Tuesday, March 24, 2020

कोरोना और सनातन वैदिक परंपराएं - तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी संकट से यदि शिक्षा लेकर नहीं निकले तो संघर्ष व्यर्थ हो जाता है। परंतु शिक्षा क्या ली गई, ये अपने अपने अनुभव पर निर्भर करता है; और अनुभव अपनी अपनी दृष्टि और तर्क पर। कोरोना के रूप में आई इस आपदा ने हमें वापस उन परम्पराओं की ओर मोड़ दिया, जिन्हें हम ढकोसला कहकर तज दिए थे। परंतु आज उन्हीं कुछ परम्पराओं का वैज्ञानिक कारण समझ में आ रहा है। इसी से प्रेरित ये शृंखला प्रारंभ करने का विचार उत्पन्न हुआ। इस गूढ़ विषय पर पूरी तरह लिखने का मेरा सामर्थ्य और ज्ञान नहीं है, तथापि इस अपेक्षा से लिख रहा हूँ कि यह चिंतन श्रृंखला प्रारंभ हो और सभी लोग इस विषय पर अपने अपने अनुभव साझा करें।

तर्क के इस युग में वेद और उनमें निहित ज्ञान पर विश्वास क्यों व कैसे हो? इसी को ध्यान में रखते हुए आज पहला विषय ये चुना है।

1. तर्क और विश्वास/अंधविश्वास

किसी भी ज्ञान अथवा व्यक्ति को जीवन मे तभी स्वीकार किया जाता है जब उसमें आपकी श्रद्धा उत्पन्न हो। श्रद्धा तभी उत्पन्न होती है जब आपको विश्वास हो जाता है कि उक्त व्यक्ति मेरा हित ही चाहता है और उसका कोई निजी लाभ नहीं है। इसीलिए अपने माता-पिता में, पूर्वजों में और पूर्वजों द्वारा रचित वेदों में अश्रद्धा होने का कोई कारण नहीं है। तथापि आज के युग में जिज्ञासा, ये जरूर चाहती है कि इन वैदिक परम्पराओं के पीछे का विज्ञान भी ज्ञात हो तो स्वीकार्यता सरल और व्यापक हो जाएगी। कठिनाई ये है कि वेदों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं रचा। ये हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों के हज़ारों वर्षों के प्रयोग और अनुभव थे, जो निरंतर परिष्कृत होते गए। उक्त काल में सर्व स्वीकार्य और सिद्ध अनुभवों ने वेदों में स्थान पाया। लेकिन आज उनमें से एक भी हमारे तर्कों को शांत करने के लिए उपस्थित नहीं है। अतः तर्कपूर्ण बुद्धि में उत्पन्न अश्रद्धा के लिए मेरे पास एक ही जवाब है।

"तर्क अपनी स्वयं की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है, और श्रद्धा अपने से अधिक ज्ञानियों की बुद्धि पर अंधविश्वास का नाम है।"

हमारे पूर्वजों ने हमारी पीढ़ियों से यही अपेक्षा की होगी के हम उनके ज्ञान को सीढ़ी बनाकर और आगे खोज करें। ना कि उनके अर्जित ज्ञान को नकार कर, पुनः शून्य से शुरू करके, सारे अनुभव खुद करें। सारे अनुभव स्वयं करने के लिए कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे। दूसरों के अनुभवों से सीख लेने वाले कम समय में अधिक ज्ञानार्जन कर लेते हैं।

अब बात आती है विश्वास और अंधविश्वास पर। तो आपको जानकर हैरत होगी कि अंधविश्वास ही विश्वास है, वरना विश्वास है ही नहीं। कैसे? इसके लिए मैं आपको एक सच्चा अनुभव सुनाता हूँ।

किसी नए प्रोडक्ट की मार्केटिंग के दौरान मैं एक व्यवसायी को प्रोडक्ट के तमाम गुण और लाभ, इत्यादि बता रहा था। मेरी हर बात से सहमत होने के बावजूद भी ऑर्डर देने को वो राजी नहीं हो रहा था। कारण पूछा तो उसके मुँह से यह निकल गया कि "मुझे आपकी बात पर 90 प्रतिशत विश्वास है लेकिन..."। 

मैंने उससे कहा- मित्र, विश्वास या तो 100 प्रतिशत यानी अंधा होता है, या नहीं होता। पूछो कैसे?

उसने पूछा - कैसे

मैंने कहा- यही बात आज आप अपनी श्रीमतीजी से बोलकर देखिएगा कि मुझे तुमपर 90 नहीं, बल्कि 99 प्रतिशत विश्वास है। आपको जवाब वहीं मिल जाएगा लेकिन उस 1 प्रतिशत के चक्कर मे 99 प्रतिशत जोखिम है आपका।

कहने की जरूरत नहीं के मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने में तो सफल रहा है, लेकिन मुझे स्वयं भी ज्ञान हुआ कि लाख तर्क क्षमता होने के बावजूद भी हम जीवन के अनेक क्षेत्रों में अंधविश्वास ही नहीं, बल्कि भक्ति करते हैं। और अपने परिवार, गुरुजनों एवं इष्ट मित्रों पर इस अंधविश्वास और भक्ति के बिना जीवन अकल्पनीय है, कुरूप है। जीवन की सुंदरता इसी अंधविश्वास में है। आप अपनी सेना पर, डॉक्टरों पर, सहयोगियों पर, प्रशासन पर, सरकार पर अंधविश्वास किए बिना शांति से नहीं जी सकते। इसीलिए अविश्वासी व्यक्ति निरंतर अशांत रहता है।

अतः सीमित बुद्धि के तर्कों की सहायता से उस असीमित ज्ञान का उपलब्ध होना संभव ही नहीं। पूर्वजों के ज्ञान पर श्रद्धा और विश्वास करके, जीवन में उसे उतारकर ही, हम अनुभव द्वारा उसे सिद्ध कर सकते हैं; वर्तमान युग के अनुसार निरंतर परिष्कृत भी।

- प्रशांत सेठ

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