Wednesday, September 23, 2015

चिंतन

दो दिन पूर्व कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास करती हुई एक रचना पोस्ट की थी। तबसे अद्भुत अनुभव और प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हो रही हैं। रचना नितांत भावनात्मक है और एक पक्षीय चिंतन है। विशेषकर उस पराजित पक्ष का जिसे अक्सर विजय के दंभ में चिंतन के योग्य भी नहीं समझा जाता।

प्रतिक्रियाएं तो सभी प्रेरक हैं परंतु कुछ एक मश्तिष्कवादियों ने स्वयं को कर्ण और अर्जुन की तुलना में उलझा लिया। किसी ने सही गलत का फैसला सुना दिया तो किसी ने असहमति प्रदान कर दी। एक सज्जन ने तो सहानुभूति प्राप्त करने का तरीका ही कह दिया। मुझे समझ में नहीं आया की इस युग में बेचारे कर्ण को किसी की सहानुभूति से या सहमति से क्या लेना देना। एक सज्जन ने तो बर्बरीक के कथन को अंतिम सत्य कह के चिंतन पर ही विराम लगा दिया।

एक बार फिर स्पष्ट कर दूं, यह रचना केवल और केवल कर्ण के दृष्टिकोण और मनोभावों को व्यक्त करने का प्रयास भर है। उसके पक्ष को उचित ठहराने का कोई उद्देश्य नहीं है। बेचारा कर्ण आज फिर निहत्था था और विद्वानों के पूर्वाग्रह ने उसे मृत्युदंड दे दिया।

भावों के समंदर में उतरे बिना उसकी गहराई का माप बताने वालों को मैं यह बात अवश्य कहना चाहता हूँ कि...

"केवल अध्ययन से ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके साथ साथ चिंतन मनन ना हो तो नवीन विचारों की उत्पत्ति संभव नहीं है।"

एक छोटी सी रचना के माध्यम से मेरी बात..

चिंतन

कितना भी गहरा हो किन्तु
जो ठहर गया वो खारा है
चिंतन में प्रवाह हो सतत्
ज्ञान तो बहती धारा है

प्रश्न कर्ण है ना अर्जुन ही
वो सब उत्तर पा गए हैं
प्रश्न है अपनी जिज्ञासा का
हम कहाँ तक आ गए हैं?

विशिष्ट विचार बोध केवल
अहंकार है, भ्रम मात्र हैं
तर्क वितर्क में ज्ञानी उलझें
जिज्ञासा तो सदैव छात्र है

विजयी लिखते इतिहास सदा
पराजित सहता उपहास है
जय पराजय सब क्षणभंगुर
कालचक्र में विलुप्त श्वांस है

धर्म की सदा विजय होती या
विजयी कथन ही धर्मशास्त्र है
इस पर भी चिंतन करने की
समग्र दृष्टि किसके पास है?

कहें बर्बरीक, देव या यम
या कहते हों कृष्ण स्वयं
सत्य अन्वेषण धर्म यही है
चिंतन प्रवाह ना जाये थम

© - प्रशांत सेठ

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