श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें
परिभाषा किसी भी रिश्ते को बाँध देती है, शर्तों में। प्रत्येक सम्बन्ध किसी ना किसी अपेक्षा के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। परिभाषित रिश्तों में एक दूरी भी होती है। लेकिन एक रिश्ता है जहाँ कोई परदा नहीं होता। जो अनंत है और शाश्वत है।
अपेक्षा रहित सच्ची मित्रता ईश्वर का ही तो दर्शन है। मित्र में ईश्वर और ईश्वर में मित्र को महसूस करती हुई और इच्छाओं और अपेक्षाओं के कारावास से निकालकर, उसको ह्रदय के गोकुल में ले जाने का प्रयास करती हुई एक रचना ....
एक प्रश्न का लेकर के बोझ
मेरा मन भटकता है रोज
शायद आज पूर्ण हो जाये
उस शाश्वत रिश्ते की खोज
ना निर्मित का निर्माता से
ना पुत्र का जैसे माता से
इन रिश्तों में एक दूरी है
दूरियां कैसी विधाता से?
हर रिश्ते में है शर्त कड़ी
मर्यादा की दीवार बड़ी
और मुझे स्वीकार नहीं है
ये बंधनयुक्त जकड़ा जकड़ी
फिर.....
क्या भक्ति ही एक संबंध है?
या वो भी सिर्फ अनुबंध है?
तुम्हारे गुणों के गान में
मुक्ति का ये कैसा प्रबंध है?
भय है, ज्ञान है, जिज्ञासा है
या फिर कोई अभिलाषा है
इस युग में तुम्हारी भक्ति की
सबकी अपनी परिभाषा है
कुछ रस्मों का संधारण है
या फिर दुखों का निवारण है
मैंने अपनी भक्ति में देखा
स्वार्थ ही एकमात्र कारण है
तुम्हारी हर इच्छा अव्यक्त है
और मेरा सब कुछ व्यक्त है
इसी अपूर्ण रिश्ते का नाम
क्या भगवान है और भक्त है?
नहीं....
भक्ति का एक और रूप है
ना परिभाषित ना कुरूप है
सुन्दर सा एक रिश्ता है जो
निश्छल प्रेम का स्वरुप है
इस रिश्ते में शर्त नहीं है
स्वार्थ की कहीं पर्त नहीं है
यही इसकी सुंदरता है कि
छुपा हुआ कोई अर्थ नहीं है
जैसे....
ब्रजबाला का नन्दलाल से
या गऊओं का गोपाल से
मुरली का जैसे तुम्हारी
श्वांसों के सुर और ताल से
तो फिर....
सम्बन्ध हो मित्र सुदामा सा
या फिर ऊधव श्रीदामा सा
अव्यक्त होकर भी व्यक्त हो तुम
जिधर प्रेम हो सखी राधा सा
© - प्रशांत सेठ
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