सच है कि चिट्ठी आई है कुदरत की
बनके अवरोधक
जीवन की निर्बाध गति में
और मन के चौराहे पर, देखकर लाल बत्ती
ठहर गई हैं, सारी इच्छाएं
ये तो अच्छा है अभी खुली है
एक खिड़की उम्मीद की
जहाँ से आ रही हैं
हवाओं संग बारिश की बूंदें
और मिट्टी की सौंधी खुशबू
इस खुशनुमा खबर के साथ
कि अभी बांझ नहीं हुई ये धरती
शायद बच्चे निकलेंगे, फिर से गलियों में
मोबाइल की कैद से होकर मुक्त
शायद सुबह घर से निकला करेंगी
अब सिर्फ ज़रूरतें
जो लौट आएंगी शाम ढलने के पहले
शायद हवस बैठ जाएगी सिमट कर
किसी कोने में
शायद जीत जाएंगी सायकिलें
मोटरकारों से
और धुआं उगलती चिमनियों के काले बादल
छोड़ देंगे रास्ता, परिंदों का
शायद ऊगेंगे अब दरख़्त भी
कुल्हाड़ियों के भय से मुक्त
शायद लौट आएंगे बहुत से प्रवासी पंछी
अपने घोंसले में
शायद नहीं मिलेगा अब
किसी महानगर के फ्लैट में, इंतज़ार करता
एक बूढ़ी माँ का कंकाल
शायद हाथ मिलाएंगे
और गले भी लगेंगे दोस्त
शायद मस्जिदें सुनना सीख लेंगी घंटियां
और मंदिर सुना करेंगे अजान
शायद चल पड़ेगी दुनिया फिर से
मगर इस बार बदली हुई चाल से
© - प्रशांत सेठ
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