक भी थी और हुई भी।

निवेदन: यह रचना कर्ण और अर्जुन के चरित्र का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है, केवल कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है। इतिहास साक्षी है की पराजित वर्ग के विचारों को, भावनाओं को अधिकांश लोग चिंतन में स्थान नहीं देते। मेरी इस धृष्टता को क्षमा करें।

कर्ण

पार्थ, तुम सफल हो, सबल हो, समर्थ हो
धर्म का पर्याय तुम, आज तुम ही अर्थ हो
युगों युगों तक तुम्हारा यशोगान होना है
मैं तो कर्ण हूँ, पराजय ही मेरे नाम होना है

कौशल में कहो, कहाँ तुमसे मैं कम हूँ
किन्तु पराजित हूँ आज और अक्षम हूँ
सच तो यह है, अपने भाग्य का मैंने ही हरण किया है
मैंने स्वयं ही बढ़कर पराजय का वरण किया है

अपनी ही सेना का भक्षक, फिर भी परमार्थी
मैंने चाहा ही नहीं ऐसा धर्मरथ, ऐसा सारथी
मित्र से घात, ये मेरा संस्कार नहीं है
जीवन का ये मूल्य, मुझे स्वीकार नहीं है

होकर भी नहीं रहा अपनी माता की संतान
मैं जानता हूँ रिश्तों की कीमत, उनका मान
अभिमन्यु, घटोत्कच के शवों पर विजय गान
मैं नहीं ले सकता स्वार्थ के लिये, पुत्रों का बलिदान

चढ़कर एकलव्य के अंगुष्ठ सोपान पे
या फिर रथ पर मिथ्या अभिमान के
विजयश्री आई है तुम्हारे पास चलकर
किन्तु कीमत पर निज आत्मसम्मान के

मैं निष्प्राण होकर भी जीवित स्वाभिमान हूँ
मैं नहीं कपटपूर्ण कवच कुंडल का दान हूँ
शस्त्रविहीन, उसपर मर्यादाओं में कसा हुआ
हाँ, मैं रथ का पहिया हूँ, धरती में धंसा हुआ

लिया नहीं छल असत्य का सहारा
मैंने किसी अश्वत्थामा को नहीं मारा
इस दृष्टि से भी देखो अर्जुन, ये चित्र है तुम्हारा
मैं कर्ण हूँ, जो हारकर भी नहीं हारा

मैं केवल अग्नि नहीं, जल भी हूँ, समीर भी
मैं क्षत्रिय वीर हूँ, सूतपुत्र भी, दानवीर भी
मैं जीवन मूल्यों का सदा ही मान करता हूँ
इसलिए, ऐसी विजय मैं तुम्हे दान करता हूँ

भेद सकता है लक्ष्य को तुम्हारा हर तीर
दांव पर लगा सकते हो तुम द्रौपदी का चीर
सफल रहते हैं कदाचित, तुम जैसे ही संसार में
भावनाओं से शून्य लोग, स्वार्थ के प्रति गंभीर

अर्जुन, तुमने सदा चिड़िया की आँख देखी है
और मैंने चिड़िया की आँखों में दर्द देखा है
मेरी पराजय और तुम्हारी अपराजय के बीच
भावुकता की यही एक महीन सी रेखा है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 6, 2015

एक भाव ह्रदय का

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

परिभाषा किसी भी रिश्ते को बाँध देती है, शर्तों में। प्रत्येक सम्बन्ध किसी ना किसी अपेक्षा के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। परिभाषित रिश्तों में एक दूरी भी होती है। लेकिन एक रिश्ता है जहाँ कोई परदा नहीं होता। जो अनंत है और शाश्वत है।

अपेक्षा रहित सच्ची मित्रता ईश्वर का ही तो दर्शन है। मित्र में ईश्वर और ईश्वर में मित्र को महसूस करती हुई और इच्छाओं और अपेक्षाओं के कारावास से निकालकर, उसको ह्रदय के गोकुल में ले जाने का प्रयास करती हुई एक रचना ....

एक प्रश्न का लेकर के बोझ
मेरा मन भटकता है रोज
शायद आज पूर्ण हो जाये
उस शाश्वत रिश्ते की खोज

ना निर्मित का निर्माता से
ना पुत्र का जैसे माता से
इन रिश्तों में एक दूरी है
दूरियां कैसी विधाता से?

हर रिश्ते में है शर्त कड़ी
मर्यादा की दीवार बड़ी
और मुझे स्वीकार नहीं है
ये बंधनयुक्त जकड़ा जकड़ी

फिर.....

क्या भक्ति ही एक संबंध है?
या वो भी सिर्फ अनुबंध है?
तुम्हारे गुणों के गान में
मुक्ति का ये कैसा प्रबंध है?

भय है, ज्ञान है, जिज्ञासा है
या फिर कोई अभिलाषा है
इस युग में तुम्हारी भक्ति की
सबकी अपनी परिभाषा है

कुछ रस्मों का संधारण है
या फिर दुखों का निवारण है
मैंने अपनी भक्ति में देखा
स्वार्थ ही एकमात्र कारण है

तुम्हारी हर इच्छा अव्यक्त है
और मेरा सब कुछ व्यक्त है
इसी अपूर्ण रिश्ते का नाम
क्या भगवान है और भक्त है?

नहीं....

भक्ति का एक और रूप है
ना परिभाषित ना कुरूप है
सुन्दर सा एक रिश्ता है जो
निश्छल प्रेम का स्वरुप है

इस रिश्ते में शर्त नहीं है
स्वार्थ की कहीं पर्त नहीं है
यही इसकी सुंदरता है कि
छुपा हुआ कोई अर्थ नहीं है

जैसे....

ब्रजबाला का नन्दलाल से
या गऊओं का गोपाल से
मुरली का जैसे तुम्हारी
श्वांसों के सुर और ताल से

तो फिर....

सम्बन्ध हो मित्र सुदामा सा
या फिर ऊधव श्रीदामा सा
अव्यक्त होकर भी व्यक्त हो तुम
जिधर प्रेम हो सखी राधा सा

© - प्रशांत सेठ

Saturday, August 15, 2015

एक बेताल की व्यथा

कल रात सारा देश जब एक दूसरे को शुभकामनायें देने में व्यस्त था, मैं अपनी तलाश पर निकल चुका था। अंत में मेरी तलाश तो पूरी हो गई मगर मैं भाषण और जलसों से चूक गया। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं नहीं दूंगा; बल्कि एक कथा सुनाऊंगा, विक्रम बेताल की...

आखिर फुटपाथ पर सोता हुआ मिल गया
उसकी दुर्दशा देखी तो मैं हिल गया
पास जाकर देखा सांस चल रही थी
फिर भी आँखों में एक उम्मीद पल रही थी

मैंने कहा बाबा उठो, रात भर ढूँढ़ ढूँढ़ कर परेशान हो चुका हूँ
तुम निष्ठा की तरह गायब हो, मैं हिंदुस्तान हो चुका हूँ
क्या आज के दिन भी तुम्हें इस तरह से सोना चाहिये?
वहाँ लाल किले पर भाषण होना है, जल्दी आइये

वो बोला, शायद फिर से पंद्रह अगस्त आ रहा है
इसलिये इतनी व्यग्रता से मुझे ढूँढ़ा जा रहा है
चलो चलता हूँ, आज के भाषण में तो मुझे होना होगा
कल भले ही मेरी किस्मत में फुटपाथ का कोना होगा

लेकिन एक शर्त है, मैं तेरी पीठ पर चढूँगा
अपने पैरों से एक कदम भी नहीं चलूँगा
बेताल की तरह मुझे कांधों पर ढोना तेरी मजबूरी है
मैं राष्ट्रवाद हूँ, इसलिए तुझे विक्रमादित्य होना ज़रूरी है

रास्ते भर मैं अपनी कथा सुनाऊंगा
अड़सठ बरस की व्यथा बताऊंगा
और अपने कुछ प्रश्नों का जवाब मांगूंगा
आज़ादी के बाद का पूरा हिसाब मांगूंगा

सिर्फ भाषण और जुलूस में नहीं सम्मान चाहिए
मुझे हर हालत में समस्या का समाधान बताइये
सच तू बोल नहीं सकेगा, झूठ मैं सुन नहीं पाऊंगा
और उत्तर ना दिया तो किसी पेड़ से लटक जाऊंगा

अब सुन, आज़ादी के पहले मेरी बड़ी शान थी
आज फुटपाथ पर हूँ, तब ज़िन्दगी आलिशान थी
मुझसे अंग्रेजी हुकूमत भी थरथराती थी
बच्चे बच्चे में मेरी छवि नज़र आती थीं

मैं था तब सत्याग्रहियों की टोली में
स्वाभिमान की खद्दर वाली झोली में
मैं था विलायती कपड़ों की होली में
मैं था आज़ाद की अंतिम गोली में

गर्मी में, बरसात में या सर्दी में
मैं रहता था सुभाष की वर्दी में
मैं था उन जेलों में अंडमान की
भविष्य जहाँ लेता था आहुति वर्तमान की

वो बूढा जब आधी धोती में अड़ा रहता था
तब हिंदुस्तान सर उठाकर खड़ा रहता था
गूंजते थे धरती गगन स्वाधीनता के नारों से
मैं मरा नहीं कभी गोरों के अत्याचारों से

आज मैं मर रहा हूँ दस लाख के सूट में
कोयले की खदानों में, व्यापम की लूट में
मेरा जीवन संसद की तरह ठप्प है
मेरा अस्तित्व छप्पन इंच छाती जैसी गप्प है

मैं पूछता हूँ उनसे भी जो विपक्ष में बैठे हैं
किस बात का गुरूर है, किस बात पे ऐंठे हैं?
ये संसद जागीर नहीं है तुम्हारे बाप की
ये देश क्यों ढोता है गठरी किसी के पाप की?

अंत में, मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम वर्तमान हो
और उनसे भी जो भविष्य का हिंदुस्तान हो
तुम भी तो रिश्वत और घूसखोरी के आदि हो
तुम राष्ट्र की शक्ति नहीं, महज़ सवा सौ करोड़ की आबादी हो

बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह के देश में
तुम उलझे हो मंदिर मस्जिद के क्लेश में
स्वार्थ कबसे मज़हब का मर्म हो गया?
बोलो, राष्ट्र से ऊँचा कबसे धर्म हो गया?

मैंने कहा हे राष्ट्रवाद, माना के आपके प्रश्न सटीक हैं
लेकिन आप फुटपाथ पर ही भले हैं, ठीक हैं
इसके आगे मेरा स्वर गले में अटक चुका था
और राष्ट्रवाद? वो तो कबका पेड़ पर लटक चुका था

© - प्रशांत सेठ

Monday, July 27, 2015

सुखन

हमारे एक मित्र (बड़े भाई) होते हैं ______ उर्फ़ उस्ताद। बहुत ही खतरनाक आदमी हैं। खतरनाक इसलिये क्योंकि दिल से पाक-साफ़ हैं। अब आप सोच रहे होंगे की पाक-साफ़ आदमी खतरनाक कैसे हो सकता है? अरे भाई जब नवाज़ शरीफ, शरीफ हो सकता है तो हमारे उस्ताद भी खतरनाक हो सकते हैं। आगे का वाकया पढ़के खुद ही समझ लीजिये।

तो हुआ यूँ की कल उनसे एक शेर हो गया। हो गया तक तो ठीक, मगर वो शेर फेसबुक की अदालत में पेश हो गया। दुर्भाग्य से वो गरीब शेर, लाइक और कमेंट्स के फेसबुकिया अनुदान से वंचित रह गया। हमारे उस्ताद ने मान लिया की शेर ठीक नहीं हुआ इसलिये उसे सज़ा-ए-मौत सुना दी। अब शेर है मियां, कोई याकूब मेमन तो है नहीं की फांसी दे दो। हमने अपील दायर की; हुज़ूर शेरों की औकात को फेसबुक के लाइक्स और कमेंट से नहीं तौला जाता। उन्होंने प्रश्न किया, फिर कैसे तौला जाता है?

इस प्रश्न के उत्तर में एक ख्याल, व्याकरण से बहुत दूर मगर अन्तःकरण के पास, आपकी अदालत में पेश है...

बहर रदीफ़ काफिये से ही, मत समझो शेर हुआ
भीग जाये मन तुम्हारा, तब समझो शेर हुआ

गोर-ए-दिल में दफ़्न कई, अफ़साने तो हैं लेकिन
ज़ख्म कोई जब बह निकले, तब समझो शेर हुआ
(गोर = कब्र)

कहने को बज़्म में उनकी, हर कोई ही शायर है
लफ़्ज़ों में जब दर्द उतरे, तब समझो शेर हुआ

बात पुरानी हो जाती है, इस पल की उस पल में
वक़्त दोहराये लफ़्ज़ों को, तब समझो शेर हुआ

अशआरों के तीर नहीं, पल भर को तड़पाते है
इसी दम गर जाँ निकले जब, तब समझो शेर हुआ
अशआर = शेर

आह वाह की बैसाखी पे, दूर कितना जायेगी
बात फलक तक जा पहुंचे जब, तब समझो शेर हुआ

जज़्ब हैं एहसास कई 'सेठ' की इस खामोशी में
ज़ुबाने-कलम जब आ निकलें, तब समझो शेर हुआ

© - प्रशांत सेठ

Saturday, July 11, 2015

गुरु भजन

जन्म जन्मों से भटकते हुये मानव मन को त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाले और शीतलता प्रदान करने वाले गुरु चरणों में समर्पित ...

गुरुवर मेरे व्याकुल मन को, शीतलता अब पाने दो
पावन चरणों से तुम्हारे, आज मिलन हो जाने दो

ज्ञान ज्योति पाकर भी मैं, समझ सका ना उसका सार
व्याप्त था जीवन में मेरे, गहन अज्ञान और अंधकार
भक्ति के विस्मृत मेघों को, मन पटल पर अब छाने दो
गुरुवर ...

कामनाओं का गगन असीम, मैं उड़ता था पंख पसार
खूब किया मैंने अपनी, इच्छाओं के नभ का विस्तार
स्वप्न के पीछे उड़ता पंछी, साँझ ढले घर आने दो
गुरुवर ...

अश्रु भरे इन नयनों से ,बरस रहा है प्रेम अपार
भाव ह्रदय को पिघला कर, मथ रहा है बारम्बार
आज अविरल इन आँखों से, भावों को बह जाने दो
गुरूवर मेरे व्याकुल मन को शीतलता अब पाने दो

चरण अनुरागी
प्रशांत सेठ

Friday, July 10, 2015

आजकल कम लिखता हूँ

आज कुछ यूँ ही... बेमक़सद सा

आँख से आंसू चुराकर "नम" लिखता हूँ
आग दिल में खुद लगाकर "बम" लिखता हूँ

जाहिल हूँ यकीनन मैं सुखन के फन में
मैं मैं मैं की दुनिया में "हम" लिखता हूँ

रफ्तारों के इस दौर में, अजब शख्स हूँ
ना जाने क्या सोचकर "थम" लिखता हूँ

ज़माना ढूंढता है दौलत में खुशियाँ
अपनी ये फितरत इसको "गम" लिखता हूँ

रिश्ते प्यार वफ़ा ईमां और इंसानियत
अब पुराने एहसासों को कम लिखता हूँ

और एक शेर व्यापम घोटाले से व्यथित होकर...

बात अच्छे दिनों की जब जब होती है
एक लफ्ज़ में तब फिर मैं "व्यापम" लिखता हूँ

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, July 1, 2015

माँ मुझे आसमान छूना है

बहुत दिन पहले देखा था इस प्यारी सी तस्वीर को। इसमें एक कविता छुपी सी दिखी तो तुरंत ज़हन में save कर लिया था। आज फिर आँखों के सामने ये तस्वीर आई तो मुस्कुराये बिना नहीं रह सका।

बचपन से लेकर अब तक की जीवन यात्रा आँखों में तैर गई। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उपजते मनोभावों को व्यक्त करने की कोशिश में एक हलकी फुलकी रचना, अलग अंदाज़ में और बहुत ही सरल शब्दों में...

माँ मुझे आसमान छूना है

मुझे बढ़ना रात चौगुना
और बढ़ना दिन दूना है
शैशव मेरा रोया था
माँ, मुझे आसमान छूना है

मन भाग रहा मोटर सा
तन मगर अभी लूना है
बचपन मेरा कहता था
माँ, मुझे आसमान छूना है

कंधे तक अब आ गया हूँ
मगर ये तो सिर्फ नमूना है
लड़कपन मेरा ज़िद पर था
मुझे तो आसमान छूना है

कद तुमसे ऊंचा हुआ पर
बिना तुम्हारे सब सूना है
जवानी तड़प कर बोली थी
माँ की गोद में फिर सोना है

बचपन गाँव सा भोला था
अब जीवन मुम्बई-पूना है
उम्र थक कर कहने लगी है
मुझको फिर बालक होना है

...अब नहीं आसमान छूना है

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 26, 2015

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना

"वो दुआएं काश मैने दीवारों से मांगी होती
ऐ खुदा सुना है कि उनके तो कान होते हैं..."

किसी शायर की ये पंक्तियाँ आज एक मित्र ने मुझे सुनायीं तो मन में एक बेचैनी उत्पन्न हुई। बहरा होने का जिसपर आरोप लग रहा है, वो सचमुच बहरा है या फिर उसकी भाषा ही अलग है। या फिर हमारा ये कहना सुनना ही एकतरफा है।

मन हुआ कि चलो आज उसकी भी सुन लें। हमें तो उम्र भर बोलते ही रहना है। ज़रा सा मौन बहुत कुछ कह गया। नतीजा आपके सामने है।

‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।’

तुमको बेहतर लगती हैं ये दीवारें, जिसमें तुम्हारे भय विद्यमान हैं
या फिर वो मूरत, जिसके बड़े बड़े कान हैं
क्योंकि दीवारों में एक आशा होती है, जिसकी कैद में तुम रहते हो
और मूरत देती है आभास सुनने का, हर वो बात जो तुम कहते हो

तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि तुम्हारे जीवन में सामान बहुत है
वरना जीने के लिये तो खुला आसमान बहुत है
तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि ये सुरक्षा देती हैं तुम्हारे व्यर्थ को
मगर ये विलग भी कर देती हैं, जीवन से अर्थ को

दीवारों के पीछे भी एक संसार होता है
लेकिन दृष्टि से परे कुछ भी, तुम्हें कहाँ स्वीकार होता है?
और दृष्टि केवल तुम्हारी अपनी समझ का विस्तार है
जिसकी सीमा उतनी ही है, जितना तुम्हारा अहंकार है

तुम ढूंढते हो मुझे कुछ सुनाने के लिये
और मैं खड़ा हूँ कबसे तुम्हें पाने के लिये
तुम्हारा हर क्रंदन, हर स्पंदन, मैं सुन रहा हूँ
क्या अर्थ है, क्या व्यर्थ है, सब गुन रहा हूँ

मैं तुम्हारा वो शब्द भी सुन रहा हूँ जो अनकहा है
देख रहा हूँ वो आंसू जो अभी तक नहीं बहा है
चख रहा हूँ वो स्वाद जो पाना बाकी है
सूंघ रहा हूँ वो खुशबू जो आना बाकी है

मैं पत्थर नहीं हूँ, तुम्हारे मन का गढ़ा हुआ
बस देख रह हूँ दौड़ तुम्हारी, खड़ा हुआ
प्रतीक्षारत हूँ, उस एक पल के विश्राम का
विराम जब होगा तुम्हारे मन के संग्राम का

मेरी शीतलता लुप्त है, तुम्हारी भौतिकता के ताप में
और खो गई है वाणी, कामनाओं के अंतहीन प्रलाप में
ढूंढो, मैं तुम्हारे भीतर ही कहीं खो गया हूँ
मूरत नहीं हूँ, हाँ तुम्हारी दृष्टि में हो गया हूँ

मैं वहीँ रहता हूँ जहाँ स्वर उत्पन्न होते हैं
और वहां भी जहाँ निर्मित सारे स्वप्न होते हैं
जो बीज है उसे फल नहीं दिखता
मैं तो आज हूँ, मुझे कल नहीं दिखता

मैं यहीं, तुम्हारे बहुत पास हूँ
तुम देह हो तो मैं श्वांस हूँ
तुम लोभ हो तो मैं ही डर हूँ
तुम रोग हो तो मैं ही ज्वर हूँ

तुम लक्ष्य हो तो प्रयास हूँ मैं
तुम प्रार्थना हो तो विश्वास हूँ मैं
तुम्हारे अंदर ही सत्य का सोया हुआ स्वर हूँ
ढूंढते हो जिसे, मैं वही खोया हुआ ईश्वर हूँ

© - प्रशांत सेठ

Friday, May 15, 2015

प्रजातंत्र - यथा प्रजा तथा तंत्र

राजनीति कहीं बाहर नहीं होती। इंसान के अंदर ही होती है। कहीं जाग्रत तो कहीं सुप्त अवस्था में। ढूँढ़िये मिल जायेगी, मेरे अंदर भी और आपके अंदर भी, दूसरों पर शासन करने की प्रबल लालसा के रूप में।

यह व्यंग कथा कुछ बड़ी है, क्योंकि ये कविता नहीं है। ये कथा है एक सम्भावना के उदय से लेकर अंत की।

प्रजातंत्र - यथा प्रजा तथा तंत्र

मैं तिरस्कृत सा आदमी बहुत ही आम था
छोटी छोटी इच्छाओं से मन का ट्रैफिक जाम था
मोहल्ले के बचे खुचे शरीफों में अपना नाम था
हमने अब तब रखा सिर्फ अपने काम से काम था

यदा कदा कलम की तलवार पकड़ लेता था
फिर मन ही मन व्यवस्था से भी लड़ लेता था
दफ्तर में अफसर, घर में पत्नी की सरकार थी
और अपनी ज़िन्दगी विपक्ष की तरह बेकार थी

अंदर कहीं कुछ निष्क्रिय, मगर ज़िंदा था
शायद ईमान नाम का सोया हुआ परिंदा था
एक दिन ये सोया हुआ परिंदा जाग गया
हुआ यूँ की मोहल्ले का चौकीदार भाग गया

शंकर जी की चढ़ाकर बूटी
वो सो रहा था ऑन ड्यूटी
हमने टोका तो बोला यहाँ कुछ नहीं बदलेगा
ये मोहल्ला भी हिंदुस्तान की तरह ही चलेगा

इस देश में सरकार सो रही है, लोग सो रहे हैं
और तुम जैसे लोग चौकीदार पे नाराज़ हो रहे हैं?
पहले तुम जागो, तुम्हारी नींद मुझसे ज़्यादा गहरी है
हे आम आदमी, तू भी तो लोकतंत्र का प्रहरी है

उधार का ही सही हम भी ज्ञान रखते हैं
कवि हैं तो क्या हुआ स्वाभिमान रखते हैं
खून हमारा उबलना था, सो उबल गया
सरकार का गुस्सा, गरीब पर निकल गया

बात बढ़ते बढ़ते कुछ ज़्यादा बढ़ गई
छोटी सी कलम एक लाठी से अड़ गई
लेकिन सबकी अपनी अपनी कद और काठी होती है
भैंस उसी की होती है, जिसके पास लाठी होती है

न्यूटन जैसी वैज्ञानिक दृष्टि, सर पर कुछ पड़ने से मिलती है
हमने भी वह सिद्धांत खोज लिया जिस पर राजनीति चलती है
यदि कलम भविष्य में मिलने वाला फल होती है
तो लाठी समस्या का तात्कालिक हल होती है

उस दिन राजनीति की पहली सीढ़ी मैं चढ़ गया
और व्यवस्था भंग करने का दोष मेरे सर मढ़ गया
मेरे अभी अभी जागे स्वाभिमान की अर्थी निकाली गई
और नये इंतज़ाम की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही डाली गई

जीवन में कभी कभी अजीब सम्बन्ध गठित होते हैं
परस्पर विरोधी एक हो जाते हैं जब व्यथित होते हैं
सिद्धांत हमें कुछ पल के लिये एक दूसरे से दूर कर देता है
लेकिन स्वार्थ नितीश और लालू की तरह मजबूर कर देता है

कानों के ज़रिये दिमाग के हंतक हो गये
ऐसे ही कुछ हमारे भी शुभचिंतक हो गये
मुश्किल घड़ी में अच्छे बुरे का कहाँ ज्ञान होता है
बहुमत ना हो तो हर रिश्ता भगवान होता है

मैंने जीवन भर की जमा पूँजी इन रिश्तों को जोड़ा
अपनी समस्या का नारियल इनके सामने फोड़ा
मजबूरी का भोग लगाया, आस्था की अगरबत्ती जलाई
और अटकी में जैसी गाते हैं, वैसी आरती भी गाई

सबने एक सुर में मिलकर मुझे धिक्कारा
दूसरों के भरोसे जीने वाले, हे नाकारा
मन के मकान से निज इच्छाओं को खाली करो
समाज के लिये जियो, जाओ खुद रखवाली करो

मुर्दे में अचानक प्रविष्ट कहीं से प्राण हो गया
हमें अपने सामजिक दायित्व का भान हो गया
अब तक के जीवन पर हमको अफ़सोस होने लगा
हमारा लहू अचानक सुभाष चंद्र बोस होने लगा

सपने सुन्दर सलोने मैं गढ़ लेता हूँ
रास्ता हो ना हो, मैं बढ़ लेता हूँ
कोई चढ़ाये झाड़ पर तो चढ़ लेता हूँ
आम आदमी हूँ, सोचा चुनाव लड़ लेता हूँ

हमें खबर नहीं थी मगर होश जा चुका था
बुद्धि को पछाड़कर जोश आ चुका था
पानी की टंकी पर चढ़े और दे डाला भाषण
हम लायेंगे इस मोहल्ले में जागने वाला शासन

अब मैं मोहल्ले का निर्वाचित चौकीदार था
मैं ही प्रशासन था यहाँ, मैं ही सरकार था
सत्ता की मदिरा में सफ़र ज़रा भी नहीं खला
आमपुर से ख़ासनगर आ गया, पता ही नहीं चला

रास्तों पर अटकने वाला, मंज़िल से भटकने लगता है
राजनीति में पुराना रिश्ता इसलिये खटकने लगता है
सफलता मिलने पर ये मजबूरी हो जाती है
कुर्सी की करीबी में मुद्दों से दूरी हो जाती है

कौन सा परिंदा? काहे का जगना जगाना था
व्यवस्था से लड़ना? वो सब तो एक बहाना था
अब हम भी उसी सोई हुई व्यवस्था के अंग हैं
"आप" बुरा मत मानना, राजनीति के यही ढंग हैं

झाड़ू फूल पंजा, मेरे अंदर हर निशान देख लो
दोस्तो इस मोहल्ले में तुम हिंदुस्तान देख लो
इस व्यंग के अंदर देख लो अगर समझदारी है
ये व्यवस्था अच्छे अच्छों के ईमान पर भारी है
और यही इस देश की सबसे बड़ी लाचारी है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, May 10, 2015

मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना

सृष्टि की सबसे सुंदर रचना, या स्वयं सृष्टि ही होती है माँ। ईश्वर की साक्षात अनुभूति होती है माँ। मातृ दिवस पर संसार की सभी माँओं को नमन के साथ एक रचना, अपनी माँ के नाम, हालांकि...

कितना भी कुछ लिख लें लेकिन
मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना
कलम की छोटी नाव लेकर
माँ रुपी सागर को लांघ लेना

अथक परिश्रम और अदम्य साहस
अपने सृजन पर अटूट विश्वास
घुटनों पर चलते जीवन की
ऊँगलियों को उसका थाम लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

दर्द मेरा आंसू उसके थे
सुख मेरा था, दुःख उसके थे
मेरी पीड़ा के काजल को
उसका वो आँखों में आंज लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

जाने कैसे कर लेती थी
क्रोध घृणा सब हर लेती थी
मेरे मन का मैला बर्तन
ममता से उसका वो मांज लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

देह संग स्मृति जलायें कैसे
माँ यहीं है भुलायें कैसे
खुद बेसुध थी, पर मेरी सुध
उसका सवेरे और साँझ लेना
ह्रदय के इस भाव को मुश्किल
मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना

© - प्रशांत सेठ

Thursday, May 7, 2015

Being Abhijeet

#salmanverdict

वो कहते हैं की फुटपाथ पर सोना है तो ज़िन्दगी की उम्मीद मत रखिये। क्योंकि किसी रईस की बहका हुआ अहंकार आपको कभी भी रौंद सकता है।

गरीब होना अपने आप में एक जुर्म है। उस पर से किसी रईस के अहंकार से टकराना, यानि महापाप। इस जुर्म की सजा तो मिलनी ही थी। गरीब को 13 साल पहले ही मिल गई।

अभिजीत का कमेंट और कुछ नहीं बस दिल और दिमाग के बीच की दूरी है। और दिल के हिसाब से इस दिमागी दुनिया में तो रहा नहीं जा सकता। इसलिए Being Human नहीं अब Being Abhijeet होने का दौर है। एक ग़ज़ल इसी बात पे.....

आब-ए-चश्म की मानिंद, निकल चलते हैं
सिर्फ़ एहसास लिये, अये दिल, चल चलते हैं

पर क़तर देगी ओ पैरों पे ना टिकने देगी
उल्टी दुनिया है, चलो सर के ही बल, चलते हैं

हैं ये खोटे सही, पर जेब तो खनकाते हैं
नहीं बाज़ार में, सिक्के अब, असल चलते हैं

धुंध है याकि, तेज़ रोशनी है, दौलत की
अंधे जज़्बात हैं, तो हम भी,सम्हल चलते हैं

दिल को छोड़े कि हम, अक्ल का दामन थामें
साथ इस दौर के, चुपचाप, बदल चलते हैं

फिर कोई 'सेठ' ना फ़ुटपाथ को ज़ख़्मी कर दे
है अमीरों का शहर, इसमें शगल चलते हैं।

© - प्रशांत सेठ

आब-ए-चश्म = आंसू, शगल = चोंचले

Friday, May 1, 2015

श्रमवीर

मज़दूर दिवस पर दुनिया के तमाम मज़दूरों को मज़दूर होने और रहने की बधाई। तुम्हारा मर्ज़ दूर होगा या नहीं, ये तो मैं नहीं बता सकता; लेकिन इतना ज़रूर बता सकता हूँ कि दुनिया के हर ख्वाब की नींव में तुम्हारा पसीना होगा। तुम्हारे ख्वाबों की कब्र पर बड़े बड़े ताजमहल खड़े होंगे। तुम्हारे कांधों पर चढ़कर ही दुनिया चाँद पर पहुंचती रहेगी ...

तुम्हारे कांधों पर टिका जहान है
इस संसार का यही गूढ़ विज्ञान है
तेरे अरमानों की लाश पर श्रमवीर
हमारे सपनो का सुन्दर मकान है

एक व्यंग रचना...

कोई इतना क्यों मजबूर होता है
पापा, एक आदमी क्यों मज़दूर होता है
आज फिर मैं एक कठोर सच से जूझा
जब स्कूल से आकर मेरी बेटी ने पूछा

ये शख्स पत्थरों पर क्यों सोता है
इसका बच्चा भूख से क्यों रोता है
क्यों ये हर सुख सुविधा से दूर होता है
बताओ ना पापा इसका क्या कुसूर होता है

बच्चों की अलग दुनिया, अलग भाषा होती है
उसमें संवेदना, प्रेम, विश्वास और आशा होती है
ये जो बाहर दिखते हैं, वही अंदर से होते हैं
हमारी सोने की लंका में ये बन्दर से होते हैं

मैं घबराया, ऐसी भावनायें इस युग में महापाप हैं
लोग हमें धिक्कारेंगे, आप किस तरह के बाप हैं
इन फ़िज़ूल बातों को इसके मन से मिटाना होगा
अभी ये बन्दर है इसे इंसान बनाना होगा

मैंने कहा, कौन कहता है ये मजबूर होता है
सरकारी फाइलों में ये बड़ा मशहूर होता है
इसके लिए देेश में योजनायें हैं बहुत सारी
मगर इसको है नहीं सुधरने की बीमारी

इन योजनाओं में अफसर मंत्री सब पनप जाते हैं
गली मोहल्ले के छुटभैये नेता भी खप जाते हैं
एक यही है जो जस का तस रहता है
खट्टे अंगूरों को ताकता बस रहता है

इस प्रजाति में एक बात ख़ास होती है
इसे ना भूख लगती है, ना प्यास होती है
इसके जिस्म में खून नहीं, पानी बदस्तूर होता है
जिस दिन बहता नहीं पसीना, आँखों में ज़रूर होता है

आधी ज़िन्दगी ये व्रत रखता है
इसको अपनी भूख पर गुरूर होता है
फुटपाथों पर ये चैन से सोता है
बिस्तरों का इसको कहाँ शऊर होता है

इसको अस्पतालों की ज़रूरत नहीं है, ये बीमार नहीं होता
ये पढ़ लिख जाता तो आज ताजमहल और क़ुतुब मीनार नहीं होता
इन बातों को हमारा समाज अच्छी तरह समझता है
इसलिये इन सुविधाओं से इसको वंचित रखता है

इसकी आमदनी भी बड़ी भारी होती है
तभी तो इसकी बस्ती में कलारी होती है
भौतिक सपनों से दूर ये त्यागी महान होता है
संसार की नश्वरता का इसको पूर्ण ज्ञान होता है

आज मई दिवस है, नेताजी ने यूँ ही भाषण दिया होगा
स्कूल वालों ने गरीबों को मुफ़्त में राशन दिया होगा
तुम फ़िक्र मत करो, आज के दिन का ये राजनैतिक दस्तूर है
ये तो कल भी मज़दूर था बेटी, ये आज भी मज़दूर है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 29, 2015

उत्तरदायी कौन?

भूकंप को लेकर तमाम विचार पढ़ने मिले। उनमे से कुछ ईश्वर के अस्तित्व अथवा शक्ति पर संदेह करने वाले भी थे। कोई कह रहा था की इस तबाही को रोक पाना ईश्वर के बस में भी नहीं है।

शिकायतें और मांगें, इसके अलावा कुछ और लेकर परमशक्ति के समक्ष पहुँचने वाले विरले ही होंगे। ये कटु सत्य है की शिकायतें लेकर जीने वाले लोग, स्वयं के दोषों के प्रति अंधे होते हैं। ऐसे लोगों को मेरी सलाह है के ईश्वर के अस्तित्व को बिलकुल नकार दें। जब वो है ही नहीं, या बेबस और लाचार है तो फिर शिकायत क्यों और किससे। शिकायतों में जीने से बेहतर यही होगा क्योंकि तब शिकायतें नहीं कर पाओगे। शिकायत के समाप्त होते ही नव निर्माण की राह खुलेगी और स्वयं के प्रयास शुरू होंगे।

किस्मत/प्रारब्ध में लिखे हुये किसी भी कष्ट से सम्बंधित प्रश्न को लेकर जब मैं अपने ईश्वर के समक्ष होता हूँ तो हर बार जवाब में यही प्रतिप्रश्न मिलता है...

चार सू ये तबाही का मंज़र, कौन लिख गया
शहर आबाद गाँव को खंडहर, कौन लिख गया
हक़ से ज़ियादा ले रहा कौन, खुद से पूछो
कतरे जैसी प्यास को समंदर, कौन लिख गया

© - प्रशांत सेठ

चार सू = चारों तरफ

Monday, April 27, 2015

पर्याहरण

माफ़ करना दोस्तो। ज़रा सी ज़मीन क्या हिली, हम भी हिल गये। इसलिये आज फिलोस्फी झाडेंगे। दो चार दिन में, हम खुद ही भूल जायेंगे और आप भी कहाँ तक याद रखेंगे।

हम कितने बेबस हैं दोस्त
अपने ही हाथों में
लातों के भूत हैं हम
कहाँ मानते बातों में
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कल हम बतिया रहे थे इंसान की बेहिसाब भूख पर। अब पेट हो तो भर भी दे ये धरती। मगर तृषणा? उसको तो भगवान भी तृप्त नहीं कर सकता।

देह से देहरी तक। बस इतनी ही तो सोच है हमारी। और जैसे हम हैं, वैसी ही हमारी दुनिया होगी। नहीं है तो बना देंगे, "भीतर से खोखली"। आज इसी बात पर कुछ अलग अंदाज़ में...

जाने खुद से कब बिछड़ गये
इस क़दर बसे, उजड़ गये

नदी नाले पहाड़ जंगल
प्रगति की भेंट चढ़ गये

विज्ञान के युग में हम तुम
देखो प्रकृति से लड़ गये

चाँद सूरज कहें पृथ्वी से
माँ तेरे मुंडे बिगड़ गये

घर से मकाँ, मकाँ से महल
जाने कैसे इतने बढ़ गये

गाँव से तो आ गये शहर
रास्ते में रिश्ते सड़ गये

बारिश धन की खूब हुई, पर
संवेदना के पत्ते झड़ गये

भूख नहीं यूँ दौड़ाती है
लोभ के कुत्ते पीछे पड़ गये

चाह कर भी लौटें कैसे
पाँव हवस में गहरे गड़ गये

© - प्रशांत सेठ

Saturday, April 25, 2015

आज के भूकंप पर...

शायद फिर कोई धरतीपुत्र तड़पा होगा
भूकंप नहीं था, माँ का दिल धड़का होगा ।

ये तो हुई किसानों के दर्द की बात लेकिन धरती की इस कंपकपाहट में, उन ज़ख्मों का भी हाथ है, जो इंसानों ने प्रगति के नाम पर वसुंधरा को दिये हैं। इंसानी हवस ने पहाड़ खोद दिये, जंगल उजाड़ दिये, जल और वायु को प्रदूषित कर दिया। इसका भुगतान समूचे समाज को करना होगा, विशेषकर आने वाली पीढ़ियों को।

मगर विडम्बना ये है की अपराध कोई करता है, सज़ा किसी को मिलती है। अमीर के अपराध की सजा अक्सर गरीब के हिस्से आती है। अमीर और गरीब में एक फर्क ज़रूर होता है। अमीर की भूख बेहिसाब रहती है और गरीब की भूख हिसाब से रहती है। भूख जब हद से बढ़ जाये तो हवस कहलाती है। और इसी हवस ने दुनिया का मीजान बिगाड़ रखा है। इस पर फिर कभी..

फिलहाल ये पंक्तियाँ समर्पित उन संवेदनशील लोगों को जो नरम मिट्टी से बने हैं, पत्थरों से नहीं...

मिटटी से जो बना हो, वो मकान टूटता है
इस खेल में सच में है जो इंसान, टूटता हैं ।
धरती तो थरथराये,अमीरों की भूख से,पर
मुफ़लिस के सर पे ही ये आसमान टूटता है ।।

© - प्रशांत सेठ

मुफ़लिस = गरीब


Thursday, April 16, 2015

मुट्ठी भर ज़िन्दगी

बड़े भाई सूरज राय "सूरज" जी के जन्मदिन पर कुष्ठ आश्रम में 'तेरा तुझको अर्पण' करने का सौभाग्य इस वर्ष मुझको भी मिला।

भूख, मुफलिसी अपने आप में बड़ा रोग है। उस पर से गलते हुये हाथ पाँव यानी तिल तिल मरना। दुआयें देने के लिये इनके हाथ भले ही सलामत नहीं थे मगर इनके आंसुओं में दर्द भी था और दुआ भी। आज हम लोग वही समेट लाये झोली भर के। जो दे पाये वो बहुत थोडा था और ज़रूरत कहीं ज़्यादा बड़ी थी।

टूटे हुये टपरे में टपकती हुई बूंदों के बीच, सूरज का इंतज़ार (और ज़रूरत) जितना इनको था, उतना शायद किसी और को नहीं होगा। बारिश की बूँदें तो थम जायेंगी मगर आँखों की बरसात कब थमेगी, ये नहीं मालूम। बेबसी और लाचारी के ये आंसू देखकर यूँ लगा जैसे...

भूखों को उम्मीद दो कौर मिल गई
चंद लम्हात की दौलत और मिल गई
कह दो मौत से के ठहरे ज़रा अभी
मुट्ठी भर ज़िन्दगी इन्हें और मिल गई

© - प्रशांत सेठ

Saturday, March 28, 2015

आप तो ऐसे ना थे?

भैया हम तो ऐसे ही थे। मगर आपकी आँखों पर भावुकता का चश्मा चढ़ा था तो इसमें हमारा क्या दोष? आप तब भी नहीं समझे जब हमने कहा की हम आंदोलन से निकले हैं। मैं तो साफ़ बोलता हूँ जी। स्पष्ट कहा था के हम आंदोलन से निकल गये हैं जी। आप को तब ही समझ लेना था की हम राजनीति करेंगे। वही करने आये थे जी। वही कर रहे हैं...खों खों।

आप तब भी नहीं समझे जब हमने आप को टोपी पहना दी। हमें चाहिए स्व-राज। लो मिल गया। अपना राज है जी अब तो। मैं शुरू से कहता रहा हूँ, मैं बहुत छोटा आदमी हूँ जी। आप ही लोगों ने बड़ा कर दिया जी।  हाज़मा भी कमज़ोर है जी। सफलता हज़म करने का वक़्त भी नहीं दिया जी। बेंगलुरु जाऊंगा तो पचा के आऊंगा जी।

लोग कह रहे हैं मैंने उनको "कमीना" कहा। मैंने तो कहा की उनमे कोई "कमी" ना है जी। लोग कह रहे हैं हिंसा हुई है। अब थोड़ी बहुत तो चलती है जी। आप को अहिंसा ही करनी थी तो आंदोलन क्या बुरा था जी। राजनीति में क्यों आये। अब ये भूषण जी और यादव जी चिल्लाते हैं तो चिल्लाने दो जी। ये तो कल की बात हो गए। अन्ना परसों की बात हो गये। और आप की भावनायें? छोड़िये ना, वो तो बरसों पुरानी बात हो गई।

अब ये मत पूछना जी के ये लोग गंदे थे तो अंदर आये कैसे? हम ही लाये थे जी। कीचड साफ़ करनी थी इसलिये कीचड़ मचाना ज़रूरी था जी। लेकिन आप लोग इस प्रशांत सेठ की बातों में मत आना। ये प्रशांत नाम के होते ही ऐसे हैं। ये हमेशा यही कहता है की जो जिस पार्टी में है वो वहाँ का कीचड़ साफ़ करे तब असली सफाई होगी? अब उसको कौन समझाये। हमारा अपना खुद का कीचड़ है जी। दूसरों का साफ़ क्यों करें?

आप तो एक गीत सुनो जी...

"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए..."

रुकिए रुकिए पीर तो पिघल कर बह गई कब की। दूसरा सुनाता हूँ ...

इंसान का इंसान से हो भाईचारा.. खों खों

जाने दीजिये खांसी आ गई। इसलिये फिर कभी। मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है।

तब तक आप सेठ जी के साथ अतीत का सफ़र करिये और पार्टी का विज़न डॉक्यूमेंट पढ़िये। हां सेठ जी की शायिरी ज़रूर सुनते जाइयेगा। सेठ जी को इसके अलावा और आता भी क्या है। बल्कि ये काम भी ठीक से नहीं बनता...

वक़्त के दरिया में बहे ना जाने कितने
साथ हवा के उड़ गये फ़साने कितने

क़ज़ा ले जायेगी साँसों की दौलत ये
गढ़ ले जिंदगी अब चाहे बहाने कितने

आदमियत आदमी में मिलती है कहाँ
गुज़र गये तलाश में यूँ ज़माने कितने

अपने सोचे से यहाँ कुछ होता नहीं
किये मुकम्मल इंतजाम आसमां ने कितने

कदम बढ़ते नहीं मुस्तकबिल से मिलने
हैं याद-ए-माजी तिरे कैदखाने कितने

पंख क्या निकले, वो नशेमन ही छोड़ गये
ये ख्वाब हुये हैं आज फिर बेगाने कितने

सियासत की गंगा साफ़ हो तो हो कैसे
देख लो उतरे हैं आज नहाने कितने

© - प्रशांत सेठ

कज़ा = मौत, मुकम्मल = सम्पूर्ण, मुस्तकबिल = भविष्य, याद-ए-माज़ी = अतीत की यादें, नशेमन = घोंसला