बहुत आसान है ऊंचा उठना, बस थोडा सा गिर जाइये। यही सच है इस युग में सफलता का। जो जितने बड़े दिखते हैं अक्सर बहुत छोटे लोग होते हैं (अपवादों को छोड़कर)।
सच तो ये है की आज के दौर में एक अर्जुन के पीछे कई एकलव्य बलिदान होते हैं। ना जाने कितनी प्रतिभाओं का शोषण करके, अपनी ऊंची पहुँच का लाभ आज भी कई अर्जुन उठाते रहते हैं। मध्य प्रदेश का पी.एम.टी परीक्षा घोटाला हो या एशियाड में मुक्केबाज़ सरिता देवी का प्रकरण, अंगूठे तो आज भी कट रहे हैं। लाखों रुपयों का डोनेशन लेकर डॉक्टर और इंजिनियर गढ़ने वाले ये गुरु अगर द्रोण नहीं तो और क्या हैं? ऐसे में मन में एक प्रश्न उठता है। क्या भौतिक सफलतायें केवल छल और फरेब से ही अर्जित की जा सकती हैं?
लेकिन अपने स्वार्थ के लिये चरित्र और सिद्धांत बेचने वाले, मासूमों और कमजोरों का शोषण करके सफलता अर्जित करने वाले ये लोग नहीं जानते की इन्होंने क्या खोया है। वास्तव में ये अपना जीवन और आत्मा ही खो देते हैं। गुरु द्रोण की भांति अंत में प्रतिष्ठा और परिवार भी गँवा देते हैं।
"अस्थायी लाभ के लिए किया गया स्थायी नुकसान"। यही परिभाषा है झूठ, फरेब और छल की।
ये भी सच है की सच्चाई का, नैतिकता का रास्ता दुर्गम होता है। अंगूठा भी उसका ही कटता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं। इसलिये सच हमेशा परीक्षा देता हुआ प्रतीत होता है और झूठ अन्दर से खोखला होते हुये भी बाहर से बुलंद दिखता है। लेकिन केवल उनको जो अंतर्दृष्टि से हीन है।
ये पंक्तियाँ समर्पित हैं इसी कड़वे सच को ...
लिबास-ए-झूठ रेशम का, सच को ओढ़े कफ़न देखा
ऊंची हवेलियों के नीचे झोपड़ियों को दफ़न देखा
हमने देखा कटा हुआ अंगूठा एकलव्य का
और दुनिया ने बारहा अर्जुन का फन देखा
© - प्रशांत सेठ
बारहा = हमेशा
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