"एक बूढा व्यक्ति अपना मोबाईल लेकर रिपेयरिंग की दुकान पर गया और दिखाया।
रिपेयरिंग वाले ने कहा: यह बिलकुल ठीक काम कर रहा है
वृद्ध की आखों में आंसू आ गये बोला : फिर इसमें मेरे बच्चो के फोन क्यों नही आते?"
कल फेसबुक पर ये पोस्ट पढ़ने को मिली। अपने आसपास नज़र डाली तो बहुत से ऐसे ख़राब मोबाइल दिखे। लेकिन इन ख़राब पड़े मोबाइलों में कुछ धड़क रहा था। शायद कुछ ज़िंदा था.... एक उम्मीद।
ऐसे ही एक मोबाइल के दिल के तार को छेड़ा तो, वो क्या बोला... ये सुनिये।
मीलों की दूरी अब तय करता है कौन
हाँ, यदा कदा बच्चे कर लेते हैं फोन
रफ़्तार भरी ज़िन्दगी का लाइफ स्टाइल है
माँ बाप के पास बच्चे नहीं, सिर्फ मोबाइल है
बेटा मुम्बई में बहुत बड़ा अफसर है
गाँव दूर पड़ता है, दो दिन का सफ़र है
उसके पास छुट्टी का एक पल नहीं है
हमारा क्या है, आज हैं कल नहीं हैं
उसके सपने परिंदों की तरह ऊंचे उड़ते है
गलती हमारी ही है जो उम्मीद से जुड़ते हैं
परिंदों के पैर में कब कोई ज़ंजीर होती है
तन्हाई, ठूँठ हो चुके दरख्तों की तकदीर होती है
काश उसके सपनों में हमारी भी जगह होती
काश हमारी ख़ुशी उसके जीने की वजह होती
जीवन में यही एक काश रह गया है
जिस्म फकत ज़िंदा लाश रह गया है
अब इंतज़ार है तो बस एक घंटी का
शायद फोन आ जाये आज मेरे बंटी का
इसी तरह इंतज़ार में समय कट जाता है
जीवन का एक दिन और घट जाता है
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मैं देख रहा हूँ हर तरफ बंटी ही बंटी हैं
गूंगे मोबाइल गाँव में, बे-आवाज़ बे-घंटी हैं
सोचा ऐसे ही ख़राब हो चुके मोबाइल को बजा दूं
आज मैं सोये हुये किसी बंटी को जगा दूं
मौत जिस दिन आएगी, ज़िन्दगी सवाल नहीं करेगी
बंटी, वो तेरे होने ना होने का ख्याल नहीं करेगी
ना वो ख्याल करेगी गाँव से शहर की दूरी का
ना ही ख्याल करेगी तेरी सरकारी मजबूरी का
बंटी, तेरे ऊपर और ऊपर केवल भ्रम का आसमान है
जिसको सफलता कहते हो, वो व्यर्थ की उड़ान है
देखना उड़ते उड़ते एक दिन जब थक जाओगे
इन्ही दरख्तों की गोद में तुम वापस आओगे
तब पता नहीं ये दरख़्त फिर कहाँ होंगे
शायद किसी और दुनिया में परिंदों की पनाह होंगे
इसलिये उड़ने के पहले ठहरने का इंतज़ाम रखना
सारा दिन उड़ना, लेकिन माँ बाप के लिये शाम रखना
© - प्रशांत सेठ
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