सनातन वैदिक परम्पराएं जिन्हें हमने ढकोसला समझ कर त्याग दिया है, वे किसी धर्म का प्रतिपादन नहीं करती थीं; बल्कि प्रकृति के गूढ़ विज्ञान की गहरी समझ रखने वाली एक उन्नत जीवन शैली थी। कोरोना के कारण आज विश्व बहुत सी उन पद्धतियों को अपनाने को मजबूर हो रहा है, जिन्हें हज़ारों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने मानव सभ्यता के साथ प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखते हुए विकसित किया था; जैसे कि शवों का दाह, नमस्कार की मुद्रा में अभिवादन, इत्यादि। आज जिस क्वारंटाइन के लिए हम मजबूर हो रहे हैं, इसी को प्राचीन समय पर सूतक कहा जाता था। इसलिए आज का विषय यही है।
3 - क्वारंटाइन बनाम सूतक
आज देश में विगत 22 मार्च से 15 अप्रैल तक, हम सब अनिवार्य क्वारंटाइन में हैं। यानि प्रत्येक परिवार खुद में सीमित रहने को विवश है। कारण यह है कि भूलवश भी कोई संक्रमित परिवार किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ना आए, जिससे कि COVID19 को फैलने से रोका जा सके।
सनातन परम्पराओं में कुछ विशेष परिस्थितियों में सूतक की मान्यता थी। परिवार में किसी का निधन होने पर, बच्चे का जन्म होने पर, सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के दौरान, इत्यादि। ऐसी स्थितियों में नीम या हल्दी के पानी से स्नान की भी परम्परा होती थी। सामान्य तौर पर भी घर में हाथ-पाँव धोकर ही प्रवेश किया जाता था।
यह तो सभी जानते हैं कि किसी ना किसी रोग के बहाने ही देह से प्राणों का गमन होता है। इस कारण से भी और मृत देह को कुछ समय घर में रखने के कारण भी वातावरण में जीवाणुओं की उत्पत्ति हो जाती है। अतः कुछ दिन के लिए संबंधित परिवार के घर में प्रवेश निषेध रहता था और मिलने वाले लोग घर के बाहर ही बैठा करते थे। मृत व्यक्ति के उपयोग की सभी वस्तुएं त्याग दी जाती थीं। शोकग्रस्त परिवार से शुचिता के पालन की अपेक्षा करना उचित नहीं था, लिहाजा भोजन, इत्यादि भी अन्य घरों से आने का नियम था। जो लोग दाह संस्कार में सम्मिलित होते थे, वे भी बिना स्नान के किसी अन्य को स्पर्श नहीं करते थे और बाहर ही स्नान करके अपने घरों में प्रवेश करते थे।
इसी प्रकार घर में बच्चे का जन्म होने पर माँ एवं शिशु को महीने भर सूतक में यनि क्वारंटाइन में रखा जाता है। मेडिकल साइंस इस बात की पुष्टि करती है कि इस दौरान शिशु का रक्षा तंत्र (immune system) विकसित नहीं होता और माँ का रक्षा तंत्र भी कमजोर होता है। अतः अन्य लोगों के माध्यम से जीवाणुओं के संपर्क में आने का खतरा होने के कारण, दोनों को सूतक में रखा जाता था।
ग्रहण के दौरान सूर्य की किरणों से आँख के रेटिना की कोशिकाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को विज्ञान जान चुका है। स्पष्ट है कि अन्य कोशिकाओं पर भी कुछ ना कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता होगा। कोरोना एवं इसकी प्रजाति के अन्य वायरस धूप में कुछ देर रहने पर नष्ट हो जाते हैं ऐसा बताया जा रहा है। स्पष्ट है कि सूर्य की किरणों की इंटेंसिटी में कमी आना इन वायरस के लिए वरदान है। हम अंदाज लगा सकते हैं कि हमारी परम्पराओं में ग्रहण काल में सूतक की मान्यता क्यों रही होगी। इसके अलावा ऋतु परिवर्तन के समय भी वायरस संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है। वहीं चंद्रमा और जल तत्व के संबंध को विज्ञान भी मानता है। इसका प्रमाण समुद्र के ज्वार-भाटे में देखा जा सकता है। मानव शरीर में औसतन 60 और मष्तिष्क में 70 प्रतिशत जल होने की वजह से चंद्रमा का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। यह प्रभाव मनोवैज्ञानिक होता है। मन के उद्वेग का हार्मोनल असंतुलन और फिर शारीरिक स्वास्थ्य पर उसका दुष्प्रभाव तो सभी जानते हैं।
हमने अपनी आधुनिकता के अहंकार में, पूर्वजों के जिस ज्ञान को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया, आज उसी की शरण में वापस लौट रहे हैं। हम शिक्षित और विकसित जरूर हो गए; हमने मष्तिष्क में जानकारियों का असीम भंडार भी जमा कर लिया; परंतु वास्तविक ज्ञानी होने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता थी, उसको तकनीक के समक्ष समर्पित कर दिया। हमने प्रकृति को जिस हाल में पहुँचा दिया, उससे यही सिद्ध होता है कि हम विशिष्ट विधाओं के विद्वान तो कहे जा सकते हैं, परंतु ज्ञानी कदापि नहीं।
© - प्रशांत सेठ
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