ह्रदय भाव लहरों सी
धूप सर्द दोपहरों सी
मन दर्पण में छवि अपनी
फिर भी लगती गैरों सी
कविता चित्त के चेहरों सी
ह्रदय ह्रदय बहती जाये
करुणा की फसल उगाये
मन के तटबंध तोड़ चल दे
जो बरसाती नहरों सी
कविता सरित लहरों सी
हाय पैसा हाय पैसा
जीवन ऊँची बिल्डिंग जैसा
इनके बीच ऊग आती ज्यों
झोपड़ पट्टी शहरों सी
कविता गाँव के चेहरों सी
मन पंछी सी आतुरता
विस्तृत नभ सी व्यापकता
सपनों को पंख लगे पर
यथार्थ बेड़ियाँ पैरों की
कविता गूंगे बहरों सी
काव्य रंग में कितना रंगें
मन की ये अल्हड़ उमंगें
वो जैसे बेपरवाह जवानी
कविता सयाने पहरों सी
कविता बुजुर्ग महरों सी
© - प्रशांत सेठ
महर = पूज्य और श्रेष्ठ व्यक्ति