Wednesday, October 28, 2020

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

प्रकृति के गर्भ में अपने जन्म की प्रतीक्षा में एक चिरपंथी की प्रार्थना ...

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

चलता रहा युगों से पर अब
रहा समर्थ ना चल पाने को
किसी वृक्ष की घनी छाँव में
ठहर गया तब सुस्ताने को

थकी देह कुछ क्षण बैठी पर
मन का पथिक नहीं रुक पाया 
हे माँ! तेरे गर्भ में फिर से
यह चिर पंथी वापिस आया 

सौंप पिता की गोद में मुझको
जिस क्षण तू मुस्काई थी
अमर सनातन जीव को फिर से
देह नयी मिल पाई थी

यही अधूरापन ही मुझको 
फिर फिर दुनिया में लाया है
देह शेष, निःशेष कामना
जननी! ये कैसी माया है?

सोच रहा यह पथिक आज फिर,
बैठा बोध वृक्ष की छाँव
युगों युगों तक चलते चलते
थके नहीं इस मन के पाँव

गंतव्य क्या? अभी तो सच्चा
पथ ही नहीं दृष्टि में आया 
पितृ मिलन की व्याकुलता में
क्षीण हुई अब फिर से काया 

धारण किया गर्भ में प्रकृति
ने स्वरूप जो मानव तन का
सुप्त पड़ा क्यों मोह पाश में
अंश हूँ मैं ही जब चेतन का

कितने पथिक गए इस पथ से
विरला कोई समझ पाया है
मातृ कृपा बिन कब कब किसने
यहाँ शाश्वत जन्म पाया है

अपूर्णता को पूर्ण बना
अब अंश पुरुष का लौटा दे
परम पिता की गोद मुझे दे
प्रकृति तू फिर मुस्कुरा दे

मैंने चिरकाल से जागृत
शिव को प्रतीक्षित पाया है
हे आदिशक्ति! हे जगजननी, तू
जन्मदात्री महामाया है

© - प्रशांत सेठ



Tuesday, October 27, 2020

दृष्टा

मैंने पढ़ा था कभी,
प्रकाश की किरण 
करती है गमन सीधी रेखा में  
और बदल लेती है कोण
एक माध्यम से दूसरे माध्यम तक जाते जाते,
घनत्व में भेद के प्रभाव से

बहुत तो नहीं, 
किंतु समझ ली थी बचपन में ही
यह छोटी सी बात
कि
किसी वस्तु को जानने के लिए
देखना पड़ता है, 
उसे भिन्न कोणों से
समग्र दृष्टि से

आज भी
विषय वस्तु पर पड़ने वाले
अलग अलग दृष्टिकोण को
देख लेता हूँ मैं,
चैनल बदल बदल कर

मुझे पता है
मसले क्यों बदल लेते हैं कोण 
सोशल मीडिया पर
एक प्रोफाइल से दूसरी प्रोफाइल तक

मैं जानता हूँ
तुम्हारे ज्ञान का आधार है
तुम्हारी बुद्धि में "ग्रे मैटर" का घनत्व
जितना अधिक घनत्व
उतना ट्विस्टेड सत्य

तभी तो बहुत से बुद्धि-जीभी
ज़िंदगी जी नहीं पाते
चल देते हैं उम्र गुज़ारकर
अनुभव के नाम पर, 
दृष्टिकोण में उलझकर
और अक्सर, 
पीढ़ियों को उलझाकर
किसी नए "वाद" में

© - प्रशांत सेठ







Tuesday, October 6, 2020

सॉरी बापू

जमूरे!!
बुरा मत देखो
बुरा मत सुनो
बुरा मत बोलो

और मैंने मूंद ली आंखें
बंद कर लिए कान
सी लिया अपने होठों को
मेरे आस पास चुपचाप
वो पैर पसारती रही ...

जमूरे!!
जब तक मैं ना कहूँ
आँख मत खोलना
बाहर बहुत बुराई है
अपने भीतर उतर जा,
समाधि लगा ले, संत बन जायेगा

मगर एक दिन
आँख खुलनी थी, सो खुल गई
मैंने पूछा उससे
तू यहाँ कैसे, मेरे बापू के हिंदुस्तान में?
हंसकर बोली, अपने बापू ने कब कहा?
"बुरा मत करो"

अब मैं, बुरा देख लेता हूँ
बुरा सुन भी लेता हूँ
सच पूछो तो, बुरा सूंघ भी लेता हूँ
और बुरा बोलने लगा हूँ उसे
मेरे आसपास फटकने से पहले
दस बार सोचती होगी वो, क्योंकि
मैं बुरा लगने लगा हूँ अब
खुद बुराई को ही

क्षमा करना बापू
मैंने सीख लिया है,
चरखे के साथ साथ, लाठी चलाना
और हाँ!
चलाने लगा हूँ थोड़ा थोड़ा
स्कूल की किताबों से परे
अपना दिमाग भी

सॉरी बापू
तुम्हारा जमूरा शायद
सचमुच भीतर उतरने लगा है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, August 18, 2020

बृजबाला

सब कुछ नहीं होता शब्दों से
परिभाषित
शुद्ध प्रेम में नहीं होता संसार
अभिलाषित

संसार की व्यवहारिकता से परे
गोपियों के निश्छल प्रेम की तरह
भाव समक्ष मूक हो जाती हैं
समस्त भाषाएं

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 17, 2020

शबरी

सब कुछ देखा नहीं जा सकता
इन आँखों से
सब कुछ सुना नहीं जा सकता
इन कानों से

बुद्धि की असहजता से बहुत दूर
शबरी के जूठे बेरों की तरह
भक्त और भगवान का सहज प्रेम
विषय है केवल अनुभूति का

© - प्रशांत सेठ




Sunday, August 9, 2020

मैं बैरी सुग्रीव पियारा?

 कई शताब्दियों के वनवास के पश्चात और तमाम आसुरी प्रवृत्तियों को परास्त कर अंततः प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए हैं। बाली का आहत हुआ अहंकार आज भी मन ही मन फिर वही प्रश्न कर रहा होगा। परंतु श्रीराम का उत्तर तो हर युग में वही होगा, क्योंकि सत्य तो कहा ही उसको जाता है, जो किसी भी देश काल परिस्थिति में अपरिवर्तनीय है।


मैं बैरी सुग्रीव प्यारा?

भेद ये मन का, खेल है सारा ।
जिसने सत्य को ना स्वीकारा ।
वरना निश्छल हृदय से मेरे,
बाली कभी नहीं था न्यारा ।

अपने भीतर मेरे अंश का,
तुमने तिरस्कार किया है ।
सब में भी अस्तित्व मेरा,
पर तुमने कब स्वीकार किया है ।

लघुता को अपने अंतस में,
जब भी अंगीकार किया है ।
अहंकार ने शत्रु रूप ही,
प्रभुता का स्वीकार किया है ।

मन की भ्रामक दृष्टि केवल,
निज स्वभाव का है विस्तार ।
त्याग सत्य को गढ़ा है तुमने,
कल्पनाओं का यह संसार ।

खुद से तुमने कब पूछा है,
क्यों दृष्टा का भाव नहीं है?
युग युग से क्यों निज दृष्टि में,
समग्रता का प्रभाव नहीं है?

चिंतन पर मकड़ी के जाले,
वहम रूप क्यों तुमने पाले ।
बोध वहां तक पहुंचे कैसे,
पड़े दृष्टि पर अहम के ताले ।

अनुभव रूप चित्त की वृत्ति,
ज्ञान रहित अनुभूति मन में ।
जन्म जन्म से संचित प्रारब्ध,
स्मृति शेष उस अवचेतन में ।

आत्म तत्व के रूप में मैं ही,
सदा सत्य का रहा हूँ प्रहरी ।
मन विकार का तभी तो बाली, 
युगों युगों से मैं हूँ बैरी ।

भाव समक्ष जब मन का बाली,
शस्त्र अहम के तज पाएगा ।
बोध स्वरूप तभी जीवन में,
सदा मित्र बन राम आएगा ।

तुम भी प्रिय ज्यों अनुज तुम्हारा,
तुमको मैं नहीं, "मैं" ने मारा ।
फिर ना कहना कभी भूल से,
मैं बैरी सुग्रीव पियारा ।

© - प्रशांत सेठ


Friday, July 31, 2020

काव्यमदूत - आह-कवि जालीदासों को समर्पित

"यमपुरी में नए यमदूतों की आवश्यकता
केवल कवियों को ही प्राथमिकता"

अखबार में ये विज्ञापन पढ़कर मैं चौंका
ये सत्य है या केवल आँखों का धोखा?
मैंने आंखों को मला, फिर से पढ़ा, यही सच था
आगे जो लिखा था वो और भी "टू मच" था

मृत्युलोक से यमलोक की 86000 योजन की दूरी है
और लंबी यात्रा में मनोरंजन भी जरूरी है
छोड़ो सारे किंतु, परंतु, अगर, मगर, पर
बेरोजगारी के दौर में नहीं मिलेगा ये अवसर
इसलिए आज ही ऑनलाइन अप्लाई कीजिये
योग्यता कोई नहीं, बस कवि होने का प्रमाण दीजिये

मैंने श्रीमती जी को आवाज़ लगाई
भाग्यवान, क्या मैं भी आएं बाएं अल्लम गल्लम बकता हूँ?
बताओ क्या मैं भी आधुनिक काल का कवि लगता हूँ?
उनकी सहमति पाकर मेरा कॉन्फिडेंस जागा
और मैं मनीष तिवारी जी के घर की ओर भागा
अपनी भड़ास का ये जो नित्य वमन करते हो
सुना है तुम भी ऑनलाइन कविता पढ़ते हो
एक से भले दो होते हैं, ये बात बुजुर्ग बताते हैं
चलो हम दोनों मिलकर ये दायित्व उठाते हैं

अगले ही दिन हम इंटरव्यू की लाइन में खड़े थे
देखा तो वहां बड़े बड़े दिग्गज पहले से पड़े थे

चित्रगुप्त बता रहे थे कि
कोरोना के कारण यमपुरी में फुल हैं समस्त सीटें
समझ में नहीं आ रहा अब पापियों का कहाँ पीटें
हम लोगों ने नरक की एजुकेशन पॉलिसी में चेंज किया है
और ये आईडिया हमने भारत के शिक्षा मंत्री से एक्सचेंज किया है
अब नरकगामियों की यात्रा को यंत्रणा बनाना है
इसलिए तुम कवियों को यमदूत की ड्यूटी निभाना है

हमने कहा हुजूर आप चिंता मत कीजिये
एक बार सेवा का यह अवसर तो दीजिये
यम-योग्य कवि लेखक तो हिंदुस्तान में सर्वत्र हैं
लेकिन हमारे पास कई संस्थाओं के सम्मान पत्र हैं
मंचों पर निकाली हमेशा भड़ास और खीज है
जिंदों को सताया है, ये मृतक क्या चीज है

हमारी कविताएं सुन सुनके आत्माएं घायल हैं
यहाँ सभी चित्रगुप्त के मैनेजमेंट के कायल हैं
एक्सपर्ट्स का कहना है, नए यमदूत बहुत होनहार हैं 
गुप्ताजी की हो रही जय जयकार है 
सारी यमपुरी में हमारी भूरी भूरी प्रशंसा है
हमारी नियुक्ति में यमराज की अनुशंसा है 

लोग कह रहे हैं
आपने साहित्यकारों को नहीं, सही-हत्याकारों को चुना है
बाकी सब तो थोथा चना बाजे घना हैं
इनके हत्थे जो भी चढ़ेगा, स्वर्ग का पात्र हो जाएगा
अपने पापों के लिए वो हज़ार बार पछतायेगा
इस जनम की छोड़िए, अगले जन्म की एडवांस सजा पायेगा
क्योंकि यहां तक आते आते वो कई बार मर जायेगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 21, 2020

मैं अज्ञानी अधजल गागर - गुरु प्रार्थना

मैं अज्ञानी अधजल गागर
गुरुवर तुम हो ज्ञान का सागर
धन्य जीवन है तुमको पाकर
श्री चरणों की शरण में आकर

ज्ञान दीप हृदय में जलाकर
दृष्टि दो अंधकार मिटाकर
तुम से आलोकित है ये जीवन
सूर्य से जैसे रहता सुधाकर

घट श्वासों का रीत रहा है
राह दुर्गम है थाम लो आकर
तृष्णा में संसार की डूबे
मेरे मन को उबारो प्रभाकर

ध्येय तुम हो और मार्ग भी तुम
तुम ही नैया हो तुम ही सागर
जो डूबा वो पार हुआ है
स्नेह सिंधु में डुबकी लगाकर

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 19, 2020

हम बहुत याद आएंगे

शौर्य पथ पर बलिदानों की
गाथा हम लिख जाएंगे
तुम्हारे नयन अश्रु भी तब
श्रद्धा सुमन बन जाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

सर उठाकर जीने की भी
शर्त यही बतलाते थे
हमसे पहले जो गए वो
गीत यही तो गाते थे

यह पथ है स्वाभिमान का
यहां पर सर कट जाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

भारी उनकी संगीनों पे
फौलादी ये सीना था
तुम्हें अमृत पिलाने को
हमको विष तो पीना था

घाव वीरों की छाती के
पुष्प को भी लजाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

नहीं सिर्फ सीमा के रक्षक
स्वप्नों के रखवाले हैं
जल गई दीपक की बाती
तभी तो ये उजाले हैं

ओस की बूंदें बनकर हम
सुबह सुबह जब आएंगे ...
हम बहुत याद आएंगे

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, May 13, 2020

कुकुरतंत्र

किसी पद विहीन नेता की तरह आवारा घूमते उस कुत्ते पर मुझे तरस आ गया। सभी जीवों में ब्रह्म की उपस्थिति की बात मुझे धार्मिक चिंतन की घुट्टी में जन्म से ही पिलाई गई थी। ये अलग बात है कि विषधरों के ब्रह्मतत्त्व को स्थूल दृष्टि से देख पाना बहुत कठिन जानकर, मैंने ब्रह्म को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाना ही हमेशा श्रेयस्कर समझा था। मगर उस आवारा कुत्ते की निरीह आँखों में से शायद उसके ब्रह्म ने ही मेरे भीतर के ब्रह्म को कॉल किया होगा। तभी तो सनातनी दया भाव ने जोर मारा।

मैंने श्रीमतीजी को आवाज़ लगाई और निवेदन किया कि मेरे और अपने हिस्से का एक एक वोट इसको दे देते हैं। माफ कीजिये वोट नहीं, रोटी कहना चाहता था मगर लॉक डाउन में सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने का परिणाम है कि बुद्धि में राजनीति के विषाणु प्रवेश कर गए हैं। श्रीमतीजी भी मेरी तरह से सनातनी परंपरा से हैं, मगर है तो पत्नी ही। इसलिए थोड़े बहुत औपचारिक ना-नुकुर के बाद मान गईं। हालांकि उन्होंने मुझे चेताया भी कि अब ये रोज़ आने लगेगा।

मैंने सुना है कि पत्नी की बात को ब्रह्माजी भी नहीं काट सकते, लिहाजा वही हुआ जो भविष्यवाणी उन्होंने कर दी थी। अब वह कुकुर कुलदीपक अपने हिस्से की मुफ्त की सब्सिडी लेने रोज आने लगा था। उसके लिए अब चार रोटी सुबह शाम मेरे गाढ़े पसीने की कमाई में से बनने लगी थीं। यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ के समस्त आवश्यक वस्तुओं को क्रय करते समय दिए गए GST के अलावा आयकर, गृहकर, जल कर, इत्यादि देने के पश्चात भी यदि आपके बटुए में कुछ बच पाता है, तो उसे ही शास्त्रों में गाढ़े पसीने की कमाई कहा गया है। यदि आपके बटुए के भाग्य में यह सुख नहीं है तो आपकी संतुष्टि के लिए ही भगवद गीता में यह श्लोक कहा गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकमज़्णि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर अधिकार पहले देश की सरकार का है, उसके पश्चात ईश्वर नाम की किसी बड़ी सरकार का।

कुछ ही सप्ताह में स्थिति यह थी कि सब्सिडी, क्षमा कीजियेगा, रोटी मिलने में विलंब उसे बर्दाश्त नहीं था। और अब उसने स्थायी डेरा मेरे घर के द्वार पर बना लिया था। उसको देख देख कर मेरे पालक होने के अहंकार को तृप्ति भी मिल रही थी।

यह सच है कि सृष्टि में स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ भी सृष्टा ने रची थी। संभवतः उसी की वजह से कभी कभी कर्तव्यबोध भी जागता है। वरना इस देश में जीने के लिए अधिकार बोध का होना ही पर्याप्त है। कदाचित ऐसी ही कोई क्रांति उस कुकुर कुलदीपक के जीवन में घटी हो। कर्तव्यबोध के चलते उसने हर राह चलते व्यक्ति से अपनी प्रकृति जन्य वाणी और मातृभाषा में वार्तालाप शुरू कर दिया था। पड़ोसियों ने उक्त कृत्य को "भौंकने" का नाम दिया था।

शीघ्र ही पड़ोस के वकील साहब के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय डेलीगेशन आपत्ति लेकर मुझसे मिलने आया। मैंने उन्हें अवगत कराया कि मेरे घर की रक्षा के तहत भौंकने का अधिकार इसको संविधान देता है। उन्होंने मुझे इतिहास दर्शन के माध्यम से समझाया कि अक्सर संविधान की छोटी सी चूक से राष्ट्रों के भूगोल बिगड़ जाया करते हैं। इसलिए आप अपनी इस सैन्य शक्ति को लाइन ऑफ कंट्रोल के अंदर रख लीजिए, यही आपके लोकतंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। प्रेम की अपेक्षा तर्कसंगत बात व्यक्ति को जल्दी समझ में आती है। लिहाजा सबकी राय से मैंने उसे अपनी घर की संसद में एक बोरी बिछाकर उचित स्थान दे दिया। अब वह हमारा निर्वाचित प्रतिनिधि बन चुका था और भौंकलाहट का लोकतांत्रिक अधिकार उसे प्राप्त हो गया था।

वकील साहब अनुभवी व्यक्ति थे। एक दिन उन्होंने कहा सेठजी, आप इसको समय समय पर बांध कर भी रखा कीजिये, क्योंकि यह मित्र और शत्रु के भेद को नहीं समझता है। यह आपके हर मित्र को और उसके प्रत्येक कृत्य को भी शक की दृष्टि से ही देखेगा। किसी दिन काट भी सकता है, यही इसका धर्म है। आपके यहाँ इसकी अराजकता के चलते फॉरेन इन्वेस्टर तो छोड़िए, आपके अपने मित्र भी आने से कतराने लगेंगे। और तो और कहीं इसके मित्र-मित्राणियों ने आना शुरू कर दिया तो जनसंख्या बढ़ते देर नहीं लगेगी। तब इतनी सी सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। अतः आप कोई पार्ट टाइम काम भी बढ़ा लीजिए। वरना आपकी अर्थव्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगेगी और घर का सारा लोकतंत्र ढह जाएगा।

मैं वकील साहब की अनुभवी दृष्टि का कायल हो गया था। मैंने उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया कि जब आपने इतना किया है तो एक कृपा और कर दीजिये। अब आप ही इसका नामकरण भी कर दीजिए। उन्होंने कहा कि इस कुकुर कुलदीपक के स्वभाव को देखते हुए मैं ये जानता हूँ कि, अपने कुत्तत्व के अहम की संतुष्टि के लिए और कर्तव्यबोध के दबाव में, इसकी कार्यप्रणाली तो बदलने से रही। यह समय समय पर आपकी शांति भंग करके, अपने जीवित होने का प्रमाण देता रहेगा।  आपकी अर्थव्यवस्था और संवैधानिक निर्णयों में इसका योगदान केवल गति अवरोधक का होगा। हो सकता है कि जब आप किसी समस्या से जूझ रहे हों, उसी समय इसका कर्तव्यबोध प्रबल हो। देखने वालों को प्रतीत होगा कि यह पूरी निष्ठा के साथ आपके लोकतंत्र की रक्षा कर रहा है, परंतु इसे स्वयं यह ज्ञान भी नहीं होगा कि वह हित कर रहा है या अहित। इन सारे गुणों को देखते हुए इसका एक ही नाम मुझे उचित प्रतीत होता है "विपक्ष"।

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 11, 2020

माँ तुझे सलाम

सर पर उम्मीदों का सूरज
अधरों पर खिलती मुस्कान
देखो हाथ थामे कल का
तनकर चल रहा वर्तमान

अभावों की इस टोकरी में
शेष बहुत से सपने हैं
बांध लिए आँचल में उसने
भाव हृदय में जितने हैं

हंसती है लाली चेहरे की
राह की उड़ती धूल पे
रीझ गई है खुद ही डाली
अपने खिले फूल पे

दुनिया भर के अवरोधों से
राह ना उसकी रुक पाएगी
देखना इसके सपनों को
एक दिन मंज़िल मिल जाएगी

वो जननी है उसके आगे
आसमान भी झुक जाते हैं
एक दिवस उमड़ी श्रद्धा से
ऋण नहीं ये चुक पाते हैं

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, May 6, 2020

मद्य-प्रीति

डेढ़ माह का संयम आखिर
एक तलब में टूट गया
मदिरा के प्रिय आकर्षण में
राष्ट्र का वंदन छूट गया

अर्थशास्त्र ने पांसे फेके
धर्म द्यूत पे वार गए
अपनों के प्रति निष्ठारत थे
लेकिन संयम हार गए?

निष्फल हुई राम कथाएं
मर्यादा के पाठ भुलाए
मद्य की लहरों में हाये
गीता के सब श्लोक बहाए

रोक ना पाई ममता तुमको
ना रसोई की ही पुकार
ऐसे बंधन तोड़ के भागे
धन्य हो तुम हे पालनहार

पल भर का जो होश मिले तो
सोचो किस पथ चलते हो?
संस्कार अपने ही तजकर
भला किसे तुम छलते हो?

किए सदा अर्थ को अर्पित
तुमने जीवन मूल्य सभी
राजधर्म से चूके तुम भी
हे कौटिल्य के स्वप्न ऋषि

तुम्हें राष्ट्र का रथ सौंपा है
सारथी धर्म निभा पाओगे?
सिद्धांतों को ऐसे तज कर
विश्वगुरु की विभा पाओगे?

स्वप्न राष्ट्र गौरव के जिसके
सदा नेत्र में पलते हैं
सुनो सारथी, वर्तमान क्या
युग उसके पीछे चलते हैं

© - प्रशांत सेठ

Monday, April 27, 2020

बुद्धम शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।

बुद्धम शरणं गच्छामि - आध्यात्मिकता
धम्मं शरणं गच्छामि - धार्मिकता
संघं शरणं गच्छामि - साम्प्रदायिकता

लेख लंबा है परंतु आज के समय मे व्याप्त आध्यात्मिकता/धार्मिकता/साम्प्रदायिकता के भ्रम को चिह्नित करने का प्रयास है। इस लेख का संबंध लेखक के ज्ञानी अथवा आध्यात्मिक होने से ना जोड़ा जाए, क्योंकि यह अनेक विद्वजनों और मनीषियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर है।

1. आध्यात्मिकता - बुद्धम शरणं गच्छामि

अध्यात्म आपके भीतर का जगत है और आध्यात्मिकता इसी अंतर्जगत की यात्रा का नाम है। आध्यात्मिकता वही है जो बुद्ध को विलास के महलों की परिधि से दूर दुर्गम वन की ओर ले जाती है। इस ज्ञान यात्रा का लक्ष्य उस सत्य की खोज है जो खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। कोई इसे आत्मतत्व के बोध की, तो कोई नश्वर-अनश्वर के भेद की तो कोई ईश्वरीय स्वरूप को जानने की यात्रा कहता है। अतः बंद आँखों से ध्यानावस्था में बैठकर ज्ञान की प्राप्ति और अपने स्वरूप का बोध आध्यात्मिक व्यक्ति का लक्ष्य होता है। अपनी पहचान से पलायन करने को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं कहते। बल्कि अपनी छोटी सी पहचान को उस विराट में समाहित करने का नाम आध्यात्मिकता है। यदि सांसारिक पहचान मिट गई है तो द्वंद भी समाप्त हो गया होगा, और यदि जीवन में द्वंद शेष है तो अभी आध्यात्मिकता अपूर्ण है।आध्यात्मिक व्यक्ति का ना कोई मित्र होता है ना शत्रु। ज्ञान ही मित्र है और अज्ञान ही उसका शत्रु है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपूर्ण आध्यात्मिक व्यक्ति आँख खोलता है और सामने यथार्थ को खड़ा पाता है। ज्ञान को उपलब्ध होकर जो कुछ नश्वर या अज्ञान के रूप में जाना, वही सामने संसार बनके खड़ा है। यहाँ इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है वह आपकी अंतर्दृष्टि में है, बाहर जगत में नहीं। बाह्य जगत को आपके भीतरी परिवर्तन और ज्ञान से क्या सरोकार? मात्र अपने अज्ञान का नाश कर लेना, किसी अन्य पर कोई उपकार नहीं है। यह कर्म का जगत है और प्राप्त ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कर्म के रूप में सबके लाभ का विषय बने। यहीं से धर्म की उत्पत्ति होती है।

2. धार्मिकता - धम्मं शरणं गच्छामि
इस संसार के प्रति आपके कर्तव्य का नाम ही धर्म है; जैसे कि एक पिता, पति अथवा पुत्र के रूप में पारिवारिक धर्म, या जीविकोपार्जन के लिए व्यावसायिक धर्म, समाज के प्रति सामाजिक धर्म, राष्ट्रीय धर्म या प्रकृति के प्रति प्राकृतिक (मानव) धर्म। वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति अपने समक्ष अनेक अज्ञानियों को भी पाता है तो घृणा नहीं, सहानुभूति रखता है। यदि वास्तव में थोड़ा बहुत भी बोध जागा होगा तो इस सत्य से भली भांति परिचित होगा कि अज्ञानियों में भी उसी का अंश है, जिस चेतना अथवा आत्मा का दर्शन उसने अपने भीतर किया है। और इस बात की भी स्वीकृति होगी कि बोध होने से पहले वह स्वयं भी अज्ञानी ही था। ऐसे में एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति, अत्यंत धैर्य के साथ सामाजिक चेतना के उत्थान हेतु कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। तब धर्म ही बुद्ध को सघन वन से लौटाकर समाज में वापस ले आता है; जो कुछ पाया है, उसको बांटने। अतः भीतर से वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति आपको कार्मिक रूप से धार्मिक प्रतीत होता है।

कर्म के द्वारा जब सामाजिक चेतना को जागृत करने कोई तत्वज्ञानी प्रवृत्त होता है तो निश्चित रूप से उसका सामना अज्ञान के वशीभूत, लोभ, भय और मोह से ग्रस्त, अधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि कर्मयोगियों ने, सामाजिक धर्म के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने वाले अधर्मियों से, शास्त्र अथवा शस्त्र के बल पर धर्म युद्ध भी लड़े हैं। चीन अथवा अन्य उत्तरपूर्व देशों में बौद्ध संतों भिक्षुकों में प्रचलित मार्शल आर्ट क्या इस बात का प्रमाण नहीं है। महाभारत हो या कर्बला की जंग, ईसाइयों के क्रूसेड या गुरु गोविंद सिंह जी का खालसा, सभी संप्रदायों में धर्मयुद्ध के प्रमाण हैं। यह समाज और राष्ट्र के उत्थान के लक्ष्य लेकर चलने वाले धार्मिक व्यक्ति और निजी स्वार्थ में लिप्त अधार्मिक व्यक्ति के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है।

3. सांप्रदायिकता - संघं शरणं गच्छामि
सम्प्रदाय अथवा पंथ (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, इत्यादि) का जन्म तब होता है जब अपनी विशेष उपासना पद्धतियों और मान्यताओं को लेकर कुछ लोग संगठित होते हैं। ईश्वर तक पहुंचने के या सत्य को जानने के अनेक मार्ग बताए गए हैं। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से किसी ना किसी सम्प्रदाय का होता ही है। उसको अपनी रुचि के मार्ग पर चलने का अधिकार भी है। यहाँ तक कि अनीश्वरवादी सम्प्रदाय का होने का भी अधिकार है। इसमें कोई बुराई नहीं है जब तक एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को कष्ट नहीं देता, या अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं करता। जितने भी महात्माओं ने इस धरा पर जन्म लिया, और तत्कालीन संप्रदायों में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया, तो उनके अनुयायियों ने एक नया सम्प्रदाय बना लिया। यहाँ विशेष रूप से गौर करने वाली एक बात ये भी है कि किसी सम्प्रदाय अथवा धारणा का विरोध करते करते भी आप एक नए सम्प्रदाय को जन्म दे देते हैं। अतः स्वीकार करें या ना करें, प्रत्येक व्यक्ति साम्प्रदायिक भी होता है। इस सत्य से पलायन करके कोई समस्या नहीं सुलझने वाली। इसे स्वीकार करना ही समस्या के हल की दिशा में पहला कदम होगा।

अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ होने में कोई बुराई भी नहीं है। आपकी प्रतिबद्धता अपने सम्प्रदाय के प्रति होनी ही चाहिए। परंतु यदि आप अपने सम्प्रदाय के सच्चे हितैषी मित्र हैं, तो उसमें व्याप्त कुरीतियों और ऐसी मान्यताओं का विरोध करें जो दूसरों के कष्ट का कारण बनती हों और मानव धर्म के विरुद्ध हों। सार ये है कि आपके सांप्रदायिक होने में कोई बुराई नहीं है, परंतु आप अपने सम्प्रदाय से कृष्ण जैसी मित्रता रखिये, कर्ण जैसी नहीं; जिससे कि सम्प्रदाय के पतन और तदुपरांत विनाश को रोका जा सके।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 22, 2020

प्रेम गली अति सांकरी ...

विराट समुद्र की गोद में
तैरती हुई एक छोटी सी मछली
ढूंढती है समुद्र का अस्तित्व
जैसे माँ की कोख में अंगड़ाई लेता जीवन
प्रश्न करता हो
माँ के ही अस्तित्व पर

और थककर एक दिन
छोटी सी मछली करती है घोषणा
"धर्म अफीम है"
और "ईश्वर एक अंधविश्वास"

उधर समुद्र सोच रहा है...
अपने अस्तित्व को सिद्ध करने
मुझे करना होगा खुद से अलग
इस प्यारी सी खूबसूरत मगर जिद्दी मछली को
लेकिन अपनी जीत से अधिक प्रिय है
मुझे इसका जीवन

और तब नकार कर खुद ही खुदको
समर्पण की कोख से
जन्म लेता है संसार में
विराट प्रेम
मगर अदृश्य और निराकार

© - प्रशांत सेठ

Friday, April 17, 2020

अनुरागी

मन भंवरे के भीतर जागा, मेरे जब जब राग
दुनिया के पुष्पों से पाया, मैंने बहुत पराग

प्रकृति से देखा जुड़कर तो
राग हुए उत्पन्न
अंतहीन अनुबंध में पड़कर
थे सब लोग विपन्न

मन सारथी अश्व इंद्रियां
जीवन का ये रथ
जन्म जन्म तक चलकर देखा
आसक्ति के पथ

इच्छाओं के वृक्ष थे झुलसे, देह के हिस्से आग
एक दिवस तो थम ही जानी, थी ये भागम भाग

हाथ मोह से छुड़ाके देखा
जिस दिन शिव की ओर
वैरागी ने पकड़ा दी तब
वैराग्य की डोर

ज्ञान सारथी अश्व थे चिंतन
लौकिक ना थी चाह
एक झलक उस क्षण देखी
मैंने विरक्ति की राह

पतझर पहले उतरा, तब उतरा जीवन में फाग
मन के भीतर जागा था तब, तुझसे ही अनुराग

दृश्यमान इस जगत को देखा,
देखा दृष्टा बनके
अपने इसके उसके भीतर
अंदर तू ही मन के

गुंजित थी मुरली की धुन
उसके मन कानन में
विष भी अमृत बन कर उतरा
तब मीरा के तन में

कर्म ज्ञान के पथ पे चलकर, मिला राग-वैराग
पथिक चलो अब भक्ति मार्ग पर, जागेगा वीतराग

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 8, 2020

शर्म निरपेक्ष

तबलीगियों, जिहादियों के समर्थक एक कलम के बेईमान शायर को समर्पित मुक्तक ...

बहर में लिख लिख के बहरे हो गए
आदमी के कितने चेहरे हो गए
मरहूम यूँ इंसानियत भी हो गई
अल्फ़ाज़ पे मज़हब के पहरे हो गए
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और ये सच्चे मगर मौन सेक्युलरों को चेतावनी भी, क्योंकि वो नहीं जानते वो क्या नहीं कर रहे। छद्म और एक-पक्षीय सेक्युलरों को कोई चेतावनी नहीं, क्योंकि वो हमेशा से जानते हैं वो क्या कर रहे हैं ...

नफरत फैली, तो आएंगे ज़द में सच्चे भी
बहन बेटी माँ बूढ़े जवां और बच्चे भी
रोक लो तुम खुद ही वहाँ मज़हबी जहालत
इधर मज़हबी ना हो जाएं कई अच्छे भी

© - प्रशांत सेठ


Tuesday, March 31, 2020

उसकी चिट्ठी

सच है कि चिट्ठी आई है कुदरत की
बनके अवरोधक
जीवन की निर्बाध गति में
और मन के चौराहे पर, देखकर लाल बत्ती
ठहर गई हैं, सारी इच्छाएं

ये तो अच्छा है अभी खुली है
एक खिड़की उम्मीद की
जहाँ से आ रही हैं
हवाओं संग बारिश की बूंदें
और मिट्टी की सौंधी खुशबू 
इस खुशनुमा खबर के साथ
कि अभी बांझ नहीं हुई ये धरती

शायद बच्चे निकलेंगे, फिर से गलियों में
मोबाइल की कैद से होकर मुक्त
शायद सुबह घर से निकला करेंगी
अब सिर्फ ज़रूरतें
जो लौट आएंगी शाम ढलने के पहले
शायद हवस बैठ जाएगी सिमट कर 
किसी कोने में

शायद जीत जाएंगी सायकिलें
मोटरकारों से
और धुआं उगलती चिमनियों के काले बादल
छोड़ देंगे रास्ता, परिंदों का
शायद ऊगेंगे अब दरख़्त भी
कुल्हाड़ियों के भय से मुक्त

शायद लौट आएंगे बहुत से प्रवासी पंछी
अपने घोंसले में
शायद नहीं मिलेगा अब
किसी महानगर के फ्लैट में, इंतज़ार करता
एक बूढ़ी माँ का कंकाल

शायद हाथ मिलाएंगे
और गले भी लगेंगे दोस्त
शायद मस्जिदें सुनना सीख लेंगी घंटियां
और मंदिर सुना करेंगे अजान
शायद चल पड़ेगी दुनिया फिर से
मगर इस बार बदली हुई चाल से

© - प्रशांत सेठ

Thursday, March 26, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परम्पराएं - क्वारंटाइन बनाम सूतक - 3

सनातन वैदिक परम्पराएं जिन्हें हमने ढकोसला समझ कर त्याग दिया है, वे किसी धर्म का प्रतिपादन नहीं करती थीं; बल्कि प्रकृति के गूढ़ विज्ञान की गहरी समझ रखने वाली एक उन्नत जीवन शैली थी। कोरोना के कारण आज विश्व बहुत सी उन पद्धतियों को अपनाने को मजबूर हो रहा है, जिन्हें हज़ारों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने मानव सभ्यता के साथ प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखते हुए विकसित किया था; जैसे कि शवों का दाह, नमस्कार की मुद्रा में अभिवादन, इत्यादि। आज जिस क्वारंटाइन के लिए हम मजबूर हो रहे हैं, इसी को प्राचीन समय पर सूतक कहा जाता था। इसलिए आज का विषय यही है।

3 - क्वारंटाइन बनाम सूतक

आज देश में विगत 22 मार्च से 15 अप्रैल तक, हम सब अनिवार्य क्वारंटाइन में हैं। यानि प्रत्येक परिवार खुद में सीमित रहने को विवश है। कारण यह है कि भूलवश भी कोई संक्रमित परिवार किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ना आए, जिससे कि COVID19 को फैलने से रोका जा सके।

सनातन परम्पराओं में कुछ विशेष परिस्थितियों में सूतक की मान्यता थी। परिवार में किसी का निधन होने पर, बच्चे का जन्म होने पर, सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के दौरान, इत्यादि। ऐसी स्थितियों में नीम या हल्दी के पानी से स्नान की भी परम्परा होती थी। सामान्य तौर पर भी घर में हाथ-पाँव धोकर ही प्रवेश किया जाता था।

यह तो सभी जानते हैं कि किसी ना किसी रोग के बहाने ही देह से प्राणों का गमन होता है। इस कारण से भी और मृत देह को कुछ समय घर में रखने के कारण भी वातावरण में जीवाणुओं की उत्पत्ति हो जाती है। अतः कुछ दिन के लिए संबंधित परिवार के घर में प्रवेश निषेध रहता था और मिलने वाले लोग घर के बाहर ही बैठा करते थे। मृत व्यक्ति के उपयोग की सभी वस्तुएं त्याग दी जाती थीं। शोकग्रस्त परिवार से शुचिता के पालन की अपेक्षा करना उचित नहीं था, लिहाजा भोजन, इत्यादि भी अन्य घरों से आने का नियम था। जो लोग दाह संस्कार में सम्मिलित होते थे, वे भी बिना स्नान के किसी अन्य को स्पर्श नहीं करते थे और बाहर ही स्नान करके अपने घरों में प्रवेश करते थे।

इसी प्रकार घर में बच्चे का जन्म होने पर माँ एवं शिशु को महीने भर सूतक में यनि क्वारंटाइन में रखा जाता है। मेडिकल साइंस इस बात की पुष्टि करती है कि इस दौरान शिशु का रक्षा तंत्र (immune system) विकसित नहीं होता और माँ का रक्षा तंत्र भी कमजोर होता है। अतः अन्य लोगों के माध्यम से जीवाणुओं के संपर्क में आने का खतरा होने के कारण, दोनों को सूतक में रखा जाता था।

ग्रहण के दौरान सूर्य की किरणों से आँख के रेटिना की कोशिकाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को विज्ञान जान चुका है। स्पष्ट है कि अन्य कोशिकाओं पर भी कुछ ना कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता होगा। कोरोना एवं इसकी प्रजाति के अन्य वायरस धूप में कुछ देर रहने पर नष्ट हो जाते हैं ऐसा बताया जा रहा है। स्पष्ट है कि सूर्य की किरणों की इंटेंसिटी में कमी आना इन वायरस के लिए वरदान है। हम अंदाज लगा सकते हैं कि हमारी परम्पराओं में ग्रहण काल में सूतक की मान्यता क्यों रही होगी। इसके अलावा ऋतु परिवर्तन के समय भी वायरस संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है। वहीं चंद्रमा और जल तत्व के संबंध को विज्ञान भी मानता है। इसका प्रमाण समुद्र के ज्वार-भाटे में देखा जा सकता है। मानव शरीर में औसतन 60 और मष्तिष्क में 70 प्रतिशत जल होने की वजह से चंद्रमा का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। यह प्रभाव मनोवैज्ञानिक होता है। मन के उद्वेग का हार्मोनल असंतुलन और फिर शारीरिक स्वास्थ्य पर उसका दुष्प्रभाव तो सभी जानते हैं।

हमने अपनी आधुनिकता के अहंकार में, पूर्वजों के जिस ज्ञान को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया, आज उसी की शरण में वापस लौट रहे हैं। हम शिक्षित और विकसित जरूर हो गए; हमने मष्तिष्क में जानकारियों का असीम भंडार भी जमा कर लिया; परंतु वास्तविक ज्ञानी होने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता थी, उसको तकनीक के समक्ष समर्पित कर दिया। हमने प्रकृति को जिस हाल में पहुँचा दिया, उससे यही सिद्ध होता है कि हम विशिष्ट विधाओं के विद्वान तो कहे जा सकते हैं, परंतु ज्ञानी कदापि नहीं।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 25, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परम्पराएं - प्रशासनिक लक्ष्मण रेखा - 2

कोरोना रूपी आपदा से निपटने के लिए सम्पूर्ण भारत को 21 दिन के लिये lockdown कर दिया गया है। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि आपके परिवार का एक सदस्य होने के अधिकार से, मैं सबके घर के बाहर एक लक्ष्मण रेखा खींच रहा हूँ। अतः आज का विषय थोड़े हास परिहास के साथ ये है।

प्रशासनिक लक्ष्मण रेखा - 2

आगामी 21 दिन तक घर की दहरी के पार एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है। यह "लक्ष्मण रेखा" प्रशासनिक पाबंदी के लिए एक प्रतीकात्मक शब्द है। त्रेता युग में श्री राम स्वर्णमृग रूपी रहस्य की खोज में पंचवटी का प्रशासन लक्ष्मण जी को सौंप कर गए थे। तभी "लक्ष्मण बचाओ!" की आवाज़ सुनकर आकस्मिक आपदा से निपटने के लिए सीता जी ने लक्ष्मण को आदेश दिया। यहाँ गौर करने लायक एक बात और है कि सीता जी के इस आदेश ने श्रीराम जी के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें लक्ष्मण जी को कुटी के बाहर पहरा देने का निर्देश था। तब विवश होकर लक्ष्मण जी ने प्रशासनिक अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें कुटी से बाहर ना निकलने का निवेदन किया। संभवतः कुटी के बाहर नकारात्मक शक्तियों के षड़यंत्र का आभास होने पर ऐसा निर्णय लिया गया होगा।

सृष्टि की वास्तविक और स्थायी सत्ता तो ईश्वर के अधीन है, इसलिए समय समय पर बनने वाली सरकारों के मुखिया को हम लक्ष्मण मान सकते हैं। विशेषकर उन्हें, जो घर परिवार को त्याग कर जनता जनार्दन की सेवा में रत हैं। आज भी जब देश भर से आवाजें आनी शुरू हुईं "लक्ष्मण बचाओ!!"; तो जनता रूपी सीता ने अपने लक्ष्मण को कोरोना रूपी अदृश्य संकट से निपटने का आदेश दिया। तब अपने लक्ष्मण जी ने, सीता रूपी पवित्र और भोली जनता को लक्ष्मण रेखा ना लांघने का निर्देश दिया। क्योंकि बाहर कोरोना रूपी रावण आपका हरण करके लंका की अशोक वाटिका रूपी आइसोलेशन वार्ड में ले जाने को तत्पर बैठा है। जो लोग कोरोना से नहीं डरते, उन्हें भी फिलहाल पुलिस को रावण और जेल को अशोक वाटिका समझ कर घर बैठ जाना चाहिए। पुष्पक विमान की यात्रा दुःखदायी सिद्ध हो सकती है।

सार ये है कि किसी भी प्रकार के स्वर्ण मृग, यानी व्यवसाय अथवा धर्म के लोभ में भी घर से बाहर ना निकलें, क्योंकि कोरोना के द्वारा हरण होने की दशा में डॉक्टर रूपी जटायु, अपने प्राणों को संकट में डाल कर भी आपको बचाने में असमर्थ हो सकते हैं।

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परंपराएं - तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी संकट से यदि शिक्षा लेकर नहीं निकले तो संघर्ष व्यर्थ हो जाता है। परंतु शिक्षा क्या ली गई, ये अपने अपने अनुभव पर निर्भर करता है; और अनुभव अपनी अपनी दृष्टि और तर्क पर। कोरोना के रूप में आई इस आपदा ने हमें वापस उन परम्पराओं की ओर मोड़ दिया, जिन्हें हम ढकोसला कहकर तज दिए थे। परंतु आज उन्हीं कुछ परम्पराओं का वैज्ञानिक कारण समझ में आ रहा है। इसी से प्रेरित ये शृंखला प्रारंभ करने का विचार उत्पन्न हुआ। इस गूढ़ विषय पर पूरी तरह लिखने का मेरा सामर्थ्य और ज्ञान नहीं है, तथापि इस अपेक्षा से लिख रहा हूँ कि यह चिंतन श्रृंखला प्रारंभ हो और सभी लोग इस विषय पर अपने अपने अनुभव साझा करें।

तर्क के इस युग में वेद और उनमें निहित ज्ञान पर विश्वास क्यों व कैसे हो? इसी को ध्यान में रखते हुए आज पहला विषय ये चुना है।

1. तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी ज्ञान अथवा व्यक्ति को जीवन मे तभी स्वीकार किया जाता है जब उसमें आपकी श्रद्धा उत्पन्न हो। श्रद्धा तभी उत्पन्न होती है जब आपको विश्वास हो जाता है कि उक्त व्यक्ति मेरा हित ही चाहता है और उसका कोई निजी लाभ नहीं है। इसीलिए अपने माता-पिता में, पूर्वजों में और पूर्वजों द्वारा रचित वेदों में अश्रद्धा होने का कोई कारण नहीं है। तथापि आज के युग में जिज्ञासा, ये जरूर चाहती है कि इन वैदिक परम्पराओं के पीछे का विज्ञान भी ज्ञात हो तो स्वीकार्यता सरल और व्यापक हो जाएगी। कठिनाई ये है कि वेदों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं रचा। ये हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों के हज़ारों वर्षों के प्रयोग और अनुभव थे, जो निरंतर परिष्कृत होते गए। उक्त काल में सर्व स्वीकार्य और सिद्ध अनुभवों ने वेदों में स्थान पाया। लेकिन आज उनमें से एक भी हमारे तर्कों को शांत करने के लिए उपस्थित नहीं है। अतः तर्कपूर्ण बुद्धि में उत्पन्न अश्रद्धा के लिए मेरे पास एक ही जवाब है।

"तर्क अपनी स्वयं की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है, और श्रद्धा अपने से अधिक ज्ञानियों की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है।"

हमारे पूर्वजों ने हमारी पीढ़ियों से यही अपेक्षा की होगी के हम उनके ज्ञान को सीढ़ी बनाकर और आगे खोज करें। ना कि उनके अर्जित ज्ञान को नकार कर, पुनः शून्य से शुरू करके, सारे अनुभव खुद करें। सारे अनुभव स्वयं करने के लिए कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे। दूसरों के अनुभवों से सीख लेने वाले कम समय में अधिक ज्ञानार्जन कर लेते हैं।

अब बात आती है विश्वास और अंधविश्वास पर। तो आपको जानकर हैरत होगी कि अंधविश्वास ही विश्वास है, वरना विश्वास है ही नहीं। कैसे? इसके लिए मैं आपको एक सच्चा अनुभव सुनाता हूँ।

किसी नए प्रोडक्ट की मार्केटिंग के दौरान मैं एक व्यवसायी को प्रोडक्ट के तमाम गुण और लाभ, इत्यादि बता रहा था। मेरी हर बात से सहमत होने के बावजूद भी ऑर्डर देने को वो राजी नहीं हो रहा था। कारण पूछा तो उसके मुँह से यह निकल गया कि "मुझे आपकी बात पर 90 प्रतिशत विश्वास है लेकिन..."। 

मैंने उससे कहा- मित्र, विश्वास या तो 100 प्रतिशत यानी अंधा होता है, या नहीं होता। पूछो कैसे?

उसने पूछा - कैसे

मैंने कहा- यही बात आज आप अपनी श्रीमतीजी से बोलकर देखिएगा कि मुझे तुमपर 90 नहीं, बल्कि 99 प्रतिशत विश्वास है। आपको जवाब वहीं मिल जाएगा लेकिन उस 1 प्रतिशत के चक्कर मे 99 प्रतिशत जोखिम है आपका।

कहने की जरूरत नहीं के मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने में तो सफल रहा है, लेकिन मुझे स्वयं भी ज्ञान हुआ कि लाख तर्क क्षमता होने के बावजूद भी हम जीवन के अनेक क्षेत्रों में अंधविश्वास ही नहीं, बल्कि भक्ति करते हैं। और अपने परिवार, गुरुजनों एवं इष्ट मित्रों पर इस अंधविश्वास और भक्ति के बिना जीवन अकल्पनीय है, कुरूप है। जीवन की सुंदरता इसी अंधविश्वास में है। आप अपनी सेना पर, डॉक्टरों पर, सहयोगियों पर, प्रशासन पर, सरकार पर अंधविश्वास किए बिना शांति से नहीं जी सकते। इसीलिए अविश्वासी व्यक्ति निरंतर अशांत रहता है।

अतः सीमित बुद्धि के तर्कों की सहायता से उस असीमित ज्ञान का उपलब्ध होना संभव ही नहीं। पूर्वजों के ज्ञान पर श्रद्धा और विश्वास करके, जीवन में उसे उतारकर ही, हम अनुभव द्वारा उसे सिद्ध कर सकते हैं; वर्तमान युग के अनुसार निरंतर परिष्कृत भी।

- प्रशांत सेठ

Sunday, March 22, 2020

कर्फ्यू

क्या तुम रोक पाओगे आज?
मन का अपने घर से निकलना
भूली बिसरी किन्ही पुरानी
खोई हुई यादों से मिलना

घर की चार दीवारों में जो
जीवन कुछ दिन आ ठहरा
मिल लो उस अनजाने से भी
दर्पण जिसका है चेहरा

स्मृतियों के गलियारे में
चुपके से दबे पाँव चलना
और यदि वक्त मिल जाये तो
कुछ उधड़े रिश्तों को सिलना

वरना तो सदा ही मन पर
ज़रूरतों का था पहरा
या फिर दुनिया की दौड़ से
रिश्ता इतना था गहरा

भूल गए थे फूल प्रेम के
हृदय की बगिया में खिलना
आज उसी बाग में छुपकर
अपनी हरियाली से मिलना

बंधा है मुस्कानें खोकर
सर पे दायित्व का सहरा
ये भीतर का मौन नहीं सच
शोर बहुत है, मन बहरा

इन ठहरे ठहरे लम्हों में
खुद से खुद का हो मिलना
रिहाई अपनी कैद से लेकर
खूब निकलना खूब निकलना

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 18, 2020

अहिल्या

स्त्रियां हो जाती हैं पत्थर
जब छली जाती हैं
पत्थर हो जाते हैं स्त्री
जब स्पर्श करता है प्रेम

किसी कठोर आवरण के अंतस में छुपी
कोमलता में
निहित रहती है उर्वरता
संभवतः यह संतुलन ही शर्त है
सृजन के बीज की

तभी तो
पुरुषत्व के यथार्थ में संरक्षित
स्त्री की कोमल कल्पनाएं
कर देती हैं सृजन
एक सृष्टि का

मगर जब
यथार्थ भटकता हो अनभिज्ञ
मन के संकल्पों से
या मन की कल्पनाओं को अस्वीकार हो
यथार्थ का बंधन,
तब बिगड़ जाता है प्रकृति का संतुलन
नष्ट हो जाती है उर्वरता

तुमने सुना होगा
भटकते हैं बहुत से पुरुषत्व के अहं
ठोकर खाते शिलाओं से

और बहुत सी निष्प्राण शिलाओं में
आज भी धड़कती हैं अहिल्याएँ
एक स्पर्श की प्रतीक्षा में
किसी मर्यादित पुरुषोत्तम के

© - प्रशांत सेठ

Sunday, March 8, 2020

प्रियतमा

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं

"प्रियतमा"

तुमने छू लिया चांद को
अपनी उड़ान से
तुमने हरा दिया रेसिंग ट्रैक को
अपनी रफ्तार से
तुमने झुका दिया हिमशिखरों को
अपने हौसले से

उधर आज भी
सुदूर गाँव में कहीं,
किसी बैलगाड़ी के पीछे चलते चलते
युग बीते, मगर
तुम पहुँच नहीं पाईं
बैलों की लगाम तक

यकीन मानो
निर्भरता से आत्मनिर्भरता तक
तुम्हारा यह सफर
पुरुषत्व की पराजय नहीं है
बल्कि, खरीद सकते हैं हम-तुम मिलकर
बैलों की एक और जोड़ी

© - प्रशांत सेठ

Thursday, February 27, 2020

एक राष्ट्र की मौत

आक्रोश, बुरा नहीं होता
जब जन्म लेता है
करुणा की कोख से,
तब पढ़ता है, निर्बलों की पीड़ा
पलता है, वेदना के आंसुओं पर
और अभिव्यक्त होता है
अन्याय के विरुद्ध

आक्रोश, बुरा है वही
जो जन्म लेता है
अहंकार की कोख से,
तब पढ़ता है, स्वार्थ का गणित
पलता है, परजीवी की तरह समाज में
और अभिव्यक्त होता है
अनुशासन के विरोध में

बुरी नहीं होती
गैर मजहब की हर अभिव्यक्ति
बुरी है वही
जिसने जन्म लिया है
धर्मांधता और जिहाद की कोख से
जिसने तय कर रखे हैं मापदंड
दूसरों की आस्थाओं के
जिसे तकलीफ है, औरों के खुदा से

तभी तो
उधर तुम्हारी धर्मांधता हामला* है तो
इधर मेरी करुणा ने भी कर लिया है गर्भ धारण
और मृत्युशैया पर लेटा है
एक बूढ़ा राष्ट्र
पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में

© - प्रशांत सेठ

*हामला = गर्भवती

Thursday, February 20, 2020

प्रयाग

प्रयाग

पर्वतों से गिरकर
विस्तार की तलाश में बहती
ये नदियां
होती हैं महत्वकांक्षाओं की तरह
एक दिन खो देती हैं अपनी मिठास
समा जाती हैं खारेपन में

क्योंकि
धाराएं बनाती हैं रास्ता
दो पाटों में बांटकर, धरा को
धाराएं ठुकरा देती हैं थिर को
और समेटना चाहती हैं आगोश में
वो सब कुछ, जो है जड़हीन

मैंने देखा है
सियासत के बंटवारे से प्रदूषित है
प्रेम की यमुना
लुप्त है नश्वर के मोह में पड़कर
सत्य की सरस्वती
और मैली हो चुकी है मन की गंगा
अपनी जड़ों को भूलकर

हे महामानव!!
सुना है
तुम भी उतरे हो पहाड़ों से
किसी महासागर की तलाश में?

© - प्रशांत सेठ

Friday, February 14, 2020

नमन पुलवामा

पुलवामा

हम हताश नहीं
हम निराश नहीं,
मिट जाएँ क्षणिक अंधेरों से
ऐसा हम प्रकाश नहीं
हम सूर्य नहीं जो
उदय होकर फिर अस्त हुआ
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं

मानवता को कर कलंकित
लोभी शत्रु जब बढ़ते हैं
हम सीमा के रक्षक उसकी
छाती पर जा चढ़ते हैं

मृत्यु को भी वधू बनाकर
वरने से हमको संत्रास नहीं

हृदय में धधका अनवरत
राष्ट्रभक्ति का ज्वाल हैं हम
आज तिरंगा ओढ़ के निकले
भारत माँ के लाल हैं हम

राजतिलक चले ठुकरा कर
हमको अप्रिय वनवास नहीं

मातृभूमि के प्रहरी हम
हैं नींव राष्ट्र की गहरी हम
सोया हुआ देश जगाने
छोड़ के निकले देह-री हम

है नष्ट हमारी काया किन्तु
संबल का हुआ विनाश नहीं

यूँ तो शत्रु के लिए
प्रलयंकारी काल हैं हम
मगर तुम्हारे समक्ष खड़ा
अनसुलझा एक सवाल हैं हम

कुछ प्रश्नों का उत्तर लेकिन
है अपने भी पास नहीं

दुश्मन की संगीनें अपनी
छाती पर सम्हाले है
किन्तु पीठ सदा तुम्हारे
विश्वासों के हवाले है

घर में भी बैठे हैं शिखंडी
था हमको आभास नहीं

हम बाली से अधिक सबल
थे भीष्म प्रतिज्ञा से अटल
स्मृतियों में जिंदा रखना
हम होंगे ना यहाँ जब कल

मिले शहादत कर्तव्य पथ पर
इससे बढ़कर सन्यास नहीं
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 8, 2020

आव्हान

वर्तमान का मौन कहीं ना, युगों युगों का हो संताप
मूक न रहना जब तुम्हारी,  सहिष्णुता पे हो आघात

आव्हान

पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा
अब मुरली का काम नहीं
शंखों को बजना होगा

रोके ना वृन्दावन तुमको
टोके यमुना का तट नहीं
गोरी के कुंतल की काली
उलझाये ना लट कहीं

कर्तव्य की राह में मेरा
प्रेम कभी ना होगा बाधा
मैं शक्ति हूँ तेरी मोहन
बंधन कभी नहीं थी राधा

मुक्त प्रेम को कर बैठी तब
बरसाने की वह किशोरी
मुरलीधर के हाथ थमाकर
संकल्पों की पावन डोरी

त्याग रहित प्रेम हुआ तो
कंसों का वध ना होगा
अब मुरली का काम नहीं
शंखों को बजना होगा

2
मुड़ मुड़ के वो देख रहा
दुविधा में क्यों पग उसके?
रोक रहे रणबांकुरे को
प्रणय निवेदन ये किसके?

हाड़ा वंश की वह तरुणी
कह उठी तब प्रियतम से
बलिदानों की राह पे चलना
मोह ना रखना अब हमसे

क्षत्राणी का प्रेम कभी ना
रोके तुमको निज धर्म से
शीश अपना भेज रही हूँ
प्रिय, विमुख ना हो कर्म से

रहें सतीत्व पौरुष सहगामी
लज्जित धर्म ध्वज ना होगा
पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा

3
सुनो हिन्द की ऐ तरुणाई
तुमपर धरा को रंज ना हो
जिसने तुमको जन्म दिया
उस माँ पर अब तंज ना हो

क्षीरसागर के सुख तभी तक
जब ताण्डव की क्षमता हो 
है वैभव संग शक्ति उसकी
जिसका लहू उबलता हो

करुणा के नेत्रों से छलके
क्रोध के फिर भरे कलश क्यों?
मानवता की जननी अब ना
काली बनने को विवश हो

प्रेम प्राण रस रंग के सारे
मोहों को तजना होगा
पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 28, 2020

उठो शाहीन अब आँखें खोलो

भारत माँ की तरफ से अपने प्यारे मगर ढीठ बच्चों के लिए सुबह सवेरे वाली कविता। सोहनलाल द्विवेदी जी से क्षमा सहित 🙏🏼😄

उठो शाहीन अब आँखें खोलो
बहुत हुआ तुम घर को हो लो

दिल्ली में ना कमल दल फूले
तुम्हारा वोट बैंक ना झूले

गंदी हवा खूब फैलाई
बहुत मिली बिरयानी भाई

रुपये पाँच सौ खूब बंटे हैं
महीने भर से सब डटे हैं

राजनीति ने खेल खिलाया
तुमने खूब माल कमाया

नेताओं ने खाई मलाई
देश कहे बहुत दुःखदायी

देखो फिर से सर ना फूटे
EC (इलेक्शन कमीशन) का कहर ना टूटे

मोदी शाह की अजब माया
उकसावे में कोई ना आया

और ना अब तुम ज्यादा ऐंठो
मेरे प्यारे अब उठ बैठो

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 21, 2020

शंखनाद

विद्वता के अधरों पे है
अधर्म सभा ने मौन जड़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

कुरुवंश के सत्ता मोह में
उपवन में आ गिद्ध डटे
ज्ञान नहीं है जिन्हें धर्म का
नकली सारे सिद्ध जुटे

चीर पर माँ भारती के
अहंकार ने पग धरा
फिर पाञ्चजन्य ....

कर्तव्य का गांडीव त्याग
सामर्थ्य आज हताश क्यों?
पार्थ के संकल्प को बांधे
भावुकता बाहुपाश क्यों?

धर्म-अधर्म के बीच निर्णय
असमंजस में क्यों पड़ा?
फिर पाञ्चजन्य ....

निज स्वार्थ में धर्मपथ से
हुआ च्युत जब राजवंश
युगों युगों तक मानवता ने
झेला उसका है विषदंश

आज भी तो प्रश्न वही
समक्ष राष्ट्र के पुनः खड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

सुनियोजित शनैः शनैः
किया नष्ट वेद भाष को
षडयंत्रों ने दिया प्रश्रय
संस्कृति के विनाश को

बूंद बूंद से कलिकाल ने
पाप का भर दिया घड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

नवनिर्माण के शौर्य रथ की
थाम सकेगा रास कौन?
तुम ही हो सारथी जिसके
बाहर विध्वंस भीतर मौन

शस्त्र शास्त्र के संगम का
तुमने ही दृष्टांत गढ़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

© - प्रशांत सेठ




Wednesday, January 15, 2020

मकरसंक्रांति

सम्पूर्ण मानवता को सनातन संस्कृति की शुभकामनाएं देता पर्व 🙏🏼

मुझे नहीं पता
तुम्हारे इस राशि से उस राशि में
प्रवेश का अर्थ
मगर, हे सूर्यदेव!
मैं देख रहा हूँ
माँ नर्मदा की गोद में
सर्द मौसम को पिघलते हुए

काश पिघल जाए इसी के साथ
संबंधों के पहाड़ पर पसरी
बर्फ सी सफेद चादरें
अहंकार की

इच्छाओं की पतंगे
खूब छुएँ आसमान
मगर बंधी रहें
सिद्धांतों की डोर से

ज्ञान का उदित सूर्य
मुक्त करे अस्तित्व को
माया के संक्रमण से
हम करें दान
अज्ञान से संचित सारे संग्रह

मुक्त हो जाए ये बूँद
पृथकता के संकल्प से
कर सके समर्पण
उस शाश्वत सागर की
अनंत गहराई में

छूट जाएं आज
शरशैया पर लेटे जीवन की
हठीली भीष्म प्रतिज्ञाएं
और मानवता हो चले मुक्त
अधर्म के पाश से

© - प्रशांत सेठ