Friday, February 27, 2015

एक अजन्मी कथा

एक चित्र देखने मिला। कचरे के ढेर पे पड़ी हुई मनुष्यता का। कचरे में पड़े हुये समाज का। मैं अक्सर सोचता था की यह कृत्य केवल बे-पढ़े लिखे वर्ग का हो सकता है। लेकिन मैं गलत था। यह मानसिकता संभ्रांत वर्ग में भी उतनी ही पनपती है। बल्कि शायद कुछ ज़्यादा।

आप तो जानते ही हैं, एक संवेदनशील ह्रदय बेजान वस्तुओं से भी बात कर लेता है। फिर, इस चित्र में तो कभी जान रही होगी ना। लिहाज़ा बात होनी ही थी सो हो गई।

आप भी सुनिये; कचरे के ढेर में पड़ी हुई मनुष्यता की व्यथा। इस चित्र से उपजी....

"एक अजन्मी कथा"

मधुर प्रेम के किसी क्षण में
नेह व्याप्त था कण कण में
प्रकृति ने तब श्रृंगार किया
ईश्वर ने अंगीकार किया

संकल्प शिव का परस्पर था
जननी होने का अवसर था
समर्पण का तुमने विचार किया
दायित्व सृजन का स्वीकार किया

जगत धारिणी धरती के जैसे
देखें सृजन तुम करती हो कैसे
इसलिये विधाता छुप गया ओट में
मुझे सौंप कर तेरी गोद में

माँ की कोख में क्या भय होना था
नव जीवन का अब उदय होना था
आतुरता थी श्वांस श्वांस में
निर्भयता थी मेरे विश्वास में

और फिर मैंने आकार लिया
नारीत्व को स्वीकार किया
तेरे जैसी बनना चाहती थी
सृष्टि मैं भी रचना चाहती थी

तेरा पोषण, तेरा संयम था
मिट रहा अब अधूरापन था
सिर्फ उमंग थी और उत्साह था
वर्तमान, भविष्य से बेपरवाह था

लेकिन...

सरल नहीं है स्त्री का जन्म पाना
हर निश्चय का मंज़िल तक जाना
स्वप्न आँख का तरल हो गया
खुशियों का अमृत गरल हो गया

दूषित तुम्हारा मन क्लेश से
हुआ मेरे आगमन सन्देश से
सन्नाटे में डूबी किलकारी
फूल खो गया, रह गई क्यारी

प्रश्न है इस अजन्मी बेटी का
मैं ही पात्र क्यों हूँ बलिवेदी का?
क्या है फर्क मुझमें और उसमें?
क्या प्रारब्ध है किसी के बस में?

ये जो कुछ मैं सहे जाती हूँ
बस इतना ही मैं कहे जाती हूँ
फिर कोई कली असमय ना टूटे
फिर कोई अजन्मी कथा ना छूटे

भेद है केवल तुम्हारी दृष्टि का
नियम अदभुत है वरना सृष्टि का
दोनों में ईश्वरीय अभिव्यक्ति है
पुरुष संकल्प है, स्त्री शक्ति है

© - प्रशांत सेठ

Thursday, February 19, 2015

Wake up Bunty

"एक बूढा व्यक्ति अपना मोबाईल लेकर रिपेयरिंग की दुकान पर गया और दिखाया।
रिपेयरिंग वाले ने कहा: यह बिलकुल ठीक काम कर रहा है
वृद्ध की आखों में आंसू आ गये बोला : फिर इसमें मेरे बच्चो के फोन क्यों नही आते?"

कल फेसबुक पर ये पोस्ट पढ़ने को मिली। अपने आसपास नज़र डाली तो बहुत से ऐसे ख़राब मोबाइल दिखे। लेकिन इन ख़राब पड़े मोबाइलों में कुछ धड़क रहा था। शायद कुछ ज़िंदा था.... एक उम्मीद।

ऐसे ही एक मोबाइल के दिल के तार को छेड़ा तो, वो क्या बोला... ये सुनिये।

मीलों की दूरी अब तय करता है कौन
हाँ, यदा कदा बच्चे कर लेते हैं फोन
रफ़्तार भरी ज़िन्दगी का लाइफ स्टाइल है
माँ बाप के पास बच्चे नहीं, सिर्फ मोबाइल है

बेटा मुम्बई में बहुत बड़ा अफसर है
गाँव दूर पड़ता है, दो दिन का सफ़र है
उसके पास छुट्टी का एक पल नहीं है
हमारा क्या है, आज हैं कल नहीं हैं

उसके सपने परिंदों की तरह ऊंचे उड़ते है
गलती हमारी ही है जो उम्मीद से जुड़ते हैं
परिंदों के पैर में कब कोई ज़ंजीर होती है
तन्हाई, ठूँठ हो चुके दरख्तों की तकदीर होती है

काश उसके सपनों में हमारी भी जगह होती
काश हमारी ख़ुशी उसके जीने की वजह होती
जीवन में यही एक काश रह गया है
जिस्म फकत ज़िंदा लाश रह गया है

अब इंतज़ार है तो बस एक घंटी का
शायद फोन आ जाये आज मेरे बंटी का
इसी तरह इंतज़ार में समय कट जाता है
जीवन का एक दिन और घट जाता है
___________

मैं देख रहा हूँ हर तरफ बंटी ही बंटी हैं
गूंगे मोबाइल गाँव में, बे-आवाज़ बे-घंटी हैं
सोचा ऐसे ही ख़राब हो चुके मोबाइल को बजा दूं
आज मैं सोये हुये किसी बंटी को जगा दूं

मौत जिस दिन आएगी, ज़िन्दगी सवाल नहीं करेगी
बंटी, वो तेरे होने ना होने का ख्याल नहीं करेगी
ना वो ख्याल करेगी गाँव से शहर की दूरी का
ना ही ख्याल करेगी तेरी सरकारी मजबूरी का

बंटी, तेरे ऊपर और ऊपर केवल भ्रम का आसमान है
जिसको सफलता कहते हो, वो व्यर्थ की उड़ान है
देखना उड़ते उड़ते एक दिन जब थक जाओगे
इन्ही दरख्तों की गोद में तुम वापस आओगे

तब पता नहीं ये दरख़्त फिर कहाँ होंगे
शायद किसी और दुनिया में परिंदों की पनाह होंगे
इसलिये उड़ने के पहले ठहरने का इंतज़ाम रखना
सारा दिन उड़ना, लेकिन माँ बाप के लिये शाम रखना

© - प्रशांत सेठ