Friday, October 31, 2014

मर्ज़-ए-दौलत

भूख !!!

ये भी कोई मर्ज़ है भला? ये कोई समस्या नहीं है, क्योंकि ये चुन चुन कर सिर्फ गरीबों को मारती है। महामारी तो उसको कहते हैं जो साउंड प्रूफ दीवारों को पार करके, हमारे वातानुकूलित कमरों तक पहुँच जाये। क्योंकि जीवन तो हम चंद दौलतमंद लोगों का ही मूल्यवान है, जो इस दुनिया के खुदा बन बैठे हैं। शेष तो प्रकृति की नैसर्गिक क्रिया है।

वास्तव में बीमार कौन है? वो जिसकी देह टूट रही है या वो जिसकी आत्मा ही नहीं है? सोचिये....

वो चीख नहीं सकते जो भूख से हारे हुये हैं
हम सुन नहीं सकते पत्थर के सारे हुये हैं
दीन-ओ-ईमान से महरूम हम दुनिया के खुदा
क्या करें के मर्ज़-ए-दौलत के मारे हुये हैं

© - प्रशांत सेठ

महरूम = वंचित

Thursday, October 23, 2014

शुभ दीपोत्सव

दीपों का त्यौहार, वो भी इस घोर अँधेरी काली रात में। शायद यही सन्देश है एक दीप का कि जब अँधेरे घने हों तो आशा का दीप जलाये रखें, और यदि जीवन में प्रकाश है तो परोपकार की परम्परा बनाये रखें।

इसी भावना के साथ आप सभी इष्ट मित्रों, स्नेहीजनों को शुभकामनायें.....

शुभ दीपोत्सव 

लड़ते लड़ते एक दीप से अंधकार कुछ यूँ बोला
कैसे लड़ोगे तुम मझसे, जलोगे कब तक बन शोला?

श्वांसों का तेल है जब तक, जलती संवेदना की बाती
कर्त्तव्य पथ पर उजियारा मैं, करता रहूँगा सुन साथी

बुझते बुझते दे जाऊँगा, पीढ़ियों को भी ये पाती
घोर अमावस में ही दीप से, मिलने लक्ष्मी है आती

सुख शांति समृद्धि भी, गीत उसी के है गाती
जो लड़ता है तिमिर से, निर्द्वन्द दीपक की भांति

निस्वार्थ कर्म की सुगंध जब, चहुँ ओर छा जाती
बल बुद्धि यश कीर्ति तब, चलकर आती है ख्याति

स्वयं जलकर औरों की शुभ, करता है जो दीवाली
दीप बनकर जलने वाला, बन जाता है अविनाशी

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, October 22, 2014

भू-कम्पन


जब बेटे ही छाती पे मूंग दलने लगे 
लो ज़मीं के तेवर भी अब बदलने लगे
माँ अपने घर में जबसे हुई बेगानी है
नींव छत दरो दीवार सब हिलने लगे

जननी का तिरस्कार मनुष्य के पतन की पहली निशानी है और धरणी (धरती) का तिरस्कार संपूर्ण मानवता के पतन का द्योतक।

संपूर्ण मानवता को अपनी गोद में लेकर पालने वाली वसुंधरा आज फिर मनुष्य के कृत्यों से काँप गयी। बूढी हो चली है शायद। अब और बोझ नहीं उठा सकती हमारे लालच का। इतना सामर्थ्य प्रकृति ने हर माँ को दिया है की वो अपनी संतान की उदरपूर्ति कर सके। परन्तु लालच का पेट? वो तो परमात्मा भी नहीं भर सकता।


खनिज माफिया धरती का सीना चीर रहे हैं तो भू माफिया पहाड़ काट रहे हैं। जंगल माफिया की वृक्षों पर गिद्ध दृष्टि है तो उद्योगों का नदियों से बैर। परिणाम भूस्खलन और भूकम्प।

आज (22-10-2014) जबलपुर में भूकंप के प्रत्यक्ष अनुभव से उपजी ये पंक्तियाँ...

पर्वत पेड़ नदी अरु जंगल
वसुंधरा के ये आभूषण
इनसे वंचित कर धरती को
मत फैलाओ तुम प्रदूषण?

हो तुम जिसकी गोद में खेले

आज उसी का करते शोषण
माँ अगर बंजर रह जाये तो
सोचो कैसे होगा पोषण?

धीर अब तक धरा धरणी ने

ना जाने चुक जाये किस क्षण
और समूची मानवता का
काल ना कर जाये भक्षण

समय रहते त्याग सको तो

लोभ अपना त्यागो तत्क्षण
ऋण अदा कर दो मिटटी का
वृक्षों का पुन: कर दो रोपण

© - प्रशांत सेठ





Monday, October 20, 2014

एकलव्य

बहुत आसान है ऊंचा उठना, बस थोडा सा गिर जाइये। यही सच है इस युग में सफलता का। जो जितने बड़े दिखते हैं अक्सर बहुत छोटे लोग होते हैं (अपवादों को छोड़कर)।

सच तो ये है की आज के दौर में एक अर्जुन के पीछे कई एकलव्य बलिदान होते हैं। ना जाने कितनी प्रतिभाओं का शोषण करके, अपनी ऊंची पहुँच का लाभ आज भी कई अर्जुन उठाते रहते हैं। मध्य प्रदेश का पी.एम.टी परीक्षा घोटाला हो या एशियाड में मुक्केबाज़ सरिता देवी का प्रकरण, अंगूठे तो आज भी कट रहे हैं। लाखों रुपयों का डोनेशन लेकर डॉक्टर और इंजिनियर गढ़ने वाले ये गुरु अगर द्रोण नहीं तो और क्या हैं? ऐसे में मन में एक प्रश्न उठता है। क्या भौतिक सफलतायें केवल छल और फरेब से ही अर्जित की जा सकती हैं?

लेकिन अपने स्वार्थ के लिये चरित्र और सिद्धांत बेचने वाले, मासूमों और कमजोरों का शोषण करके सफलता अर्जित करने वाले ये लोग नहीं जानते की इन्होंने क्या खोया है। वास्तव में ये अपना जीवन और आत्मा ही खो देते हैं। गुरु द्रोण की भांति अंत में प्रतिष्ठा और परिवार भी गँवा देते हैं।

"अस्थायी लाभ के लिए किया गया स्थायी नुकसान"। यही परिभाषा है झूठ, फरेब और छल की।

ये भी सच है की सच्चाई का, नैतिकता का रास्ता दुर्गम होता है। अंगूठा भी उसका ही कटता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं। इसलिये सच हमेशा परीक्षा देता हुआ प्रतीत होता है और झूठ अन्दर से खोखला होते हुये भी बाहर से बुलंद दिखता है। लेकिन केवल उनको जो अंतर्दृष्टि से हीन है।

ये पंक्तियाँ समर्पित हैं इसी कड़वे सच को ...

लिबास-ए-झूठ रेशम का, सच को ओढ़े कफ़न देखा
ऊंची हवेलियों के नीचे झोपड़ियों को दफ़न देखा
हमने देखा कटा हुआ अंगूठा एकलव्य का
और दुनिया ने बारहा अर्जुन का फन देखा

© - प्रशांत सेठ

बारहा = हमेशा

Sunday, October 12, 2014

दाम्पत्य

जीवन एक यात्रा है और इसे कई मोड़ से गुज़रना पड़ता है। यह सफ़र अकेले करना पड़े तो इंसान टूट सकता है। और वहीँ अगर कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला कोई साथी हो तो मुश्किलें भी खूबसूरत लगने लगती हैं। लेकिन किसी का साथ चाहिये तो कुछ शर्तें भी निभानी पड़ती हैं।

परिवार वह शक्ति है जो प्रेरित करती है श्रम करने के लिये। और इसका बीज है दाम्पत्य। सफल दाम्पत्य वही है जहाँ परिवार स्वयं प्रेरणा बन जाता है। और ऐसा परिवार बनता है परस्पर प्रेम और विश्वास से, और थोड़े से त्याग से।

करवाचौथ के अवसर पर ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस खूबसूरत रिश्ते को जिसका नाम है दाम्पत्य ....

हरी भरी रहे दरख़्त पर पत्ती पत्ती एहसास की
रिश्तों पर एक छतरी हो यूँ परस्पर प्रेम विश्वास की
एक लम्बा सफ़र है जीवन, तन्हा क्यूँकर काटें हम
मिल जुलकर सह लेंगे सारी बारिशें आकाश की

© - प्रशांत सेठ