Monday, September 21, 2015

कर्ण

जीवन में अक्सर उन लोगों को पिछड़ते देखा है जो नैतिकता और सिद्धांतो को ज़्यादा महत्त्व देते हैं, संबंधों को निभाते हैं, भावनाओं को जीते हैं। जो इन्हें त्याग देते हैं, वो आगे बढ़ जाते हैं। यह सफलता (केवल भौतिक) प्राप्त करने का मन्त्र आज भी है, कल भी था और शायद कल भी रहेगा।

समाज के इस चेहरे को दर्शाने के लिए उस युग का केवल सन्दर्भ लिया है। कर्ण और अर्जुन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों अपनी अपनी जगह सफल हैं और अपने अपने दृष्टिकोण से संतुष्ट भी। फर्क है तो दोनों की दृष्टि में सफलता के अर्थ का। एक जीने के लिए रिश्तों को त्याग रहा है; दूसरा रिश्तों के लिए जीवन को। लेकिन एक कड़वा सच ये भी है की सांसारिक दृष्टि में सफल तो अर्जुन को ही माना जाता है।

आज के युग के सफल अर्जुनों को नमन करते हुये एक नवीन दृष्टिकोण केवल भावुक लोगों के लिए। एक आवश्यक बात और। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है की जब बात देश, समाज, धर्म और सत्य की हो तब ऐसी निजी भावुकता को त्याग देना चाहिए। संभवतः उस युग के कर्ण की पराजय इसलिए आवश्यक भी थी और हुई भी।

निवेदन: यह रचना कर्ण और अर्जुन के चरित्र का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है, केवल कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है। इतिहास साक्षी है की पराजित वर्ग के विचारों को, भावनाओं को अधिकांश लोग चिंतन में स्थान नहीं देते। मेरी इस धृष्टता को क्षमा करें।

कर्ण

पार्थ, तुम सफल हो, सबल हो, समर्थ हो
धर्म का पर्याय तुम, आज तुम ही अर्थ हो
युगों युगों तक तुम्हारा यशोगान होना है
मैं तो कर्ण हूँ, पराजय ही मेरे नाम होना है

कौशल में कहो, कहाँ तुमसे मैं कम हूँ
किन्तु पराजित हूँ आज और अक्षम हूँ
सच तो यह है, अपने भाग्य का मैंने ही हरण किया है
मैंने स्वयं ही बढ़कर पराजय का वरण किया है

अपनी ही सेना का भक्षक, फिर भी परमार्थी
मैंने चाहा ही नहीं ऐसा धर्मरथ, ऐसा सारथी
मित्र से घात, ये मेरा संस्कार नहीं है
जीवन का ये मूल्य, मुझे स्वीकार नहीं है

होकर भी नहीं रहा अपनी माता की संतान
मैं जानता हूँ रिश्तों की कीमत, उनका मान
अभिमन्यु, घटोत्कच के शवों पर विजय गान
मैं नहीं ले सकता स्वार्थ के लिये, पुत्रों का बलिदान

चढ़कर एकलव्य के अंगुष्ठ सोपान पे
या फिर रथ पर मिथ्या अभिमान के
विजयश्री आई है तुम्हारे पास चलकर
किन्तु कीमत पर निज आत्मसम्मान के

मैं निष्प्राण होकर भी जीवित स्वाभिमान हूँ
मैं नहीं कपटपूर्ण कवच कुंडल का दान हूँ
शस्त्रविहीन, उसपर मर्यादाओं में कसा हुआ
हाँ, मैं रथ का पहिया हूँ, धरती में धंसा हुआ

लिया नहीं छल असत्य का सहारा
मैंने किसी अश्वत्थामा को नहीं मारा
इस दृष्टि से भी देखो अर्जुन, ये चित्र है तुम्हारा
मैं कर्ण हूँ, जो हारकर भी नहीं हारा

मैं केवल अग्नि नहीं, जल भी हूँ, समीर भी
मैं क्षत्रिय वीर हूँ, सूतपुत्र भी, दानवीर भी
मैं जीवन मूल्यों का सदा ही मान करता हूँ
इसलिए, ऐसी विजय मैं तुम्हे दान करता हूँ

भेद सकता है लक्ष्य को तुम्हारा हर तीर
दांव पर लगा सकते हो तुम द्रौपदी का चीर
सफल रहते हैं कदाचित, तुम जैसे ही संसार में
भावनाओं से शून्य लोग, स्वार्थ के प्रति गंभीर

अर्जुन, तुमने सदा चिड़िया की आँख देखी है
और मैंने चिड़िया की आँखों में दर्द देखा है
मेरी पराजय और तुम्हारी अपराजय के बीच
भावुकता की यही एक महीन सी रेखा है

© - प्रशांत सेठ

4 comments:

  1. http://rahul4440.blogspot.in/2015/09/blog-post_21.html

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  2. क्या बात है प्रशांत जी ! ह्रदय को छू गयी आपकी रचना ! ऐसा प्रतीत हुआ कि हमारे कुछ भावों को आपने अभिव्यक्ति दे दी ! आभार ! शुक्रिया ! बधाई !!

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