क्या तुम रोक पाओगे आज?
मन का अपने घर से निकलना
भूली बिसरी किन्ही पुरानी
खोई हुई यादों से मिलना
घर की चार दीवारों में जो
जीवन कुछ दिन आ ठहरा
मिल लो उस अनजाने से भी
दर्पण जिसका है चेहरा
स्मृतियों के गलियारे में
चुपके से दबे पाँव चलना
और यदि वक्त मिल जाये तो
कुछ उधड़े रिश्तों को सिलना
वरना तो सदा ही मन पर
ज़रूरतों का था पहरा
या फिर दुनिया की दौड़ से
रिश्ता इतना था गहरा
भूल गए थे फूल प्रेम के
हृदय की बगिया में खिलना
आज उसी बाग में छुपकर
अपनी हरियाली से मिलना
बंधा है मुस्कानें खोकर
सर पे दायित्व का सहरा
ये भीतर का मौन नहीं सच
शोर बहुत है, मन बहरा
इन ठहरे ठहरे लम्हों में
खुद से खुद का हो मिलना
रिहाई अपनी कैद से लेकर
खूब निकलना खूब निकलना
© - प्रशांत सेठ
No comments:
Post a Comment